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ना इनकार ना इजहार! खतियान आधारित स्थानीय नीति के मुद्दे पर झारखंड के सियासी दल बस बेकरार

ना इनकार ना इजहार! खतियान आधारित स्थानीय नीति के मुद्दे पर झारखंड के सियासी दल बस बेकरार

झारखंड में खतियान आधारित स्थानीय नीति के मुद्दे पर सियासत तेज हो गई है.

झारखंड में खतियान आधारित स्थानीय नीति के मुद्दे पर सियासत तेज हो गई है.

Jharkhand Politics: झारखंड अलग राज्य गठन के वक्त भी डोमिसाइल के जिन्न ने खूब हंगामा मचाया था. इस बार ये शुरुआत सत्ताधारी दल जेएमएम की तरफ से हुई है. कहने को तो जेएमएम के पूर्व विधायक अमित महतो ने इस सवाल को उठाते हुए खुद को बागी बना दिया है, पर इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि पार्टी के कई नेताओं का इस मुद्दे पर उनको मौन समर्थन है.

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रांची. झारखंड में एक बार फिर खतियान आधारित स्थानीय नीति का जिन्न राजनीति के मैदान में उतार आया है. भाषायी अतिक्रमण के नाम पर समाज को बांटने की सियासत भी शुरू हो गई है. दरअसल राजनीति के अंदरखाने पक रही इस खिचड़ी में वोट बैंक का राज छुपा हुआ है.

झारखंड अलग राज्य गठन के वक्त भी डोमिसाइल के नाम पर जिन्न ने खूब हंगामा मचाया था. इस बार ये शुरुआत सत्ताधारी दल जेएमएम की तरफ से हुई है. कहने को तो जेएमएम के पूर्व विधायक अमित महतो ने इस सवाल को उठाते हुए खुद को बागी बना दिया है, पर इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि पार्टी के कई नेताओं का इस मुद्दे पर मौन समर्थन है. इसके पीछे की मूल वजह वोट बैंक की राजनीति है.

जेएमएम ने खतियान आधारित स्थानीय नीति और भाषायी अतिक्रमण का राग छेड़ते हुए सहयोगी दल कांग्रेस की परेशानी बढ़ा दी है. कांग्रेस की राजनीति और उसका वोट बैंक उसी से जुड़ा हुआ है जिसके विरोध में जेएमएम के नेता आवाज बुलंद कर रहे हैं. यही वजह है कि कांग्रेस स्थानीय नीति और नियोजन नीति के बीच फर्क को परिभाषित करने में जुट गई है.

प्रदेश प्रवक्ता राजीव रंजन का कहना है कि अबतक लोग स्थानीय नीति और नियोजन नीति को नहीं समझ पाए हैं. भोजपुरी, मगही और अंगिका के सवाल पर कांग्रेस अपने कदम पीछे करने को तैयार नहीं है.

बिहार से अलग हुए झारखंड को 21साल बीत गए. इस लंबी अवधि के बाद भी स्थानीय नीति को लेकर असमंजस की स्थिति है. बीजेपी के लिये भी ये तय कर पाना इतना आसान नहीं है कि स्थानीय नीति का मापदंड क्या होना चाहिये. खतियान आधारित स्थानीय नीति को लेकर बीजेपी का एक धरा लामबंद तो दिखता है, पर खुले मंच से इसकी घोषणा कर पार्टी भी एक वर्ग को नाराज नहीं करना चाहती है. यही वजह है कि बीजेपी का जवाब राज्य सरकार की नाकामियों तक ही सीमित दिखती है.

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता अविनेश कुमार का कहना है कि शराब की होम डिलीवरी करने वाली राज्य सरकार ऐसी राजनीति में लोगों को फंसा कर अपना स्वार्थ साधने में जुटी है.

राजनीति में समानता का गाना हर एक दल की जुबानी आपको जरूर सुनने को मिल जाएगी, पर असल में समाज को बांटने की राजनीति ही देखने को मिलती है. फिर वो बात जाति – वर्ग और समाज को बांटने की करें या भाषा के नाम पर बांटने की. झारखंड में भी इस वक्त कुछ ऐसा ही चल रहा है.

खतियान आधारित स्थानीय नीति बनने से इन जिलों में कांग्रेस को नुकसान हो सकता है. धनबाद , बोकारो, गढ़वा, पलामू, गोड्डा, साहिबगंज में भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलने वालों की संख्या ज्यादा है. इन जिलों में जेएमएम की पकड़ कमजोर है. वहीं राजद को भी खतियान आधारित स्थानीय नीति और भाषायी राजनीति से नुकसान हो सकता है.

Tags: BJP, Jharkhand Congress, Jharkhand mukti morcha, Jharkhand Politics, RJD

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