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झारखंड में जनजातीय भाषाओं की हकीकत, ना शिक्षक ना छात्र, सिर्फ सियासत

झारखंड में जनजातीय भाषाओं की हकीकत, ना शिक्षक ना छात्र, सिर्फ सियासत

झारखंड सरकार 9 जनजातीय भाषाओं को बढ़ावा देने पर फोकस कर रही है.

झारखंड सरकार 9 जनजातीय भाषाओं को बढ़ावा देने पर फोकस कर रही है.

Jharkhand News: झारखंड में इनदिनों जनजातीय भाषा के नाम पर खूब राजनीति हो रही है. शिक्षा से लेकर रोजगार देने के नाम पर जनजातीय भाषा की अनिवार्यता का फार्मूला तय हो रहा है. सरकार ने 9 जनजातीय और 3 क्षेत्रीय भाषा को रोजगार पाने के लिये अनिवार्य कर दिया है.

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रांची. झारखंड में जनजातीय भाषा के नाम पर राजनीति और हकीकत में बहुत बड़ा फर्क है. राज्य की हेमंत सोरेन सरकार भले ही जनजातीय भाषा को बढ़ावा देने को लेकर नई कार्य योजना तैयार कर रही हो, पर हकीकत ये है कि जनजातीय भाषा की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये पद सृजन का कार्य भी आरंभ नहीं हो पाया है. ऐसे में बगैर शिक्षक के प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा में जनजातीय भाषा का विकास कैसे मुमकिन होगा, इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है.

झारखंड में इन दिनों जनजातीय भाषा के नाम पर खुब राजनीति हो रही है. शिक्षा से लेकर रोजगार देने के नाम पर जनजातीय भाषा की अनिवार्यता का फार्मूला तय हो रहा है. राज्य में वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार ने 9 जनजातीय और 3 क्षेत्रीय भाषा को रोजगार पाने के लिये अनिवार्य कर दिया है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या राज्य में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा के शिक्षक मौजूद हैं?

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा के HOD डॉ हरि उरांव के अनुसार साल 1980 में रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना हुई. साल 1986- 87 में 51 शिक्षकों को इसके लिये रखा गया. तब से लेकर आज तक की बात करें तो इसमें सिर्फ 26 शिक्षकों का इजाफा हुआ है.

राज्य सरकार का फोकस 9 जनजातीय भाषा के विकास पर है. इसमें हो , मुंडारी , संथाली , खरिया , कुडुख , नागपुरी , पंचपरगनिया , कुरमाली और खोरठा शामिल हैं. वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार ने नियुक्ति में भी 9 जनजातीय भाषाओं के जानकार अभ्यर्थियों को तव्वजो देने का निर्णय लिया है. मगर ये कैसे संभव होगा ये कोई नहीं जानता.

झारखंड गठन से पहले की बात करें या राज्य गठन के बाद की, जनजातीय भाषा के विकास, शिक्षा और रोजगार में प्राथमिकता की आवाज सिर्फ राजनीतिक नफा- नुकसान तक ही सीमित रही. प्राथमिक विद्यालय में अब जनजातीय भाषा के शिक्षकों की नियुक्ति पर राज्य सरकार रोजाना बयानबाजी कर रही है, पर हकीकत ये है कि अब तक पद सृजन का कार्य भी सरकार ने पूरा नहीं किया है. यही हाल उच्च शिक्षा का भी है.

झारखंड असिस्टेंट प्रोफेसर अनुबंध संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ निरंजन महतो का कहना है कि अब बयानवीर से काम नहीं चलेगा, बल्कि राज्य सरकार को शिक्षक बहाल कर इसे पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा.

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा के प्रति छात्रों का झुकाव कम नहीं है, पर समय के साथ बेहतर शिक्षा व्यवस्था नहीं होने से इनकी संख्या में तेजी से गिरावट जरूर हो रही है. दीपक उरांव, मालती कच्छप जैसे छात्र अपनी रीति – रिवाज और संस्कृति को बचाने और बढाने के लिये जनजातीय भाषा उच्च शिक्षा ग्रहण करना चाहते हैं. उन्हें पता है कि अगर जनजातीय भाषा के जानकार नहीं होंगे, तो उनके इतिहास और संस्कृति को बचा पाना बड़ी चुनौती होगी.

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा को बचाने और बढ़ाने का प्रयास जरूर बेहतर है, पर ऐसा तभी संभव हो पायेगा जब राज्य सरकार बयानबाजी से ऊपर उठकर ठोस कदम उठाए. खासकर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा के शिक्षकों के लिये विद्यालयों में पद का सृजन किया जाए, क्योंकि जब तक जनजातीय भाषा को पढ़ाने वाले नहीं होंगे, तब तक झारखंड के युवा जनजातीय या क्षेत्रीय भाषा के जानकार कैसे हो सकते हैं. उन्हें कैसे सरकारी नियुक्ति में मौका मिल सकता है.

Tags: CM Hemant Soren, Jharkhand Government, Jharkhand news, Ranchi news

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