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आत्मनिर्भर भारत की दिशा में रांची की बेटी वन्या की बड़ी पहल, 28 लाख की नौकरी छोड़ बना रही ऑर्गेनिक सैनेटरी पैड्स

वन्या ने दो आदिवासी महिलाओं के साथ पैड्स बनाने का काम शुरू किया है.
वन्या ने दो आदिवासी महिलाओं के साथ पैड्स बनाने का काम शुरू किया है.

वन्या का कहना है कि जब लोग शराब की बोतलें खुलेआम हाथों में लेकर आ-जा सकते हैं, तो फिर पैड्स (Sanitary Pads) को अखबार या काले पॉलिथीन में छुपाकर क्यों ले जाया जाता है?

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रिपोर्ट- अविनाश कुमार

रांची. आत्मनिर्भर भारत की दिशा में रांची की बेटी वन्या वत्सल समाज के लिये एक आदर्श है. वन्या ने सालाना 28 लाख रुपये की नौकरी का त्याग करते हुये आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम बढ़ाया है. वन्या ने एक कंपनी की शुरुआत करते ऑर्गेनिक सैनेटरी पैड्स (Organic Sanitary Pads) का काम शुरू किया है. ये पैड्स पूरी तरह से इको फ्रेंडली है.

रांची की वन्या वत्सल युवाओं की उस भीड़ से बिल्कुल अलग है, जो ज्यादा से ज्यादा सालाना आय वाली नौकरी की चाहत रखते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो वन्या बेंगलुरु स्थित एक मल्टी नेशनल बैंक में सालाना 28 लाख रुपये की नौकरी नहीं छोड़ी होती. वन्या कुछ अलग करना चाहती थी खुद के लिये और महिलाओं के लिये. महिलाओं के लिये हर माह एक बार ऐसा समय आता है जब वो एक ऐसी पीड़ा से गुजरती हैं, जो बयां नहीं की जा सकती. वैसे तो बाजार में कई तरह के सैनेटरी पैड्स उपलब्ध थे, पर वन्या ने ऑर्गेनिक पैड्स की परिकल्पना की और उसे साकार किया.



कंपनी रजिस्टर्ड कराकर शुरू किया काम
वन्या ने सबसे पहले इलारिया इंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड के नाम से कंपनी रजिस्टर्ड कराई और फिर एक ऐसे सैनेटरी पैड्स का निर्माण किया जो प्लास्टिक रहित मतलब इको फ्रेंडली तैयार की गई. वन्या सैनेटरी पैड्स को लेकर समाज की मानसिकता को बदलना चाहती है.

उनका कहना है कि जब शराब के लिये लोग बेझिझक होकर काउंटर पर खड़े हो सकते, शराब की बोतल खुलेआम हाथों में लेकर आ-जा सकते हैं, तो फिर पैड्स खरीदने के वक्त अखबार से छुपाने और काले पॉलिथीन का उपयोग क्यों? IIM लखनऊ से MBA की डिग्री हासिल करने वाली वन्या की सोच आत्मनिर्भर भारत के सपनों को साकार करने जैसा है.

दो आदिवासी महिलाओं को दे रही रोजगार

इलारिया के नाम से सैनेटरी पैड्स के निर्माण में दो स्थानीय आदिवासी महिलाओं को भी रोजगार का नया अवसर प्रदान किया है. ये दोनों ही महिलाएं इससे पहले लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा का काम करती थीं. आज वे सम्मान के साथ रोजगार कर रही हैं. इन महिलाओं की मानें तो अब उनके पास अपने परिवार के लिये पैसे भी हैं और समय भी.

रोजगार मांगने से अच्छा है खुद को रोजगार देने लायक बनाना. इसी कथन को साकार कर रही है वन्या. वन्या इस बात को साबित करने में लगी है कि खुद के दम पर भी उस मुकाम को हासिल किया जा सकता है जो आपका सपना है. बस एक छोटी सी शुरुआत करने की जरूरत है.
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