रांची के देवरी गांव की दिलचस्प कहानी, महिला मुखिया की सोच ने दिलाई एलोवेरा विलेज की पहचान

महिला मुखिया की सोच ने रांची के देवरी गांव की तकदीर बदल दी.

महिला मुखिया की सोच ने रांची के देवरी गांव की तकदीर बदल दी.

मंजू कच्छप जब गांव की मुखिया निर्वाचित हुईं, तो उन्होंने सामान्य कामों के अलावा कुछ अलग करने की सोचीं. गांव के किसानों के इकॉनोमिक हालत ठीक करने के लिए एलोवेरा की खेती की शुरुआत कराई.

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रांची. राज्य सरकार किसानों (Farmers) की आय दुगुनी करने के लिए प्रयास कर रही है, तो आए दिन झारखंड के किसान इनोवेटिव खेती कर अपनी जिंदगी को खुशहाल बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं. कहीं फूल की खेती तो कहीं लाह की. रांची के देवरी पंचायत का देवरी गांव भी ऐसे ही प्रगतिशील किसानों के चलते एलोवेरा विलेज के रूप में पहचान बना रहा है. बीए पास महिला मुखिया की सोच और बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (Birsa Agriculture University) के सहयोग से यहां के किसान एलोवेरा की खेती कर रहे हैं. खरीदार गांव आकर 35 से 45 रुपये किलो में एलोवेरा खरीद कर ले जा रहे हैं.

सामान्य गांव से एलोवेरा विलेज में तब्दील होते इस गांव की तस्वीर बदलने के पीछे दिलचस्प कहानी है. मुखिया मंजू कच्छप बताती हैं कि डोरंडा कॉलेज, रांची से इकोनॉमिक्स में आनर्स तक की पढाई करने के बाद उनके सपने स्वावलंबी बनने का था. फिर जैसा आम घरों में होता है शादी के बाद देवरी गांव आ गयी और एक आम घरेलू महिला जैसा जीवन चलने लगा, पर कॉलेज के समय में जो सपने देखा था वह रह रहकर आंखों के सामने मानों घूम जाते थे. फिर एक दिन अपने सपने को लेकर पति से बात की तो उनका पूरा सहयोग मिला और फिर अपने गांव की निर्वाचित मुखिया हो गयी. स्वावलंबी तो मैं हो चुकी थी पर सपने और बड़े हो गए. गांव को खुशहाल और स्वावलंबी बनाने का, फिर क्या था बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से संपर्क किया. खुद एलोवेरा की खेती का प्रशिक्षण लिया और कई गांव वालों को भी इसके लिए प्रेरित किया.

मंजू कच्छप जब मुखिया निर्वाचित हुई तो उन्होंने मुखिया के सामान्य नाली-गली के कार्य के अलावा कुछ अलग करने की सोचीं और फिर किसानों के इकॉनोमिक हालत ठीक करने के लिए एलोवेरा की खेती के लिए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का सहयोग लिया. नतीजा सबके सामने हैं. अब उनकी योजना घर घर तक पहुंच चुके एलोवेरा की क्रांति का और बड़े पैमाने पर ले जाने की है.

मंजू कहती हैं कि बाजार की चिंता नहीं है क्योंकि खरीददार गांव तक आ जाते हैं. शुरू- शुरू में कई बड़ी आयुर्वेदिक कंपनियों ने भी उनसे संपर्क किया था पर उस समय गांव में एलोवेरा तैयार नहीं हुआ था. आज बिरसा देवी, जौरी उरांव जैसे कई किसान कर रहे हैं एलोवेरा की खेती.
ऐलोवेरा की खेती करते देवरी गांव के किसान
एलोवेरा की खेती करते देवरी गांव के किसान


रांची से करीब 15 किलोमीटर दूर नगड़ी प्रखंड का देवरी गांव इन दिनों अपने प्रगतिशील किसानों के चलते सुर्खियों में है. अब तक धान-गेंहू और सब्जियों की पारंपरिक खेती करने वाले इस गांव के किसान ने दो-तीन साल पहले मेडिसीनल प्लांट एलोवेरा की खेती की शुरुआत की थी और धीरे- धीरे यह गांव अब एलोवेरा विलेज के रूप में पहचान बनाने लगा है. इस गांव के बिरसा उरांव, जौरी देवी जैसी कई प्रगतिशील किसान एलोवेरा की खेती करते हैं और खरीदार उनके गांव तक आकर एलोवेरा ले जाता हैं. वह भी 35 से 45 रुपये किलो. एक बार एलोवेरा लगाया तो तीन साल तक लगातार इससे आय होती है. न उर्वरक न दवा छिड़काव का झंझट. एलोवेरा की खेती से खुश किसान कहते हैं कि इससे लगातार आय हो जाता है वह भी सब्जी-धान गेंहू से ज्यादा. अपने औषधीय गुणों से भरपूर एलोवेरा सौंदर्य प्रसाधनों से लेकर कई गंभीर बीमारियों में भी औषधि के रुप में इस्तेमाल किया जाता है और इसकी जबरदस्त डिमांड हैं. ऐसे में एक शिक्षित मुखिया की सोच, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की सलाह और किसानों की मेहनत से एक गांव एलोवेरा विलेज के रूप में पहचान बना लिया है, बल्कि किसानों की आय बढ़ने से गांव की तस्वीर भी बदली है.
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