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झारखंड: बजट में अनदेखी से क्षेत्रीय फिल्मों के कलाकारों में गुस्सा, बोले- कैसे चलेगा घर

नागपुरी, खोरठा और संथाली भाषाओं की फिल्मों का संसार दम तोड़ता नजर आ रहा है.

नागपुरी, खोरठा और संथाली भाषाओं की फिल्मों का संसार दम तोड़ता नजर आ रहा है.

सवाल यह है कि 2016 में पिछली सरकार में बनी हिट फिल्म नीति नई सरकार में फ्लॉप कैसे हो गई. अचानक क्षेत्रीय फिल्मों की रंगीन दुनिया बदरंग कैसे हो गई.

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रांची. हेमंत सरकार के बजट में एक ऐसा भी वर्ग है जिसकी पूरी तरह से अनदेखी की गयी है. वह तबका है प्रदेश के क्षेत्रीय फिल्म उद्योग का. बजट में पूरी तरह उपेक्षा किए जाने से क्षेत्रीय फिल्मों के कलाकार और उससे जुड़े लोग नाराज हैं. क्षेत्रीय फिल्मों के कलाकारों की मानें तो उन्होंने बड़ी हसरतों से हेमंत सरकार के बजट में अपनी कहानी को तलाशने की कोशिश की. वित्त मंत्री हजारों करोड़ रुपये हर विभाग और दूसरे हिस्सों पर लुटाते रहे लेकिन अपने राज्य की समृद्ध और क्षेत्रीय फिल्मों की समृद्ध विरासत पर अठन्नी भी खर्च करना भी जरूरी नहीं समझा. आर्ट निर्देशक दिलेश्वर लोहरा कहते हैं कि राज्य सरकार फिल्म नीति को पूरी तरह भूल चुकी है. सरकार को क्षेत्रीय कलाकारों के दर्द से कोई मतलब नहीं. वहीं नागपुरी अदाकारा वर्षा ऋतु भी नागुपरी, खोरठा और संथाली फिल्मों के हाशिये पर होने से काफी मायूस हैं. उनकी मानें तो फिल्मों के रिलीज में भी क्षेत्रीय फिल्मों के तरजीह नहीं दी जाती. साथ ही सिनेमाघरों में भी ऐसी फिल्मों को लगाने से वितरक परहेज करते हैं.

दरअसल राज्यभर में नागपुरी, खोरठा और संथाली भाषाओं की फिल्मों का संसार इन दिनों सरकारी उदासीनता की वजह से दम तोड़ता नजर आ रहा है. मेहनत के बावजूद क्षेत्रीय कलाकारों की मेहनत रंगीन पर्दे पर नहीं दिखती. जबकि बॉलीवुड के निर्माता निर्देशक झारखंड में शूटिंग कर लौट जाते हैं. स्थानीय कलाकारों को सिर्फ उन फिल्मों के किसी कोने में ही जगह मिल पाती है. ऐसे में राज्य की क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को न तो पहचान मिल पाती है और न ही कलाकारों को उचित मेहनताना. स्थानीय कलाकारों की मानें तो सरकार आर्थिक मदद और सब्सिडी देकर इन फिल्मों का कैनवास बड़ा कर सकती है.

चाईबासा और गुमला जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले कलाकारों की मानें तो क्षेत्रीय फिल्मों में रोजगार की संभावना इतनी ज्यादा है कि राज्य से पूरा नक्सल ही खत्म हो जाएनक्सल प्रभावित क्षेत्र चाईबासा के कलाकार दशरथ बताते हैं कि आदिवासी युवकों को गीत संगीत में काफी रुचि होती है. ऐसे में अगर क्षेत्रीय फिल्मों का निर्माण तेजी से होता है तो भटके युवाओं का रुख फिल्मों की ओर हो सकता है.



झारखंड फिल्म तकनीकी सलाहकार समिति के सदस्य ऋषि प्रकाश मिश्रा का पूरा गुस्सा संबंधित अधिकारियों पर ही फूटता है. उनकी मानें तो क्षेत्रीय फिल्मों की बदहाली की सबसे बड़ी वजह अधिकारी ही हैं जिन्हें कला संस्क़ति से कोई मतलब नहीं है. वे बताते हैं कि सूचना प्रसारण विभाग के पदाधिकारी जिम्मेदारी निभाने के बजाय सिर्फ खानापूर्ति करते हैं. उन्हें क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों से कोई मतलब नहीं.
सवाल यह है कि 2016 में पिछली सरकार में बनी हिट फिल्म नीति नई सरकार में फ्लॉप कैसे हो गई. अचानक क्षेत्रीय फिल्मों की रंगीन दुनिया बदरंग कैसे हो गई. बहरहाल बजट से निराश कलाकारों की उम्मीद है कि आदिवासी मुख्यमंत्री खुद हाशिये पर पड़ी क्षेत्रीय फिल्मों का दर्द समझेंगे और ठंडे बस्ते में पड़ी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों की सरकारी पटकथा जल्द लिखी जाएगी.
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