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झारखंड: प्रैक्टिस तो दूर जैवलिन का दीदार भी मुश्किल, ऐसे में कैसे 'नीरज चोपड़ा' बन पाएंगे राज्य के खिलाड़ी?

झारखंड के जैवलिन खिलाड़ियों को प्रैक्टिस के लिए जैवलिन नहीं मिल पाता है.

झारखंड के जैवलिन खिलाड़ियों को प्रैक्टिस के लिए जैवलिन नहीं मिल पाता है.

Sports in Jharkhand: झारखंड के जैवलिन खिलाड़ी प्रैक्टिस के नाम पर सिर्फ फिटनेस वर्कआउट करते हैं, क्योंकि उन्हें जैवलिन उपलब्ध नहीं है. जबकि लाखों की जैवलिन रांची के बिरसा मुंडा एथलेटिक्स स्टेडियम के कमरे में सड़ रहे हैं.

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रांची. टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympics) में नीरज चोपड़ा (Neeraj Chopra) के द्वारा गोल्ड जीतने के बाद भाला फेंक यानी जैवलिन थ्रो (Javelin Throw) अचानक देशभर में चर्चा में आ गया. झारखंड में भी एथलेटिक्स के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं. इनमें जैवलिन का खेल भी शामिल है. लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद जैवलिन का लाभ खिलाड़ियों को पूरी तरह नहीं मिल पा रहा.

नीरज चोपड़ा से प्रेरणा लेकर झारखंड के जैवलिन खिलाड़ियों के दिलों में भी यह हौसला बुलंद हुआ है कि जैवलिन में उनका भी कैरियर बन सकता है. देश के लिए वे भी पदक जीत सकते हैं. ऐसा ही एक सपना पाले नेशनल लेवल के जेवलिन प्लेयर विजय लकड़ा बिना भाले के ही रांची के मोरहाबादी स्थित बिरसा मुंडा स्टेडियम में फिटनेस प्रैक्टिस कर रहे हैं. विजय बताते हैं कि सरकारी जेवलिन का लाभ आसानी से खिलाड़ियों को नहीं मिल पाता. ऐसे में वह प्रैक्टिस के नाम पर सिर्फ फिटनेस वर्कआउट करने पर मजबूर हैं.

वहीं दूसरी ओर राजधानी के खेलगांव में महंगे खेल जेवलिन यानी भाले की कोई कमी नहीं. लाखों रुपए की जैवलिन खेलगांव के बिरसा मुंडा एथलेटिक्स स्टेडियम के एक कमरे में बंद होकर सड़ने को मजबूर है. लेकिन खिलाड़ियों के लिए उसका दीदार किसी सपने से कम नहीं. जो खिलाड़ी नेशनल लेवल यानी सीनियर स्तर पर अपना मुकाम बना चुके हैं, उनके लिए खेलगांव में जेएसएसपीएस की ओर से सुविधाएं उपलब्ध हैं. लेकिन जूनियर स्तर के खिलाड़ियों के लिए जैवलिन पकड़ना किसी सपने से कम नहीं.

नेशनल लेवल और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फेंके जाने वाले एक जेवलिन की कीमत 1 लाख रुपये से शुरू होकर डेढ़ दो लाख तक होती है. ऐसे में राज्य के आर्थिक रूप से कमजोर खिलाड़ियों के लिए खुद की जेवलिन से प्रैक्टिस करना किसी मजाक से कम नहीं. और दूसरी ओर सरकारी जेवलिन का काम उन्हें दूर से ललचाना भर है.

जेवलिन के जूनियर लेवल के खिलाड़ी जॉनसन टुडू की माने तो मंहगा जेवलिन नये खिलाड़ियों को नहीं दिया जाता. ऐसे में प्रैक्टिस को लेकर समस्या आती है. और लाखों रुपये की जेवलिन खरीदना उनके जैसे खिलाड़ियों के वश की बात नहीं.

खिलाड़ियों के सामने जेवलिन के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या कोच को लेकर है. एथलेटिक्स के नाम पर राज्य सरकार के करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद खिलाड़ियों तक उसका पूरा लाभ नहीं पहुंच पा रहा. राजधानी रांची में एथलेटिक्स के नाम पर दो बड़े स्टेडियम हैं. पहला खेलगांव और दूसरा मोरहाबादी का बिरसा मुंडा स्टेडियम. लेकिन जहां तक जैवलिन के प्रैक्टिस की बात है तो उसके लिए खेलगांव में जेएसएसपीएस में ही सुविधाएं मौजूद हैं. राज्य में करीब 5-6 से ज्यादा सीनियर लेवल के खिलाड़ियों को ही जेवलिन प्रैक्टिस के लिए उपलब्ध करायी जाती हैं.

खेलगांव के एथलेटिक्स कोच अरविंद कुमार ने बताया कि खेलगांव में रखे गये तमाम सामान 34वें नेशनल गेम्स के दौरान खरीदे गये थे. जो आमतौर पर बिना स्पोर्ट्स निदेशक की अनुमति के बगैर किसी को नहीं दिए जाते. ऐसे में इन सामानों को प्रैक्टिस के लिए बाहर निकालने पर अनुमति का ताला लगा हुआ है. इनकी माने तो नये खिलाड़ियों को महंगे जेवलिन दिये जाने पर उनके टूटने का खतरा बना रहता है. लिहाजा उन्हें बैंबू स्टिक से प्रैक्टिस करने की सलाह दी जाती है.

खिलाड़ियों की माने तो राज्य में जूनियर लेवल पर एथलेटिक्स खिलाड़ियों के लिए हर जिले में हॉस्टल तो मौजूद हैं. लेकिन सीनियर लेवल के खिलाड़ियों के लिए राज्य में हॉस्टल की व्यवस्था नहीं है. परेशानी की बात यह है कि 20 साल की उम्र के बाद खिलाड़ी जूनियर लेवल से हट जाते हैं. और हटने पर उन्हें हॉस्टल से निकाल दिया जाता है. ऐसे में खिलाड़ियों के सामने न तो नौकरी होती है और न ही राज्य सरकार से मिलने वाली कोई सुविधा.

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