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मानव तस्करी: इन्हीं वजहों से झारखंड की बेटियां बिक रहीं

झारखंड मानव तस्करी का सबसे बड़ा हब बन गया है. प्रतिवर्ष यहां से हजारों महिलाओं और बच्चों को देश के महानगरों के साथ-साथ विदेश ले जाया जाता है जहां घरेलू कामों के अलावा जिस्म के बाजार में बेचा जाता है.

झारखंड मानव तस्करी का सबसे बड़ा हब बन गया है. प्रतिवर्ष यहां से हजारों महिलाओं और बच्चों को देश के महानगरों के साथ-साथ विदेश ले जाया जाता है जहां घरेलू कामों के अलावा जिस्म के बाजार में बेचा जाता है.

झारखंड मानव तस्करी का सबसे बड़ा हब बन गया है. प्रतिवर्ष यहां से हजारों महिलाओं और बच्चों को देश के महानगरों के साथ-साथ विदेश ले जाया जाता है जहां घरेलू कामों के अलावा जिस्म के बाजार में बेचा जाता है.

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झारखंड मानव तस्करी का सबसे बड़ा हब बन गया है. प्रतिवर्ष यहां से हजारों महिलाओं और बच्चों को देश के महानगरों के साथ-साथ विदेश ले जाया जाता है जहां घरेलू कामों के अलावा जिस्म के बाजार में बेचा जाता है. मानव तस्करी के इस धंधे में एक पूरा रैकेट काम करता है जिसके तार झारखंड के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर विदेशों तक जुड़े हैं.

दिल्ली - मुंबई जैसे महानगरों में सजने वाले कामगारों की मंडी हो या फिर जिस्म के बाजार की बात झारखंड की बेटियों की बोली बड़ी कीमत पर लगती है. वजह अशिक्षा और गरीबी में यह आसानी से उपलब्ध तो है ही, इमानदारी, मेहनतकश होना और झारखंड में एड्स जैसे जानलेवा बीमारी से दूर रहने की वजह से ये लोगों की खास पसंद हैं.

यही वजह है कि दुनिया के इस तीसरे बड़े संगठित अपराध से जुड़े लोगों का झारखंड सॉफ्ट टारगेट बन गया है. मानव तस्कर दलाल के माध्यम से झारखंड की बेटियों को पांच हजार से लेकर 50 हजार तक में खरीद कर ले जाते हैं और एक एक बेटी का सौदा कई कई बार कर लाखो कमाते हैं.



मानव तस्करों द्वारा कभी काम दिलाने के नाम पर तो कभी शादी का झांसा दे कर तो कभी बड़े शहर की चकाचौंध दिखा कर यहां से लड़कियों को ले जा कर एक ऐसी अंधी गलियों में बेच दिया जाता है जहां से
लौट कर आना नामुमकिन तो नहीं लेकिन मुश्किल जरुर होता है.

अगर किसी एनजीओ या फिर पुलिस की सहायता से लौट भी आती है तो उनके पुनर्वास की ठोस व्यवस्था नहीं रहने के कारण वापस उसी गंदी गलियों में ना सिर्फ लौट जाती हैं बल्कि चंद रूपयों की लालच में अपने साथ दूसरी बच्चियों को भी उसी अंधेरी जिंदगी में ले जाती हैं. राज्य के वरीय पुलिस पदाधिकारी भी इस बात को स्वीकार करने से गुरेज नहीं करते हैं कि यह न सिर्फ एक अपराध से जुड़ी समस्या है बल्कि समाज के मदद के बगैर इस पर लगाम नहीं लगाया जा सकता है.

ऐसा नहीं है कि मानव तस्करी पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार द्वारा पहल नहीं की गई. एंटी ह्युमन ट्रैफिकिंग यूनिट की स्थापना, सीआईडी द्वारा ऑपरेशन मुस्कान चलाना, बच्चियों के पुनर्वास के लिए किशोरी निकेतन और बालाश्रय जैसी संस्था की स्थापना, विभिन्न एनजीओ की मदद से कार्यशाला का आयोजन कर कई प्रयास किए गए हैं. लेकिन ये सब कागजी खानापूर्ति मात्र बन कर रह गई है. इन्हीं सभी वजहों से झारखंड की बेटियां बिकने के लिए आज भी मजबूर हैं.
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