रांची: इस गांव में पाले जाते हैं लड़ाके मुर्गे, कीमत 80 हजार तक, खिलाते हैं काजू-बादाम

कांके प्रखंड के चंदवे पंचायत के दुबलिया गांव के हर घर में लगा के मुर्गे पाले जाते हैं.

कांके प्रखंड के चंदवे पंचायत के दुबलिया गांव के हर घर में लगा के मुर्गे पाले जाते हैं.

Ranchi fighter cocks: रांची शहर के कांके प्रखंड के चंदवे पंचायत के दुबलिया गांव के लोग लड़ाके मुर्गे पालते हैं. खेती के साथ-साथ मुर्गा लड़ाई के जरिये आमदनी भी इनकी कमाई का एक बड़ा जरिया है. गांव में इन दिनों हाजरा नस्ल का एक मुर्गा चर्चा का विषय है जिसकी कीमत 80 हजार रुपये है. लड़ाके मुर्गे को पिस्ता, काजू, किसमिस, बादाम और महंगे ड्राई फ्रूट के साथ-साथ दर्रे खिलाए जाते हैं.

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रांची. आमतौर पर मुर्गे का नाम सुनते ही नानवेज के शौकीन लोगों के मुंह में पानी आ जाता है. रांची के कांके प्रखंड में एक ऐसा भी गांव है जहां मुर्गे लड़ाने के लिए पाले जाते हैं. यहां मुर्गों की खातिरदारी ऐसे की जाती है जिससे आम आदमी भी शर्मा जाए. गांव की पहचान और खासियत आसपास के इलाकों में लड़ाके मुर्गे पालने वाले गांव के तौर पर है. कांके प्रखंड के चंदवे पंचायत के दुबलिया गांव के हर घर में लगा के मुर्गे पाले जाते हैं. पूरे गांव  में इन दिनों हाजरा नस्ल का एक मुर्गा चर्चा का विषय है जिसकी कीमत 80 हजार रुपये है. करीब एक साल की उम्र वाला इस मुर्गे का वजन 3 किलो के करीब है. छह बार मैदान जीत चुके और विरोधी मुर्गे की जिंदगी खत्म कर चुके इस रणबांकुरे के सामने आने में दूसरे बाहुबली मुर्गे भी कतराते हैं.

मुर्गा पालक बहादुर उरांव बताते हैं कि हाजरा, बिजला और चीनी नस्ल के इन मुर्गों को पालने में विशेष एहतियात बरती जाती है. इनके खानपान का ध्यान भी रखना होता है क्योंकि इन्हें पिस्ता, काजू, किसमिस, बादाम और महंगे ड्राई फ्रूट के साथ-साथ दर्रे खिलाए जाते हैं जो आम आदमी को भी मुमकिन नहीं है. ऐसी तगड़ी खानपान के बाद यह मुर्गे इतने बलिष्ठ हो जाते हैं कि इनके सामने विरोधी मुर्गे तो दूर गांव के कुत्ते और बिल्ली भी आने से पहले सौ बार सोचते हैं.

लड़ाके मुर्गों का वाला गांव और उसका बाजार जितना फायदेमंद है, उतना नुकसानदेह भी क्योंकि मुर्गो को पालने से लेकर उनको मैदान में उतारने तक एक मुर्गे पर हजारों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं. हर जीत के साथ मुर्गों की कीमत आसमान छूती जाती है और उन पर लाखों का दांव लगता है. अगर मैदान में दांव उल्टा पड़ गया तो एक झटके में लाखों का नुकसान भी झेलना पड़ता है. दुबलिया गांव के ग्रामीण और युवाओं में लड़ाके मुर्गो को पालने और उन्हें लड़ाने का जबरदस्त क्रेज है. युवा राजन उरांव की मानें तो खेती के साथ-साथ मुर्गा लड़ाई के जरिए आमदनी भी इनकी कमाई का एक बड़ा जरिया है. स्थानीय ग्रामीण इसे अपनी आदिवासी परंपरा से जोड़कर देखते हैं.
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