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सौदागरों के लिये 'काला हीरा' बना झारखंड का अफीम, यूरोप से लेकर पाकिस्तान तक सप्लाई

झारखंड के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर अफीम की खेती का खुलासा हुआ है

झारखंड के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर अफीम की खेती का खुलासा हुआ है

Opium Production In Jharkhand: झारखंड में उपजा अफीम पंजाब के इलाके में सबसे ज्यादा जाता है. उस अफीम को हेरोइन बनाने के ...अधिक पढ़ें

रांची. काले हीरे यानी अफीम की खेती एक बार फिर रांची जिले के साथ-साथ झारखंड प्रदेश में धड़ल्ले से की जा रही है. हालांकि शुरुआती दिनों में नशे की खेती के खिलाफ पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती. पुलिस फूल और फल आने का इंतेजार करती है उसके बाद ही इन पर करवाई करती है. अफीम की खेती जैसे ही शुरू होती है, वहीं से शुरू हो जाता है बाहरी लोगों का क्षेत्र में आना-जाना. इस वर्ष भी बड़े पैमाने पर अफीम की बुआई हुई है, लेकिन जानकारी के बावजूद भी पुलिस और नारकोटिक्स विभाग अब तक इस नशे की खेती पर नकेल कसने का काम नहीं कर रही.

झारखंड के सुदूर और भौगोलिक दृष्टिकोण से दुर्गम इलाकों में नशे की खेती एक बार फिर जोर शोर से शुरू हुई है. इसे लेकर जमीन को तैयार किया किया गया है तो  फसल की बुआई भी की जा चुकी है. न्यूज 18 की टीम उन इलाकों में पहुंची जहां अफीम की खेती जोरों से की जा रही है. अफीम की खेती ज्यादातर पानी वाले जगहों पर किया जाता है. खास तौर से उन इलाकों में अफीम की खेती की जाती है जहां पानी की मुकम्मल व्यवस्था हो. इस बार भी रांची, चतरा, खूंटी इलाके में भी जोरदार तरीके से की जाती है.

बता दें की नशे की खेती में नक्सलियों का भी बड़ा हाथ होता हैं क्योंकि अफीम की खेती से उनका आर्थिक तंत्र मजबूत होता है तो वहीं राज्य के बाहर के नशे के माफियाओं का भी बड़ा हाथ इस खेल में होता है. अफीम की खेती ज्यादातर फॉरेस्ट जमीन पर होती है ताकि अगर कोई की भी हो तो कोई न फंसे. जैसे ही पौधे तैयार होने लगते हैं, बाहरी माफियाओं की चलकदमी इलाके में बढ़ जाती है. हालांकि पुलिस की नजर इस पर जरूर है. अफीम के पौधे शुरुआती दिनों में आलू के पौधे की तरह नजर आते हैं, जिस कारण कानूनी पेचीदगी के कारण पुलिस शुरुआत में ही नशे की खेती पर नकेल नही कस पाती.

इन नशे के पौधे को अफीम दर्शना आसान नहीं होता है. हालांकि मामले पर ग्रामीण एसपी नौशाद आलम का कहना है कि पुलिस की नजर इन पर है और इसे लेकर जागरूकता भी जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर की जा रही है. इसके साथ ही लोकल इनपुट के जरिए भी इन पर नजर रखी जा रही है. झारखण्ड की अफीम के इंटरनेशनल कनेक्शन की भी बात सामने आई है. झारखण्ड पिछले कुछ वर्षो मे नशे के इस खेती का हब बन गया है. झारखण्ड में उगाई जा रही अफीम देश के दूसरे हिस्सों के अलावे विदेशों तक पहुंचाई जा रही है.

पिछले साल उत्तर प्रदेश के शाजहापुर में 11 करोड़ की अफीम की खेप पुलिस के हाथ लगने के बाद ये बातें सामने आई हैं. झारखण्ड में काले हीरे के रूप में कोयले को जाना जाता था लेकिन अब इसकी जगह अफीम ने ले ली है और अफीम की खेती धड़ल्ले से की जा रही है. पंजाब के इलाके में झारखंड की अफीम सबसे ज्यादा जाती है जिसके बाद उस अफीम को हेरोइन बनाने के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भेजा जाता है, जहां से हेरोइन को यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में भेज जाता हैं वही कुछ हिस्सा बर्मा में भी भेजा जाता है.

पूर्व आईपीएस अरुण उरांव ने बताया कि झारखंड में अफीम की खेती चतरा इलाके से शुरू हुई जिसके बाद खूंटी जिले में अफीम का हब बन गया है. नक्सल बेल्ट रहने के कारण पुलिस इन इलाकों में जाने से भी परहेज करती थी. उन्होंने कहा कि अफीम की खेती बड़े पैमाने से की जाती है और इसके फूल और फल दूर से ही दिख जाते हैं, ऐसे में उन्होंने भी सवाल उठाया की इसमे पुलिस और फारेस्ट विभाग की मिलीभगत है।

पूरे मामले में झारखण्ड पुलिस के आईजी अभियान अमोल विनुकांत होमकार का कहना है कि झारखंड में अफीम की खेती पर काफी हद तक नकेल कसी गई है. यही वजह है कि 2020- 21 में करीब 2 हज़ार एकड़ में अफीम की खेती को नष्ट किया गया है. केंद्रीय एजेंसी के साथ-साथ दूसरे संबंधित विभागों से भी समन्वय बनाकर काम किया जा रहा है. झारखण्ड पुलिस प्रवक्ता अमोल विणुकान्त होमकर ने बताया कि झारखण्ड पुलिस को इसमे सफलता भी मिली है और 2021 में 450 अफीम तस्करों को भी पकड़ा गया है. हालांकि उन्होंने है जरूर कहा कि झारखण्ड की भौगोलिक स्थिति के कारण पुलिस को हर महत्वपूर्ण जानकारी नहीं मिल पाती, इस वजह से कई इलाकों में अफीम की खेती नष्ट नहीं किया जा पाता.

Tags: Jharkhand news, Opium, Opium smuggling, Ranchi news

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