कभी देश के टॉप 5 कॉलेज में था शुमार, आज बदहाली का रोना रो रहा झारखंड का एक मात्र पशु अस्पताल

रांची वेटनरी कॉलेज की स्थापना साल 1961 में हुई थी.

रांची वेटनरी कॉलेज (Ranchi Veterinary College) में कुल 125 स्वीकृत पदों में सिर्फ 16 ही स्थायी डॉक्टर्स और कर्मी अपनी सेवा दे रहे हैं. बाकी 28 अनुबंधित प्रोफेसर, डॉक्टर्स और कर्मियों के भरोसे यह कॉलेज चल रहा है. ऊपर से हालत ये है कि यहां ICU से लेकर ऑपरेशन थियेटर तक में ज्यादातर मशीनें खराब हैं.

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रांची. झारखंड में पशुओं के इलाज के लिए एकमात्र पशु अस्पताल, रांची वेटनरी कॉलेज (Ranchi Veterinary College) आज खुद बदहाली की बीमारी से जूझ रहा है. कभी देश के टॉप पांच वेटनरी कॉलेज में शुमार यह कॉलेज आज मानव संसाधन की कमी के साथ-साथ खराब मशीनों के बीच अपनी सांसें गिन रहा है. बड़ा सवाल यह है कि इस व्यवस्था के बीच पढ़ाई के साथ-साथ पशुओं का इलाज हो तो कैसे?

बेहद खूबसूरत, भव्य और आलीशान दिखने वाले रांची वेटनरी कॉलेज की इमारतों के गलियारों में एक खामोशी है. ये खामोशी डॉक्टर्स और कर्मचारियों के साथ पशुपालकों से गुलजार रहने वाले इस कॉलेज की विरासत की कहानी को बयां करती हैं. वेटनरी कॉलेज में पशु विज्ञान से संबंधित पढ़ाई करने वाले छात्रों को पढ़ाने के लिए न तो पर्याप्त प्रोफेसर हैं और न ही पशुओं के इलाज के लिए डॉक्टर्स. इस कॉलेज में कुल 125 स्वीकृत पदों में सिर्फ 16 ही स्थायी डॉक्टर्स और कर्मी अपनी सेवा दे रहे हैं. बाकी 28 अनुबंधित प्रोफेसर, डॉक्टर्स और कर्मियों के भरोसे यह कॉलेज चल रहा है. ऊपर से हालत ये है कि यहां ICU से लेकर ऑपरेशन थियेटर तक ज्यादातर मशीनें खराब हैं. लिहाजा एक्सरे, अल्ट्रासाउंड समेत दूसरे जांच के लिए लोगों को अपने पेट को निजी लैब का रुख करना पड़ता है.

कॉलेज में 35 साल से ज्यादा समय से दैनिक भोगी के रूप में काम कर रहे लार्जुस डुंगडुंग बताते हैं कि तीन दशक से ज्यादा समय इस कॉलेज के गलियारों में गुजर गये. लेकिन आज तक वेतन का मुंह नहीं देख पाया.

वहीं कॉलेज के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. आलोक बताते हैं कि मैन पावर की कमी इस कॉलेज की सबसे बड़ी समस्या है. आज यहां की पूरी व्यवस्था अनुबंधित कर्मियों के भरोसे ही चल रही है.

रांची वेटनरी कॉलेज के डीन डॉ. सुशील प्रसाद की मानें तो 2005 के बाद यहां स्थायी नियुक्ति हुई ही नहीं. ऐसे में पढा़ई के साथ साथ पशुओं के इलाज पर भी सीधा असर पड़ रहा है. उन्होंने बताया कि कॉलेज की खराब जांच मशीनों के बारे में राज्य सरकार को पत्र लिखा गया है. जल्द ही नये जांच मशीन आ जाएंगे.

परेशानी की कहानी सिर्फ इतने पर खत्म नहीं होती. कॉलेज के हर विभाग में जितने प्रोफेसर और डॉक्टर्स होने चाहिए. उसकी तुलना में इक्का दुक्का स्थायी और अनुबंधित डॉक्टर्स के भरोसे यह कॉलेज चल रहा है.

किस विभाग में कितने डॉक्टर्स?

* सर्जरी विभाग में 1 स्थायी और 2 अनुबंध डॉक्टर
* मेडिसीन विभाग में सिर्फ चार स्थायी डॉक्टर
* पशु गर्भ विज्ञान विभाग एक अनुंबधित डॉक्टर के भरोसे
* वेटनरी क्लिनिकल कॉम्पलेक्स में 4 अनुंबधित डॉक्टर्स

ऐसे में जहां पहले बीमार पशुओं के साथ पशुपालकों की भीड़ लगी होती थी. आज एक दिन में करीब 40 लोग ही अपने पेट के साथ यहां पहुंचते हैं. वह भी सुविधाओं की कमी की वजह से हजार शिकायतों के साथ यहां से लौटते हैं.

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