बचाने में नाकाम रही झारखंड सरकार, बिक गई जपला सीमेंट फैक्ट्री

जपला सीमेंट फैक्ट्री की नीलामी को रोकने के लिए झारखंड सरकार की ओर से दायर याचिका को पटना हाइकोर्ट ने खारिज कर दिया

News18 Jharkhand
Updated: May 18, 2018, 12:20 PM IST
बचाने में नाकाम रही झारखंड सरकार, बिक गई जपला सीमेंट फैक्ट्री
जपला सीमेंट फैक्ट्री
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Updated: May 18, 2018, 12:20 PM IST
झारखंड सरकार की बचाने की तमाम कोशिशों के बावजूद पलामू की जपला सीमेंट फैक्ट्री बिक गयी. गुरुवार को पटना हाईकोर्ट ने इसे नीलाम कर दिया. नीलामी में हाईटेक कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने सबसे ऊंची 12 करोड़ 56 लाख की बोली लगाकर इसे खरीदा लिया.



नीलामी में हाईटेक कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के अलावा आर ट्रेडिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड कोलकाता, चुनार स्टील यूपीए, प्रो स्टील अहमदाबाद, बाबा विश्वनाथ कंस्ट्रक्शन, यूपीए मां विंध्यवासिनी कंपनी प्राइवेट लिमिटेड उत्तर प्रदेश सहित कुल आठ कंपनियों ने हिस्सा लिया. नीलामी में सबसे अधिक बोली लगानेवाली कंपनी हाईटेक कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के मालिक उपेंद्र सिंह पालूम रे हैदरनगर के पंसा गांव के रहने वाले हैं.



जपला सीमेंट फैक्ट्री की नीलामी को रोकने के लिए झारखंड सरकार की ओर से दायर याचिका को पटना हाइकोर्ट ने खारिज कर दिया. हाइकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि भारत सरकार की बीआइएफआर ने फैक्ट्री के जीर्णोद्धार के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था और ये कहा था कि इसे दोबारा नहीं चलाया जा सकता. ऐसे में मजदूरों के बकाया के भुगतान के लिए हाइकोर्ट लिक्विडेटर नियुक्त कर उपकरणों की नीलामी करा रहा है. कोर्ट ने कहा कि झारखंड सरकार इतने वर्षों से फैक्ट्री को चलाने को लेकर कोई ठोस योजना पेश नहीं कर सकी.

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साल 1917 में मार्टिन बर्न कंपनी ने जपला सीमेंट फैक्ट्री को स्थापित किया था. 1984 तक लगातार प्रबंधन बदलता रहा. वर्तमान में यह एसपी सिन्हा ग्रुप के हाथों में था. कंपनी पहली बार 1984 में बंद हुई थी. बिहार सरकार के हस्तक्षेप के बाद 1990 में खुली. बिहार सरकार ने पांच करोड़ की सहायता देने की बात कही थी. पर 2.5 करोड़  रुपये ही दिये. इसी को आधार बनाते हुए प्रबंधन ने 1991 में इसे बंद कर दिया.


कंपनी में पांच हजार मजदूर कार्यरत थे. मजदूरों ने बकाया भुगतान को लेकर पटना हाइकोर्ट में याचिका दायर की थी. 2016 में पटना हाइकोर्ट के आदेश पर लिक्विडेटर नियुक्त किया गया, ताकि मजदूरों व बैंकों का बकाया भुगतान किया जा सके. 2017 में नये लिक्विडेटर नियुक्त किये गये. 17 मई 2018 को फैक्ट्री नीलाम हो गई.


(नीलकमल की रिपोर्ट)


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