न्यूज़18 का खुलासा : जाती रहीं जानें और रांची सदर अस्पताल में छिपी रहीं लाइफ सेविंग मशीनें, क्यों?

रांची के सदर अस्पताल में रखे हैं कई नये वेंटिलेटर.

रांची के सदर अस्पताल में रखे हैं कई नये वेंटिलेटर.

News18 Exclusive : एक तरफ मरीज़ गंभीर हालत में अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं तो वहीं सरकारी अस्पताल में ब्रांड न्यू मशीनें बगैर इस्तेमाल के पड़ी हैं. उस पर प्रभारी सिविल सर्जन की सफाई गले से उतरने लायक नहीं है.

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रांची. झारखंड की राजधानी में सरकारी हेल्थ सिस्टम मरीज़ों की जान बचाने को लेकर कितना गंभीर है? इसकी एक एक्सक्लूसिव तस्वीर न्यूज़ 18 के पास है. पुख्ता सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक यह वीडियो रांची सदर अस्पताल के एक कमरे का है. वीडियो में आप देख सकते हैं कि किस तरह करोड़ों की लाइफ सेविंग मशीनों को एक बंद कमरे में छिपाकर रखा गया है. इन मशीनों को अब तक मरीज़ों के लिए उपयोग किया जाना तो दूर, इनकी पैकिंग तक नहीं उतारी गई है.

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस बंद कमरे में 10 से 15 वेंटिलेटर और 30 से 35 HFNC मशीनें रखी हैं, जो बिल्कुल ब्रांड न्यू और टैग लगी हैं. हालांकि न्यूज़ 18 इस वीडियो के दावे की पुष्टि नहीं करता है, लेकिन इसकी सच्चाई सामने लाए जाने की मांग करता है. सूत्रों के ही मुताबिक रांची सदर अस्पताल की नई बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल पर इन तमाम मशीनों को बिल्कुल लोगों से दूर छिपाकर रखा गया है.

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Youtube Video

कितना और क्यों बड़ा है सवाल?

सबसे बड़ी बात यह है कि कोरोना संक्रमण के दौर में एक तरफ, वेंटिलेटर और HFNC जैसी लाइफ सेविंग मशीनों की बेहद कमी है. ऐसी मशीनों के लिए दूसरे राज्यों और विदेशों की तरफ देखने की मजबूरी बताई जा रही है. दूसरी तरफ, राजधानी के अपने ही सरकारी सदर अस्पताल के कमरे में इतनी संख्या में मशीनें पड़ी हैं, जिनका इस्तेमाल नहीं हो रहा, क्यों?

आपको बता दें कि एक वेंटिलेटर की कीमत 10 से 15 लाख के बीच होती है. इस लिहाज से छिपाकर रखे गए 10 से 15 वेंटिलेटर की कीमत एक से डेढ़ करोड़ रुपए तक है. वहीं HFNC मशीनों का इस्तेमाल गंभीर रूप से बीमार मरीजों को ऑक्सीजन देने में किया जाता है. 30 से 35 HFNC ब्रांड न्यू मशीनें भी कमरे में बंद हैं.



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रांची स्थित सरकारी सदर अस्पताल भवन. (File Photo)

कैसे गले उतरे सिविल सर्जन की सफाई?

कोरोना काल में वेंटिलेटर और HFNC मशीनों की उपयोगिता किसी से छिपी नहीं है. निजी अस्पताल इन्हीं मशीनों के बूते मरीज़ों से इलाज के नाम पर लाखों रुपये वसूल रहे हैं. ये मशीनें सरकारी हेल्थ सिस्टम के पास बेकार पड़े होने की तस्वीरें अपनी गंभीरता खुद बताती हैं. इन मशीनों के रखे होने की बात रांची के प्रभारी सिविल सर्जन डॉ. विनोद कुमार ने स्वीकार भी की, लेकिन उनकी सफाई देखिए.

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उन्होंने कुल 44 मशीनों को सदर अस्पताल की संपत्ति बताते हुए कहा कि ज़रूरत पड़ने पर इन मशीनों का इस्तेमाल किया गया, जो कि कहीं से भी गले से नहीं उतरता क्योंकि सभी मशीनें बिल्कुल नयी हैं और न तो उनकी प्लास्टिक पैकिंग अब तक हटाई गई है और न ही उनके टैग हटाए गए हैं. वहीं, कुमार ने कहा कि इतना लोड उपलब्ध नहीं है कि सारी मशीनें चल सकें. साथ ही, उन्होंने मरीज़ों की मौतों के लिए मशीनों की कमी मानने से इनकार करते हुए कहा कि बीमारी की आक्रामकता के चलते मौतें हुई.

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