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हेमंत सोरेन को कितना जानते हैं आप? यहां पढ़ें

News18Hindi
Updated: November 19, 2019, 12:55 PM IST
हेमंत सोरेन को कितना जानते हैं आप? यहां पढ़ें
शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.

हेमंत सोरेन (Hemant Soren) झारखंड में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिशों में लगे हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं हेमंत इससे पहले किस तरह के कामों को अंजाम दे चुके हैं?

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  • Last Updated: November 19, 2019, 12:55 PM IST
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हेमंत सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष हैं. वो अपने पिता शिबू सोरेन की तरह राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. साल 2013 में हेमंत सोरेन आरजेडी, कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों की मदद से झारखंड के पांचवें मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुए थे और दिसंबर 2014 तक वो पद पर रहे. साल 1975 में जन्मे हेमंत सोरेन कम उम्र में ही अपनी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दे चुके थे. शिबू सोरेन की विरासत को संभालना उनके लिए किसी जोखिम से कम नहीं था लेकिन हेमंत सोरेन ने समय समय पर अपनी काबिलियत का परिचय देकर यह साबित कर दिया राजनीति के टेढ़े मेढ़े रास्ते पर चलने की क्षमता वो बखूबी रखते हैं.

मुख्यमंत्री बनने से पहले हेमंत सोरेन राज्य में उपमुख्यमंत्री पद पर भी काबिज रह चुके हैं. अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में हेमंत सोरेन ने उपमुख्यमंत्री पद को बखूबी संभाला है. स्वभाव से बेहद सरल हेमंत सोरेन पिता की तरह ही लोगों से सीधा संवाद कायम रखने में विश्वास रखते हैं इसलिए राज्य में पार्टी के साथ साथ अपनी लोकप्रियता कायम रखने में कामयाब रहे हैं. हेमंत सोरेन राज्य में शराब बिक्री पर पांबदी लगाने के पक्षधर हैं. उनका मानना है कि झारखंड के गांवों में खासतौर पर शराब की दुकानें नहीं खुलनी चाहिए क्योंकि राज्य के भोले-भाले आदिवासी शराब के नशे में चूर होकर जिंदगी की दौड़ में और पिछड़ते चले जाएंगे. हेमंत सोरेन का मानना है कि राज्य की महिलाओं को आगे बढ़कर शराब बिक्री का विरोध करना होगा तभी राज्य सरकार गांवों में शराब का लाइसेंस बांटने का निर्णय वापस ले सकेगी.

हेमंत डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के विरोधी हैं और उनका मानना है कि इससे कई गरीब सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं. साल 2017 में कथित भूखमरी की वजह से सिमडेगा में एक लड़की की मौत की वजह का पता लगाने के लिए उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की थी. इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्य सचिव राजबाला वर्मा को भी आड़े हाथों लिया था. हेमंत सोरेन इस बात के विरोधी रहे हैं कि आधार नंबर के बगैर राशन नहीं दिया जाना सरकार का अमानवीय पहलू है.

राज्य के आदिवासियों के हितों की रक्षा करने का हेमंत सोरेन कोई भी मौका हाथ सें गंवाना नहीं चाहते हैं. ‘छोटा नागपुर टीनेंसी एक्ट’ और ‘संथाल परगना टीनेंसी एक्ट’ में बदलाव की कोशिशों का हेमंत सोरेन ने जबर्दस्त विरोध किया. दरअसल इन दोनों एक्ट में बदलाव कर राज्य सरकार उन जमीनों पर सड़क, ह़ॉस्पिटल और शैक्षणिक संस्थानों को साल 2016 में बनवाना चाह रही थी जिसका हेमंत सोरेन ने जोरदार विरोध किया.

झारखंड में साल 2017 में ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने उन्हें शिरकत करने का न्यौता भेजा लेकिन हेमंत सोरेन ने उसे लैंड ग्रैबर्स मीट ( जमीन हड़पने वाला सम्मेलन) बताकर शामिल होने से इनकार कर दिया.

हेमंत फिलहाल अपनी पार्टी को संवारने में लगे हुए हैं. साल 2019 लोकसभा चुनाव में जेएमएम की सांठगांठ कांग्रेस से थी और वो महज दो सीटें जीत पाने में कामयाब रही जिसमें जेएमएम को महज़ एक ही सीट मिली. ऐसे में मजबूत बीजेपी को राज्य में पटखनी देना हेमंत के लिए बड़ी चुनौती है. ऐसे में झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष के तौर पर हेमंत सोरेन अपनी पार्टी की जीत के लिए क्या कर पाते हैं ये देखना वाकई दिलचस्प होगा.

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First published: November 19, 2019, 12:55 PM IST
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