लाइव टीवी

झाविमो में शह और मात का खेल अंतिम दौर में, कभी भी हो सकता है पटाक्षेप 
Ranchi News in Hindi

Rajesh Tomar | News18 Jharkhand
Updated: January 22, 2020, 12:37 PM IST
झाविमो में शह और मात का खेल अंतिम दौर में, कभी भी हो सकता है पटाक्षेप 
बाबूलाल मरांडी हर हाल में झाविमो का विलय बीजेपी में कराना चाहते हैं. (फाइल फोटो)

जानकार बताते हैं कि चुनाव से पहले से ही बाबूलाल मरांडी भाजपा के सम्पर्क में थे. और कुछ करीबी पुराने मध्यस्थ हर हाल में बाबूलाल की भाजपा में घर वापसी चाहते हैं.

  • Share this:
रांची. झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) (JVM) के नेताओं के बीच सांप-सीढ़ी का खेल बदस्तूर जारी है. पार्टी सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी (Babulal Marandi) पार्टी भंगकर भाजपा (BJP) में विलय कराकर जहां अपनी गोटी लाल करने की फिराक में है, वहीं तीन विधायकों वाली झाविमो के अन्य दो कद्दावर विधायक बंधु तिर्की और प्रदीप यादव अनुसूची-10 की आड़ में पार्टी का कमान अपने हाथों में लेना चाहते हैं. ताकि वे अपनी ताकत दिखाकर मजबूत दावेदारी के साथ मनपसंद पार्टी में शामिल हो सकें. एक तरफ जहां बंधु तिर्की कांग्रेस में शामिल होना चाह रहे है, तो वहीं प्रदीप यादव भाजपा या फिर कांग्रेस में बड़ी जिम्मेदारी तलाश रहे हैं. इनके मंसूबों के बीच अब भाजपा बाबूलाल मरांडी को और वक्त देने के मूड में नहीं है. क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में जेपी नड्डा का चयन होने के साथ प्रदेश में भी संगठन को दुरुस्त करना बीजेपी की प्राथमिकता है. उधर, राज्यसभा की एक सीट पाने के लिए जोर लगा रही कांग्रेस अब बंधु या प्रदीप के लिए और देर नहीं कर सकती है. क्योंकि मंत्रिमंडल विस्तार में देरी से सूबे की राजनीति में गलत संकेत जा सकता है. ऐसे में झाविमो में चल रहे शह और मात का खेल अब अंतिम और निर्णायक दौर में है. अब और देरी हुई, तो मंजिल के करीब पहुंच चुके झाविमो के नेताओं के मंसूबे पर पानी फिर सकता है.


भाजपा में वापसी को लेकर बाबूलाल बेकरार 

झारखंड में विधानसभा चुनाव से पहले ही बाबूलाल मरांडी और उनकी पार्टी झाविमो को भाजपा की बी टीम के रूप में देखा जा रहा था. इसके पीछे ठोस वजह यह था कि लोकसभा चुनाव में महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ने वाले बाबूलाल मरांडी और उनकी पार्टी ने विधानसभा चुनाव में खुद को महागठबंधन से किनारा कर लिया. और सूबे की सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया. इतना ही नहीं बाबूलाल मरांडी उड़नखटोले से प्रत्याशियों के पक्ष में ताबड़तोड़ रैलियां भी कीं. साथ ही कुछ जगहों पर बूथ कार्यकर्ताओं को पैसों से भी मदद की. तब सवाल खड़ा हुआ था कि 2009 और 2014 के चुनाव के बाद पार्टी के नवनिर्वचित विधायक सहित सबकुछ गवां चुके और लम्बे समय से सक्रिय राजनीति से निर्वासन झेल रहे बाबूलाल मरांडी को इस चुनाव में ताकत और पैसे कहां से  मिले. साथ ही ये भी सवाल उठा कि आखिर विपक्ष और भाजपा से नफरत करने बाले बाबूलाल मरांडी ने महगठबंधन के वोट बैंक में क्यों सेंध लगाने की सोची.



जानकार बताते हैं कि चुनाव से पहले से ही बाबूलाल मरांडी भाजपा के सम्पर्क में थे. और कुछ करीबी पुराने मध्यस्थ हर हाल में बाबूलाल की भाजपा में घर वापसी चाहते थे. चर्चा तो यह भी था कि संगठन बनाने और चलाने में दक्ष बाबूलाल अगर 5 से 6 सीटें जीत जाते, तो भाजपा के तरफ से वहीं मुख्यमंत्री होते. लेकिन चुनाव परिणाम थोड़ा निराशाजनक रहा. और झाविमो के खाते में महज तीन विधायक आए. भाजपा के खुद का भी प्रदर्शन निराशाजनक रहा. भाजपा महज 25 सीटें ही जीत पायी. लिहाजा सरकार गठन की गुंजाइश दूर-दूर तक नहीं बनी. सूबे में पांच वर्षों तक राज करने वाली भाजपा के सभी रसूखदार नेता और सरकार के मुख्यमंत्री रहे रघुवर दास, प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ सहित विधानसभा अध्यक्ष रहे दिनेश उरांव भी चुनाव हार गए.

आज सूबे में प्रदेश भाजपा के पास न तो नेता प्रतिपक्ष और न ही पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए कोई सशक्त चेहरा. ऐसे में बाबूलाल मरांडी को अपने लिए भाजपा में बड़ी उम्मीदें दिख रही हैं. वहीं भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं में बाबूलाल में पार्टी का भविष्य दिख रहा है. लेकिन अब भाजपा बाबूलाल और उनकी पार्टी में चल रहे लुका छिपी के खेल से खपा हो रही है. इसके पीछे एक कारण यह भी है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन के साथ ही प्रदेश इकाई में संगठन का खाका खींचा जाना है. ऐसे में अब और देरी सम्भव नहीं है. लिहाजा बाबूलाल मरांडी को झाविमो में चल रहे आपसी विवाद को खत्म करते हुए ठोस निर्णय लेना होगा. क्योंकि भाजपा अब इस मसले को और लटकाने के मूड में नहीं है.


प्रदीप यादव की नजर कांग्रेस और भाजपा के मलाइदार पद पर 

भाजपा में झाविमो के विलय को उताबले बाबूलाल को अपने सबसे पुराने चहेते और विश्वस्त  सिपहसलार प्रदीप यादव का साथ मिलता दिख नहीं रहा है. विधानसभा सत्रों में अकेले जौहर दिखाने वाले झाविमो के कद्दावर नेता प्रदीप यादव भाजपा में जाना तो चाहते है, लेकिन खुद के लिए बड़ी भूमिका के साथ. भाजपा में बाबूलाल को बड़ी भूमिका मिलना तय माना जा रहा है. ऐसे में प्रदीप भाजपा में खुद को विधायक दल के नेता के रूप में देखना चाहते है. साथ ही पार्टी में अपने चहेतों के लिए भी महत्वपूर्ण पद चाहते हैं. लेकिन भाजपा को प्रदीप के शर्तों पर एतराज है. वो आते हैं तो उनका स्वागत है. लेकिन पार्टी के अंदर किसी बड़े पदों पर डील सम्भव नहीं है. लेकिन प्रदीप यादव को अब भी आस है कि सूबे के चुनाव में फजीहत करा चुकी भाजपा को उन जैसे नेताओं के आने से बल मिलेगा. लेकिन अगर बात नहीं बनती है, तो वो कांग्रेस में भी अपनी भूमिका देख रहे हैं. कुछ ही महीनों बाद राज्यसभा का चुनाव है. ऐसे में प्रदीप और बंधु तिर्की के शामिल होने से कांग्रेस को बड़ा फायदा हो सकता है. ऐसे में प्रदीप पिछड़ी जाति के कोटे से मंत्रीपद के भी दावेदार हो सकते हैं. बशर्ते कि बंधु तिर्की दावा छोड़ दें.


संभावना बनी तो कांग्रेस अपने कोटे से झाविमो के दो विधायकों में एक को मंत्रीपद देकर दूर की सियासी दांव खेल सकती है. लेकिन यहां भी प्रदीप के लिए बंधु को मनाना और पार्टी को लेकर जल्द निर्णय लेना होगा. क्योंकि एक महीने बीत जाने के बाद अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए मंत्रिपरिषद के विस्तार में देरी से सूबे में गलत संकेत जा सकता है. वहीं देरी की वजह से विपक्ष ने हल्ला भी बोलना शुरू कर दिया है. प्रदीप अगर बंधु को मनाने में नाकाम होते हैं, तो फिर किसी भी जल्दबाजी का नुकसान भी तय है. और इसका सीधा फायदा बाबूलाल मरांडी को मिलेगा. ऐसे में प्रदीप किधर जाएंगे, इसको लेकर संशय बना हुआ है.


बंधु तिर्की की पसंद सिर्फ कांग्रेस, लेकिन प्रदीप का साथ जरूरी 

बाबूलाल के लिए संकट के वक्त में खड़े रहने वाले बंधु तिर्की उनके भाजपा में जाने और पार्टी के विलय को लेकर खासे खपा हैं और सीधे बाबूलाल पर हमला बोल रहे हैं. उन्होंने साफ कहा कि बाबूलाल जहां चाहे जाएं, लेकिन पार्टी की विलय की बात न करें. साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि वो आरम्भ से ही भाजपा के विरोध की राजनीति करते रहे हैं. इसबार भी मांडर की जनता ने उन्हें भाजपा के खिलाफ जीताकर सदन में भेजा है. ऐसे में उनके लिए भाजपा में जाना सम्भव नहीं है. वहीं आदिवासी नेताओं में कद्दावर समझे जाने वाले बंधु कांग्रेस में अपना उज्जवल भविष्य देख रहे हैं.


विधानसभा चुनाव से पहले भी झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी के भाजपा प्रेम को देखते हुए बंधु कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ना चाहते थे. लेकिन तब सम्भव नहीं हो पाया था. लेकिन जीत के साथ ही कांग्रेस में जाने की इच्छा वो कई बार जता चुके हैं. वर्तमान परिस्थिति में बंधु तिर्की अगर कांग्रेस में जाते हैं, तो उनका वहां स्वागत है. लेकिन कोई मलाइदार पद मिलने की संभावना न के बराबर है. बशर्ते कि प्रदीप यादव उनका साथ दें. अगर ऐसा हुआ तो बंधु को कांग्रेस अपने कोटे से मंत्रिपरिषद में जगह दे सकती है. क्योंकि कांग्रेस को आगामी राज्यसभा चुनाव में इसका फायदा मिल सकता है. लेकिन ये तभी सम्भव हो पायेगा, जब प्रदीप यादव बंधु के लिए अपनी महत्वकांक्षा का त्याग कर दें. सबसे बड़ा सवाल कि आखिर प्रदीप यादव ऐसा क्यों चाहेंगे. बंधु और प्रदीप कांग्रेस में बिना किसी फायदे के क्यों जाएंगे. कुल मिलाकर फिलहाल संशय की स्थिति है.


भाजपा में विलय को लेकर बाबूलाल का मास्टर स्ट्रोक 

राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले बाबूलाल मरांडी ने विलय की राह में रोड़ा बने प्रदीप और बंधु को किनारा करते हुए झाविमो के भाजपा में मर्जर को लेकर नया दांव खेला है. पार्टी की केंद्रीय कार्यकारिणी के गठन में पहले दोनों विधायकों को अलग-थलग करते हुए, इन्हें महत्वपूर्ण पदों से दूर रखा है. वही पार्टी के एक प्रत्याशी के शिकायत पर पार्टी विरोधी कार्य के लिए बंधु को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया. बंधु पर आरोप है कि उन्होंने चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में काम किया था. इस वजह से हटिया सीट पर पार्टी की प्रत्याशी को नुकसान उठाना पड़ा. बाबूलाल मरांडी ने इस पर गंभीरता दिखाते हुए बंधु तिर्की को पार्टी से निष्कासित कर दिया है.


अब बाबूलाल मरांडी अनुसूची-10 के आलोक में बिना किसी व्यवधान के पूरी पार्टी और बचे विधायक प्रदीप यादव के साथ या फिर उनके बिना ही भाजपा में विलय करा सकते हैं. वही दूसरी तरफ बंधु और प्रदीप यादव बाबूलाल के इस दांव के काट ढूंढने में लगे हैं. इसके लिए यूपी में अमर सिंह बनाम सपा प्रमुख मुलायम सिंह का मामला और कानूनी हस्तक्षेप का अध्ययन कर रहे हैं. जानकारी के मुताबिक अगर मामला लम्बा खिंचता है, तो बाबूलाल पार्टी छोड़ भाजपा में शामिल हो सकते हैं. फिर पीछे-पीछे दूसरे समर्पित कार्यकर्ता भी उसी रास्ते भाजपा का दामन थाम लेंगे. ऐसी स्थिति में झाविमो का कमान स्वतः प्रदीप यादव के हाथों में होगा. झाविमो के अंदर चल रहे घमासान अब अंतिम दौर में है. अब इस पर पटाक्षेप कभी भी हो सकता है.



 












News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए रांची से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 22, 2020, 12:36 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर