Jharkhand Politics: कांग्रेस में आए इन विधायकों का निर्णय अब बना इन्हीं के गले की फांस!

बंधु तिर्की और प्रदीप यादव अब दिल्ली के चक्कर काटते दिख रहे हैं. (फाइल फोटो)

झारखंड विकास मोर्चा छोड़ कांग्रेस में आए बंधु तिर्की और प्रदीप यादव अब उलझन में हैं. फिलहाल उन्हें पार्टी विधायक का दर्जा नहीं मिल सका है और न ही कोई महत्वपूर्ण पद.

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रांची. झारखंड में चली राजनीतिक उठा-पटक कुछ समय पहले तक तीन विधायकों के लिए बड़े फायदे का सौदा दिख रही थी. लेकिन अब इन्हीं में से दो विधायकों की हालत कुछ सही नहीं दिख रही है. थोड़ा पहले देखें तो राज्य में झारखंड विकास मोर्चा नामक दल था. 2019 के विधानसभा चुनावों के अगले ही साल जेवीएम का विलय बीजेपी और कांग्रेस में होने का दावा किया गया. बाबूलाल मरांडी, बंधु तिर्की और प्रदीप यादव ने बीजेपी व कांग्रेस का दामन थामने का निर्णय लिया. बाबूलाल मरांडी जहां बीजेपी की तरफ बढ़े, वहीं तिर्की और यादव ने कांग्रेस को मजबूत करने की ठानी. मरांडी का बीजेपी ने स्वागत किया और उन्हें विधायक दल के नेता के तौर पर स्‍थापित किया. दल बदल का मामला विधानसभा अध्यक्ष के कोर्ट के होने के चलते हालांकि मरांडी को फिलहाल नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी नसीब नहीं हो सकी है.
लेकिन तिर्की और यादव की हालत कुछ ठीक नहीं दिख रही है. वे आज तक दिल्ली दरबार में चक्कर काटते दिख रहे हैं. विधानसभा में भी वे दोनों वर्तमान में जेवीएम के विधायक ही हैं.

महत्वाकांक्षी होते कांग्रेस के विधायक
अब इन दोनों के सामने कांग्रेस के महत्वाकांक्षी होते विधायक भी एक समस्या हैं. वहीं इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कार्यकर्ताओं को नाराज कर किसी और पार्टी का दामन थामना गलत साबित हो सकता है. वहीं ऐसे में ये नेता कितनी दूरी तय करते हैं ये कहना मुश्किल है. बंधु तिर्की और प्रदीप यादव के कांग्रेस में आने से पाार्ट विधायकों की संख्या तो बढ़ी लेकिन अब ये कहना मुश्किल है कि ये साथ कितने दिनों का रहता है.

सभी बातों से परेशान बंधु तिर्की ने अब कांग्रेस के सामने विधानसभा में पार्टी विधायक की मान्यता दिलवाने या उनका इस्तीफा लेने का राजनीतिक पासा फेंका है. वे दोबारा चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं. लेकिन ये राह अब उतनी आसान नहीं होगी. हालांकि अब राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि कांग्रेस का हाथ मजबूत करने आए दोनों ही विधायक अब थकते दिख रहे हैं. दोनों ही इस गुणा भाग में लगे हैं कि कांग्रेस में आना उनके लिए कितना फायदेमंद हुआ और कितना नुकसानदायक. क्योंकि अब ये निर्णय दोनों के ही न निगलते बन रहा है न उगलते. वहीं विशलेषकों का ये भी कहना है कि दोनों ही विधायक अपने दम पर चुनाव जीतने वाले नेताओं की कैटेगरी में आते हैं. ऐसे में इन दोनों के लिए ही दल ज्यादा महत्व नहीं रखता है.

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