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झारखंड में योजनाओं की हकीकत: सीएम हेमंत के हाथों मिले चेक, अधिकारी कर रहे खेल, बेचारा लाभुक...

झारखंड में योजनाओं की हकीकत: सीएम हेमंत के हाथों मिले चेक, अधिकारी कर रहे खेल, बेचारा लाभुक...

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों मिले चेक के पैसे दो महीने बाद भी लाभुकों को नहीं मिल पाए हैं.

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों मिले चेक के पैसे दो महीने बाद भी लाभुकों को नहीं मिल पाए हैं.

Jharkhand News: झारखंड स्थापना दिवस के दिन 15 नवंबर को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों सुजित पाहन को 50 हजार का डम्मी चेक मिला था. अधिकारियों ने कहा अगले दो से चार दिनों में पैसे उसके बैंक अकाउंट में चले जाएंगे. लेकिन दो महीने बीतने के बाद भी पूरे पैसे नहीं आए हैं. दो दिन पहले 25 हजार रुपया भेजा गया.

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रांची. झारखंड में योजना के नाम पर धोखा देने का खेल चल रहा है. लाभुक सरकार की योजना मिलने के बाद भी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. हैरान करने वाली बात ये है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों वितरण की गई योजना के बावजूद लाभुकों के हाथ खाली हैं. मुख्य्मंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत लाभुकों को हेमंत सोरेन के हाथों मिली 50 हजार रुपये के डम्मी चेक की क्या है हकीकत, इस खास रिपोर्ट में पढिये.

झारखंड में मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना को लेकर हेमंत सोरेन सरकार हर दिन नये दावे कर रही है. योजना के तहत रोजगार के लिये दी जानी वाली राशि से भविष्य को संवारने का दावा किया जा रहा है. ‘आपके अधिकार – आपकी सरकार – आपके द्वार’ कार्यक्रम में मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना के तहत कई नौजवान लाभुकों को 50 हजार रुपये तक का चेक बांटा गया. पर क्या ये सरकारी चेक कैश हो पाए हैं. क्या लाभुकों को इस राशि का लाभ मिला.

पहला केस स्टडी
खूंटी जिले के रेमता गांव निवासी सुजीत पाहन. सुजीत फिलहाल बीए पार्ट-3 का छात्र है. बचपन से ही दायीं आंख से ठीक दिखाई नहीं देने के चलते सुजीत पाहन ने विकलांग कोटे से मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना के लिये आवेदन दिया था. किसान घर से ताल्लुक रखने वाले इस दिव्यांग युवक ने समझा कि अगर योजना का लाभ मिला तो गांव में एक छोटी सी दुकान खोल लेंगे. आवेदन स्वीकृति की सूचना जब सुजीत को मिली, तो उसे लगा शायद अब वो अपने घर वालों के कुछ काम आ जाएगा. दूसरे ही दिन जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों चेक मिलने की सूचना मिली तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. झारखंड स्थापना दिवस के दिन 15 नवंबर को उलिहातू में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हाथों 50 हजार का डम्मी चेक उसने ग्रहण किया. अधिकारियों ने कहा अगले दो से चार दिनों में पैसा बैंक अकाउंट में खुद व खुद चला जायेगा. लेकिन यही से शुरू हुई योजना के नाम पर लाभुक से साथ सरकार के धोखा का खेल.

दो से चार, चार से दस और दस से जब बीस दिन बीत गए, तब सुजीत को कल्याण विभाग के अधिकारियों के आश्वासन से भरोसा उठने लगा. वह हर दिन दिव्यांग होने के बावजूद सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगाता रहा. लेकिन फिर भी उसके हाथ एक फूटी कोड़ी नहीं लगी. 14 जनवरी 2022 को जब न्यूज- 18 ने इसकी पड़ताल शुरू की तो सुजीत ने अपनी आपबीती सुनाई. योजना को लेकर जब हमने अधिकारियों को फोन घुमाना शुरू किया, तो अधिकारी भी सकते में आ गए. सुजीत के खाते में दिन के 3 बजकर 33 मिनट पर NEFT के जरिये 25 हजार भेजे जाने का मैसेज आ गया.

सुजीत पाहन के खाते में दो दिन नहीं दो माह बाद 25 हजार रुपया सरकार ने डाला है. सुजीत के पिता जयराम पाहन राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से बाकी के 25 हजार रुपया को लेकर सवाल पूछ रहे हैं. उनका कहना है कि योजना के नाम पर लाभुकों के साथ ऐसा धोखा करना सही नहीं है. ऐसा करने से सरकार की योजना से लोगों का विश्वास खत्म हो जाएगा.

दूसरा केस स्टडी

मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना के नाम पर धोखा खाने वालों में सुजीत अकेला नहीं है. बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू में 15 नवंबर को खूंटी के तिरला निवासी सुरंजन तिडू के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. सुरंजन भी सुजीत की तरह ही पिछले दो माह से सरकार के डम्मी चेक को कैश कराने के दर – दर की ठोकर खाने को मजबूर है. सुरंजन ने सोचा था कि योजना के तहत 50 हजार रुपया मिल जाने पर लॉकडाउन के दौरान बंद हुए होटल को फिर चालू कर लेंगे. खूंटी कोर्ट परिसर में सुरंजन का एक छोटा सा भोजनालय है. लेकिन वो भी नहीं हो सका, फिलहाल ऑटो चलाकर किसी तरह परिवार का भरण पोषण कर रहा है.

सुरंजन के खाते में भी 14 जनवरी 2022 को दिन के करीब 3 बजकर 5 मिनट पर बैंक खाते में 25 हजार रुपया आने का मैसेज आया. वो अब इस बात को लेकर चिंतित है कि इतने कम पैसे में होटल फिर से कैसे चालू होगा. लॉकडाउन के दौरान जो कर्ज लिया है उसे भी चुकता करना है. सरकार बाकी का 25 हजार रुपये कब देगी ये कह पाना मुश्किल है.

झारखंड में सरकारी योजना की लेटलतीफी तो आम बात है, पर मुख्यमंत्री के हाथों चुनिंदा लाभुकों के बीच वितरित योजना का ये हश्र होगा, ये कोई नहीं जानता था. मुख्यमंत्री के हाथों योजना का वितरण के बाद अगर राज्य के अधिकारियों का ये रवैया है, तो आप समझ लीजिये सुदूर गांव के किसी ग्रामीण को सरकार की योजना पाने के लिये कितना पापड़ बेलना पड़ता होगा.

Tags: Hemant soren, Hemant soren government, Jharkhand news

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