रांची के आदिवासी टोले का हाल, 10 साल में नहीं बनी पुलिया, चचरी पुल के सहारे कट रही जिंदगी

रांची के इस आदिवासी टोले के लोगों की जिंदगी आज भी चचरी पुल पर टिकी हुई है.

रांची के इस आदिवासी टोले के लोगों की जिंदगी आज भी चचरी पुल पर टिकी हुई है.

Ranchi News: 25 आदिवासी परिवार वाले इस टोले को आज भी चचरी पुल मुख्य सड़क से जोड़ती है. जबकि एक पक्की पुलिया के लिए पिछले 10 साल से यहां के लोग गुहार लगा रहे हैं.

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रांची. राजधानी रांची से महज दो किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी टोले की तस्वीर झारखंड में आदिवासियों के हाल की सच्चाई बयां करने के लिए काफी है. इस टोले का नाम ‘नदी दीपा’, जो रांची नगर निगम के वार्ड-50 में स्थित है. आज भी इस टोले के लोगों की जिंदगी चचरी पुल पर टिकी हुई है.

यहां रहने वाले 22 वर्षीय छात्र दीपक लकड़ा को सरकार और स्थानीय विधायक से काफी शिकायत है, क्योंकि दस साल के गुहार और आग्रह के बाद भी टोले में एक छोटी सी पुलिया नहीं बन पाई है. यहां रहने वाले लोगों के लिए पुलिया का बन जाना ही सबसे बड़ा विकास होगा. 25 आदिवासी परिवार वाले इस टोले को चचरी पुल मुख्य सड़क से जोड़ती है.

यहां के रहने वाले मनोज कच्छप कहते हैं, ‘सरकार का नारा है कि झारखंड बदल रहा है. अब इस बांस की पुलिया को देखिए, जो चारों तरफ से टूटी हुई है. आप इस पर चल सकते हैं? बोलिए, नीचे गिरे तो 15 फीट दलदल में घुस जाइएगा.

मनोज कहते हैं, ‘छोटे-छोटे बच्चे इसे रोज पार कर स्कूल कैसे जाते होंगे. हम लोगों को हर काम के लिए इसी चचरी पुल से शहर जाना पड़ता हैं. हर समय डर रहता है कि अगर गिरे तो गए. अब बोलिए, हमारी जिंदगी बदली है क्या.
गांव के बुजुर्ग रामजी साहू के मुताबिक किसी की जान तो नहीं गई, लेकिन पुलिया से गिरने पर कई लोगों के पैर-हाथ जरूर टूटे हैं. दस साल पहले टोले के लोगों ने आपस में चंदा कर बांस बल्ली से पुलिया बनाई थी. तब से लेकर हर साल की जाने वाली मरम्मत में लच्छू कच्छप की अहम भूमिका रहती है.

डोरंडा से टोले की दूरी लगभग दो किलोमीटर है, लेकिन यह तब है जब आप इस पुलिया होकर जाते हैं. पुलिया से न जाकर अगर आप एयरपोर्ट के रास्ते सफर तय करते हैं तो डोरंडा तक की दूरी लगभग आठ किलोमीटर हो जाती है.
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