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रांची में मुहर्रम पर नहीं निकला ताजिया, शिया समुदाय को साल-दर-साल घटते ताजियों का मलाल

रांची में कोरोना गाइडलाइंस के कारण मुहर्रम पर ताजिये का जुलूस कहीं नजर नहीं आया.

रांची में कोरोना गाइडलाइंस के कारण मुहर्रम पर ताजिये का जुलूस कहीं नजर नहीं आया.

Muharram in Ranchi: झारखंड में शिया समुदाय के लोगों की कुल संख्या महज 20 से 25 हजार तक है. जबकि रांची में करीब 600 से 7 ...अधिक पढ़ें

रांची. राजधानी रांची समेत राज्यभर में मुहर्रम (Muharram) के मातम पर मस्जिदों में विशेष नमाज अदा की गयी. लेकिन कोरोना (Corona) को लेकर जारी गाइडलाइंस के कारण राजधानी में कहीं भी सड़कों पर ताजिये का जुलूस नजर नहीं आया. खासकर शिया समुदाय के ताजिये की जो रौनक आज से कुछ दशक पहले तक देखने को मिलती थी, आज वह सिमटता नजर आ रहा है.

राजधानी रांची समेत राज्यभर में इस बार मुहर्रम का मातमी अंदाज मस्जिदों में ही सिमटा नजर आया. चूंकि मुहर्रम का मातम मनाने का अंदाज शिया और सुन्नी समुदायों का अलग-अलग है. लिहाजा दोनों का जिक्र करना जरूरी है. राजधानी रांची के शिया मस्जिदों में आज लोग काले लिबास में मातम मनाते नजर आये. शिया समुदाय के लोग साल-1961 हिजरी में मैदान ए कर्बला में 72 निहत्थों की शहादत को भूले नहीं पाए हैं.

पिछले साल और इस बार कोरोना गाइडलाइंस की वजह से ताजिये के जुलूस पर रोक की बात छोड़ दें तो साल दर साल शिया समुदाय के ताजियों की संख्या सिमटती जा रही है. रांची के मस्जिद जकारिया के इमाम खतीन इसकी वजह सुन्नियों में आपसी फूट को बताते हैं. उनकी मानें तो देवबंदी और अल हदीस के अलगाव की वजह से ऐसा हुआ है.

वहीं सुन्नी समुदाय के लोग शिया समुदाय की आपसी फूट वाले बात से सीधे इनकार करते हैं. सेंट्रल मुहर्रम कमिटी के महासचिव अकीलुर्रहमान बताते हैं कि उनका मुहर्रम मनाने का अंदाज उनसे अलग है. चाहे बात शोक प्रकट करने की हो या फिर दुआ मांगने या अलग खड़ा करने का, जो सुन्नियों का झंडा होता है. सभी कुछ थोड़ा अलग है. वहीं, शिया समुदाय के तहजीबुल हसन की मानें तो शिया समुदाय के लोग मुहर्रम का चांद देख लेने के बाद से ही शोक में डूब जाते हैं. उसके बाद से 2 महीने 8 दिन तक न तो घर में कोई पकवान बनता है. और न ही कोई खुशी या फिर किसी समारोह का आयोजन ही होता है. लेकिन सुन्नियों में ऐसा नहीं होता.

राज्यभर में शिया समुदाय के लोगों की कुल संख्या महज 20 से 25 हजार तक है. जबकि रांची में करीब 600 से 700 इस समुदाय के लोग रहते हैं. जबकि सुन्नियों की संख्या लाखों में हैं. शिया समुदाय के रांची में कुल 6 कर्बला हैं. जहां शिया अपनी इबादत करते हैं. कर्बला उस जगह को माना जाता है. जहां इमाम हुसैन की मिट्टी को दफनाया गया था. वहीं कर्बला मनाया जाता है. हालांकि शिया समुदाय को अपनी संख्या कम होने का गम नहीं. क्योंकि वे खुद को अल्लाह के बेहद करीब मानते हैं. लेकिन उनके दिल में कहीं न कहीं ताजियों की संख्या में कमी आने का मलाल जरूर है.

Tags: Jharkhand news, Muharram, Ranchi news

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