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OMG: झारखंड के 'दशरथ मांझी' हैं सीटू गंझू, पहाड़ों के बीच 25 बरस में खोद डाला 'छोटा तालाब'

पोखरे का विस्तार करते सीटू गंझू और उनकी पत्नी कबीला सोय.

पोखरे का विस्तार करते सीटू गंझू और उनकी पत्नी कबीला सोय.

Water Scarcity: सीटू गंझू बताते हैं कि यह बात 1997 की है, जब गांव के कुएं से उन्हें किसी ने पानी लेने से रोक दिया था. तभी उन्होंने कसम खा ली थी कि चट्टान से अपने लिए पानी निकाल कर रहेंगे. दो साल की मेहनत के बाद 1999 में चट्टान से पानी निकलना शुरू हो गया. सीटू की पत्नी कबीला सोय कहती हैं कि हर दिन सुबह चट्टानों को काटना उनकी दिनचर्या बन चुका है.

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रांची. इनसान जुनूनी होता है. वह ठान ले तो कुछ भी कर सकता है. बिहार के दशरथ मांझी आपको याद होंगे, जिन्होंने अकेले दम पर पहाड़ को काटकर रास्ता निकाल लिया था. ऐसा ही एक जुनूनी शख्स झारखंड में भी है. उसने 25 साल की मेहनत खर्च कर पहाड़ों के बीच एक पोखर (जोहड़) तैयार कर दिया. अब इस पोखर का इस्तेमाल गांव भर के लोग कर रहे हैं. इस शख्स का नाम है सीटू गंझू.

सीटू गंझू झारखंड स्थित रामगढ़ के पतरातू प्रखंड में रहते हैं. यहां के सांकी पंचायत के जंगल और ऊंचे पहाड़ों के बीच एक गांव है सिलदाग. सीटू गंझू यहीं अपनी पत्नी कबीला सोय के साथ रहते हैं. तकरीबन 25 बरस से वे पहाड़ पर बसे अपने गांव में अपने दम पर एक पोखर बनाने में लगे हैं. हालांकि पोखर बनाने की शुरुआत जब उन्होंने गड्ढा खोदकर की थी तभी 1999 में ही उन्हें उस गड्ढे में पानी के दर्शन हो गए थे. पर अपनी धुन के पक्के सीटू गंझू अपनी पत्नी के साथ लगे रहे इस गड्ढे को बढ़ाकर पोखर का रूप देने में. आज की तारीख में यह पोखरा तकरीबन 40 स्क्वॉयर फीट का हो चुका है. पर गंझू अपनी पत्नी सोय के साथ अब भी जुटे हुए हैं अपने मिशन में.

न्यूज18 की टीम जब पतरातू प्रखंड के सांकी पंचायत के पहाड़ों पर पहुंची, तब इस झुलसती गर्मी में भी सीटू गंझू अपनी पत्नी कबीला सोय के साथ छेनी और हथौड़ा से चट्टानों का सीना चीरते नजर आए. सीटू ने बताया कि घर में 4 बच्चों की परवरिश और खाना पीना सबकुछ खेतीबारी से ही चलता है. हर दिन घर की जिम्मेदारी निपटाकर हम दोनों पहाड़ पर पहुंच जाते हैं छेनी हथौड़ा लेकर और अपने काम में जुट जाते हैं. उन्होंने बताया कि यहां पानी तो 1999 में ही निकल गया था. लेकिन इसे और बड़ा करने के लिए हम दोनों लगे रहे. वे बताते हैं कि गर्मी की वजह से तालाब में पानी ज्यादा जमा नहीं रह पाता. लेकिन चट्टानों से लगातार रिस रहा पानी इतना जरूर जमा हो जाता है कि पूरे गांव का काम चल जाए.

अपने इस मिशन के बारे में सीटू गंझू बताते हैं कि यह बात 1997 की है, जब गांव के कुएं से उन्हें किसी ने पानी लेने से रोक दिया था. तभी उन्होंने कसम खा ली थी कि चट्टान से अपने लिए पानी निकाल कर रहेंगे. दो साल की मेहनत के बाद 1999 में चट्टान से पानी निकलना शुरू हो गया. सीटू की पत्नी कबीला सोय कहती हैं कि हर दिन सुबह चट्टानों को काटना उनकी दिनचर्या बन चुका है. कबीला बताती हैं कि आजतक उन्होंने इस काम में किसी ग्रामीण की मदद नहीं ली. अपने मिशन पर हम अकेले लगे रहे.

सीटू गंझू कहते हैं कि सांकी पचांयत चारों तरफ पहाड़ और जंगलों से घिरा है. यहां सिलदाग में जिंदगी इतनी आसान नहीं है. ऊबड़-खाबड़ और पथरीली धरती के बीच मौसम की चुनौती भी है. गांव के लोगों को पानी के लिए भटकना मजबूरी है. लेकिन मेरा बनाया यह पोखरा मुश्किल वक्त में लोगों के काम आ रहा है. बता दें कि सिलदाग गांव के 150 घरों में रहनेवाले तकीबन 750 ग्रामीण इस गर्मी के मौसम में इसी पोखरे के भरोसे हैं. सीटू गंझू कहते हैं कि जब हम पति-पत्नी की मेहनत गांव के लोगों के चेहरे पर सुकून की तरह पसरती है तो सचमुच हमें खुशी होती है.

Tags: Ramgarh news, Water, Water supply

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