BIRTHDAY SPL: संघर्ष भरी राह ने शिबू सोरेन को बनाया आदिवासियों का दिशोम गुरु

1977 में शिबू सोरेन सियासत की तरफ मुड़े, लेकिन टुंडी से चुनाव हार गये. जिसके बाद उन्हाेंने दुमका काे अपना सियासी कर्मभूमि बनाया.

News18 Jharkhand
Updated: January 11, 2019, 4:05 PM IST
BIRTHDAY SPL: संघर्ष भरी राह ने शिबू सोरेन को बनाया आदिवासियों का दिशोम गुरु
शिबू सोरेन (फाइल फोटो)
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Updated: January 11, 2019, 4:05 PM IST
झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के अध्यक्ष और आदिवासियों के सबसे प्रिय नेता शिबू साेरेन आज 75 साल के हो गये. इस मौके पर उनके समर्थकों में विशेष खुशी है. लेकिन खुद गुरुजी का जीवन काफी संघर्ष भरा रहा है. 40 साल की लंबी लड़ाई के बाद उन्होंने झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाया. लेकिन पहला मुख्यमंत्री नहीं बन पाये. इस बात का उन्हें मलाल है. हालांकि वे बाद में तीन बार सीएम बने. लेकिन आज भी वे झारखंड के सबसे बड़े जनाधार वाले नेता हैं.

शिबू साेरेन का जन्म रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में 11 जनवरी, 1944 काे हुआ. तब वे स्कूल में पढ़ते थे, जब उनके पिता साेबरन माझी की महाजनाें ने हत्या कर दी थी. उसके बाद शिबू ने संघर्ष का रास्ता चुन लिया. उन्हाेंने महाजनों के खिलाफ धान काटाे आंदाेलन चलाया. संतालाें काे लगा कि यही लड़का उन्हें महाजनाें के चंगुल से मुक्ति दिलाएगा. लिहाजा धान काटाे आंदाेलन से संताल जुड़ते चले गये. धीरे-धीरे यह आंदाेलन गाेला से निकल कर पेटरवार, गाेमिया तक पहुंच गया. उस दौरान बोकारो में विस्थापिताें की लड़ाई विनाेद बिहारी महताे लड़ रहे थे. वहीं शिबू साेरेन का विनाेद बिहारी से परिचय हुआ और बाद में शिबू साेरेन, उनके घर पर धनबाद में रहने लगे.

धनबाद में रहने के दाैरान शिबू साेेरेन टुंडी क्षेत्र में ज्यादा जाने लगे, क्याेंकि वहां संतालाें की आबादी ज्यादा थी और वे महाजनाें से परेशान थे. वहां धान काटाे आंदाेलन के दाैरान कई बार संघर्ष हुआ और शिबू साेरेन के खिलाफ कई मामले दर्ज हुए. पुलिस उन्हें तलाशने लगी. शिबू साेरेेन पारसनाथ के पलमा गांव काे अपना बसेरा बना लिया. घने जंगल और पहाड़ी इलाका होने के कारण पुलिस वहां जाने से हिचकती थी. इस बीच शिबू साेरेन ने टुंडी के पाेखरिया में भी आश्रम बना लिया और वहीं से आंदाेलन का संचालन करने लगे. उनकी एक आवाज पर हजाराें आदिवासी तीर-धनुष लेकर जुट जाते थे. धीरे-धीरे उन्हाेंने पूरे इलाके में महाजनाें के कब्जे से संतालों की जमीन को आजाद कराया.



टुंडी के आसपास शिबू साेरेन की समानांतर सरकार चलती थी. वे अपना काेर्ट लगाते थे, जहां लाेग न्याय मांगने आते थे. इसी दौरान विनाेद बिहारी ने शिबू साेरेन काे नया संगठन बनाने का सुझाव दिया, जाे अलग झारखंड और शोषण खिलाफ के लिए लड़े. तब शिबू साेरेन, विनाेद बिहारी और एके राय एकसाथ आये और झारखंड मुक्ति माेर्चा का गठन किया.

इस बीच पुलिस उन्हें तलाशती रही. एक दाराेगा संतालाें के एक गांव में आंदाेलनकारियाें काे पकड़ने गया था, लेकिन वह जिंदा नहीं लाैटा और ना ही उसकी लाश मिली. यह मामला तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक पहुंच गई. जिसके बाद तत्कालीन बिहार सरकार ने किसी भी हाल में शिबू साेेरेन काे जिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश दिया. इसके लिए केबी सक्सेना काे धनबाद का उपायुक्त बनाकर भेजा गया. उधर शिबू सोरेन का महाजनाें के खिलाफ संघर्ष जारी रहा. इस दाैरान कई गाेलीकांड हुए. चिरूडीह कांड उन्हीं में से एक है.

उपायुक्त केबी सक्सेना जंगल में निहत्थे शिबू सोरेन से मिले और उनके पक्ष काे सुना. सक्सेना ने सरकार को रिपाेर्ट भेजी कि अगर शिबू साेरेन काे मुख्य धारा में ले आया जाए, ताे आगे बड़ा काम हाे सकता है. सरकार ने भी मान ली और शिबू के खिलाफ दायर मामले एक के बाद एक वापस हाेने लगे. बाद में उन्हें आत्मसमर्पण के लिए तैयार किया गया. शिबू साेरेन को धनबाद जेल में रखा गया. यह 1975-76 के दौर का वाकया है.

1977 में शिबू सोरेन सियासत की तरफ मुड़े, लेकिन टुंडी से चुनाव हार गये. जिसके बाद उन्हाेंने दुमका काे अपना सियासी कर्मभूमि बनाया. 1980 में दुमका से लाेकसभा चुनाव जीता और झारखंड मुक्ति माेर्चा के पहले सांसद बने. इसके बाद ताे वे कभी सांसद, कभी विधायक, केंद्र में मंत्री या झारखंड के मुख्यमंत्री बनते रहे. झारखंड मुक्ति माेर्चा को मजबूत बनाते रहे.
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अलग राज्य की राह में शिबू साेरेन काे पहला बड़ा माैका तब मिला, जब उन्हें झारखंड स्वायत परिषद का अध्यक्ष बनाया गया. साल 2000 उनके लिए सबसे बड़ी खुशी लेकर आया, झारखंड अलग राज्य बना. हालांकि वे पहले मुख्यमंत्री नहीं बन सके.

ऐसा कहा जाता है कि शिबू साेरेन सिर्फ आदिवासियाें की चिंता करते हैं. लेकिन डोमिसाइल के मुद्दे पर 20 जुलाई 2002 काे झारखंड बंद के दाैरान जब हिंसा छिड़ी, तो उनके एक बयान ने उस आग पर पानी डाल दिया. इससे उनके समर्थकों को निराशा भी हुई. लेकिन उन्होंने गैर आदिवासियों का फिक्र करते हुए ऐसा किया था. हर वर्ग के प्रति उनकी इसी संवेदनशीलता ने उन्हें गुरुजी का दर्ज दिलाया, जबकि आदिवासियों के लिए लंबा संघर्ष ने उन्हें दिशोम गुरु बनाया.

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