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झारखंड में मॉनसून की बेरुखी, जून में 61 फीसदी कम हुई बारिश

जून में सूबे के 24 में से 22 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई. कुछ जिलों में बारिश सामान्य से 76 फीसदी तक कम हुई है.

जून में सूबे के 24 में से 22 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई. कुछ जिलों में बारिश सामान्य से 76 फीसदी तक कम हुई है.

जून में सूबे के 24 में से 22 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई. कुछ जिलों में बारिश सामान्य से 76 फीसदी तक कम हुई है.

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    झारखंड में जून महीने में सामान्य से 61 फीसदी कम बारिश हुई है. 196 मिमी की जगह राज्य में मात्र 77 मिमी बारिश दर्ज की गई. इससे किसानों के चेहरे मुरझाए हुए हैं. हालांकि जुलाई के पहले हफ्ते में कुछ जिलों में अच्छी बारिश हुई है. लेकिन पाकुड़, गोड्डा, चतरा, देवघर और खूंटी जैसे जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है.

    24 में से 22 जिलों में कम बारिश

    अच्छे मॉनसून के पूर्वानुमान के बावजूद झारखंड में बारिश की स्थिति चिंताजनक है. सूबे में मॉनसून इस बार वैसे भी 11-12 दिनों की देरी से आया. देरी के बाद बेरुखी ने खेती- किसानी के लिए संकट पैदा कर दिया है. जून में सूबे के 24 में से 22 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई. कुछ जिलों में बारिश सामान्य से 76 फीसदी तक कम हुई है.

    एक नजर कम बारिश वाले जिलों पर

    जिला                    सामान्य से कम बारिश (प्रतिशत में )

    पाकुड़                      76
    गोड्डा                        71
    खूंटी                         58
    देवघर                      54
    चतरा                        50
    रांची                         37

    नहीं हो पाई है धान की रोपनी

    झारखंड में इस वर्ष 18 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती करने का लक्ष्य रखा गया है. 5 जुलाई तक इसमें से मात्र 1 लाख 18 हजार भूमि पर ही धान की रोपनी हो पाई है. दाल के लक्षित 6 लाख 12 हजार हेक्टेयर भूमि में से महज 12 हजार हेक्टेयर में ही बीज की रोपाई हुई है. मक्के की खेती 3 लाख 12 हजार हेक्टेयर भूमि के बदले मात्र 27 हजार हेक्टेयर में ही हो पाई है. तिलहन की खेती 60 हजार हेक्टेयर की जगह महज 3 हजार हेक्टेयर भूमि में हुई है.

    जुलाई में बारिश की उम्मीद

    हालांकि सूबे के कृषि निदेशक छविरंजन को उम्मीद है कि सूबे में जुलाई के पहले 15 दिनों में अच्छी बारिश होगी. इससे धान की रोपनी, दाल और मक्के की रोपाई के भी आंकड़े बढ़ेंगे. इसके लिए सभी जरूरी निर्देश जिला कृषि पदाधिकारियों को दे दिये गये हैं. जुलाई में मॉनसून ने कमाल दिखाया तो ठीक, नहीं तो सूबा फिर से सूखे की कगार पर खड़ा हो सकता है.

    रिपोर्ट- उपेन्द्र कुमार 

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