Analysis: न तीर न कमान, जेडीयू के सामने झारखंड का मुश्किल मैदान

प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने कहा कि महज कुछ महीनों की मेहनत से बेहतर चुनावी नतीजों की उम्मीद बेमानी है. प्रदेश संगठन को 50 ऐसे नेताओं की फौज तैयार करनी होगी, जो जेडीयू (JDU) को झारखंड (Jharkhand) में क्षेत्रवार मजबूत नेतृत्व दे सके.

Diwakar Tiwari | News18 Jharkhand
Updated: September 9, 2019, 6:28 PM IST
Analysis: न तीर न कमान, जेडीयू के सामने झारखंड का मुश्किल मैदान
एक तो पहले से कमजोर सियासी जमीन, ऊपर से नए चुनाव चिन्ह के साथ झारखंड में चुनावी मैदान में उतरना जेडीयू के लिए आसान नहीं होगा.
Diwakar Tiwari | News18 Jharkhand
Updated: September 9, 2019, 6:28 PM IST
रांची. झारखंड (Jharkhand) में जेडीयू (JDU) का चुनावी अभियान पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के कार्यकर्ता सम्मेलन के साथ शुरू हो गया. नीतीश कुमार ने इसकी शुरुआत कार्यकर्ताओं को सुशासन माॅडल का मंत्र देकर की. हालांकि उन्होंने झारखंड जेडीयू को इस बात के लिए अधिकृत कर दिया कि कितनी सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ा जाए. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सालखन मुर्मू (Salkhan Murmu) पहले ही इस बात का ऐलान कर चुके हैं कि वे सूबे की सभी 81 सीटों पर अपने दम पर मैदान में उतरेंगे. झारखंड में बीजेपी (BJP) के साथ उनकी कोई 'दोस्ती' नहीं होगी.

जमीन मजबूत करने पर जोर 
हालांकि प्रदेश अध्यक्ष की इस घोषणा ने कार्यकर्ताओं के सामने कई सवाल खड़े कर दिये हैं. इनका जवाब वे नीतीश कुमार के सम्मेलन में ढूंढ़ते नजर आए. बीते शनिवार को हुए इस सम्मेलन में प्रदेश के नेता एक-दूसरे को जमीन पर काम करने की भी सलाह देते नजर आए. झारखंड जेडीयू के नेता प्रवीण सिंह ने कार्यकर्ताओं को वॉट्सअप से बाहर निकलकर जमीन मजबूत करने की नसीहत दी, तो पूर्व विधायक खीरू महतो और सुधा चौधरी ने भी संगठन मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया. खीरू महतो ने तो नीतीश सरकार के शराबबंदी माॅडल को अभियान का रूप देने से पहले कार्यकर्ताओं को खुद इस पर अमल करने की सलाह दी.

केंद्रीय नेताओं के संबोधन की बारी आई, तो उन्होंने भी चुनावों में जीत से ज्यादा झारखंड में सिमटती पार्टी की जमीन को लेकर चिंता जताई. और सत्ता की सियासत के बजाय अगले पांच साल तक पार्टी की जड़ें प्रदेश भर में जमाने की सलाह दी. राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने बिहार में मजबूत संगठन होने के बावजूद झारखंड में जेडीयू के सिमटने पर आश्चर्य जताया. उन्होंने इसके लिए केंद्रीय व स्थानीय नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया.

प्रशांत किशोर ने कहा कि महज कुछ महीनों की मेहनत से बेहतर चुनावी नतीजों की उम्मीद बेमानी है. प्रदेश संगठन को 50 ऐसे नेताओं की फौज तैयार करनी होगी, जो जेडीयू को झारखंड में क्षेत्रवार मजबूत नेतृत्व दे सके.

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रांची में आयोजित जेडीयू के कार्यकर्ता सम्मेलन में नीतीश कुमार


जेडीयू की सियासी जमीन सिमटती गई
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हालांकि झारखंड में जेडीयू की जमीन साल दर साल सिमटती ही गई है. बिहार से अलग राज्य बनने के बाद वर्ष 2000 में झारखंड जेडीयू के हिस्से 8 विधायक आए. लेकिन साल 2005 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 8 से घटकर 6 पर आ गई. वर्ष 2009 में तो जेडीयू दो सीटों तक सिमट गई. 2014 का विधानसभा चुनाव पार्टी अकेले लड़ी तो खाता भी नहीं खोल पाई. ज्यादातर सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. 2014 से पहले पार्टी बीजेपी के साथ मैदान में उतरी तो कुछ सीटें हाथ भी आईं, लेकिन अलग राह चुनने पर सूपड़ा साफ हो गया.

नए चुनाव चिन्ह पर जेडीयू लड़ेगी विस चुनाव
साल 2015 में नीतीश कुमार जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, तो जलेश्वर महतो को झारखंड जेडीयू की कमान सौंपी. लेकिन वे 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ही जेडीयू छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए. उनके बाद नीतीश कुमार ने सालों से राज्य की सियासत में हाशिए पर रहे पूर्व सांसद सालखन मुर्मू को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. लेकिन मुर्मू के सामने आगे की राह बेहद चुनौतीपूर्ण है. झारखंड में जेडीयू के चुनाव चिन्ह 'तीर' को चुनाव आयोग ने जेएमएम की आपत्ति पर फ्रिज कर दिया है. यानी जेडीयू अब अपने सिंबल के बजाय नए सिंबल पर विधानसभा चुनाव लड़ेगी. पहले से कमजोर जमीन, ऊपर से नए चुनाव चिन्ह के साथ चुनावी मैदान में उतरना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा.

जेडीयू के ज्यादातर नेताओं का मानना है कि उनकी पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की गुंजाइश बहुत कम है. एक तो राष्ट्रीय पार्टियों के मुकाबले उनके पास संसाधन नहीं हैं, दूसरा राज्यों में स्थानीय नेताओं की पहचान का संकट है. कुल मिलाकर पार्टी के पास नीतीश कुमार का राष्ट्रीय चेहरा मात्र है. लेकिन नीतीश कुमार के पास दूसरे राज्यों में संगठन को मजबूती देने के लिए समय नहीं है. ऐसे में झारखंड के चुनावी मैदान में जेडीयू की डगर कठिन दिखती है.

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First published: September 9, 2019, 3:56 PM IST
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