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झारखंड की इस 'खूबसूरत परंपरा' को परवाज दे रहीं आदिवासी महिलाएं, 100 से लेकर 15 हजार तक है कीमत

दुख की बात ये है कि झारखंडी गुड़िया को लोकल बाजार नहीं मिल पा रहा है.

दुख की बात ये है कि झारखंडी गुड़िया को लोकल बाजार नहीं मिल पा रहा है.

Ranchi News: 12 साल पहले रांची की शोभा ने अपनी पारिवारिक जरूरतों और शौक से इस गुड़िया को शक्ल देने की पहली कोशिश की थी. और उनका ये एकल प्रयास आज 45 महिलाओं का एक कारवां बन चुका है.

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रांची. पहल जब प्रयास में तब्दील में होता है, तो पहचान मिलने के बाद दुनिया उसे सलाम करती है. रांची (Ranchi) में झारखंडी गुड़िया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. एकला चलो के प्रयास से निकली झारखंडी गुड़िया की पहचान को अब धीरे-धीरे कारवां मिल रहा है. लेकिन कुटीर उद्योग के तौर पर अभी भी सरकारी मदद और बाजार का इंतजार इस खूबसूरत गुडि़या को है. कहते हैं परंपराओं में पालने की ताकत होती है. और जब आप परंपराओं के आइने में सभ्यता और संस्कृति की झलक मिलती हैं तो नजर आती है झारखंडी गुड़िया.

बेहद खूबसूरत, सजी धजी और रंग बिरंगी और बिलकुल दिलकश अंदाज में. करीब 12 साल पहले रांची की शोभा ने अपनी पारिवारिक जरूरतों और शौक से इस गुड़िया को शक्ल देने की पहली कोशिश की थी. और उनका ये एकल प्रयास आज 45 महिलाओं का एक कारवां बन चुका है. कपड़े, भूसी और मिट्टी से बनी ये गुड़िया अपनी आदिवासी संस्कृति और संस्कार से दिल की लुभाती भी है. साथ ही राजस्थानी खूबसूरती और विदेशी अंदाज से आकर्षित भी करती है. 100 रुपये से लेकर 15 हजार तक की इस गुड़िया के खऱीदार हजारों में हैं. लेकिन लोकल बाजार का सूनापन आज भी इससे जुड़ी महिलाओं को कचोटता है.

शोभा बताती हैं कि झारखंडी गुड़िया के कद्रदान इसे गिफ्ट के तौर पर अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक में भेजते हैं. लेकिन नसीब देखिए कि इस गुड़िया को अपने ही शहर में बाजार तक हासिल नहीं है. इस झारखंडी गुड़िया में आत्मनिर्भरता की झलक भी है और महिला सशक्तिकरण की चमक भी. सबसे बड़ी बात यह है कि स्थानीय बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं इसके निर्माण से जुड़ रही हैं. एक महिला को औसतन आठ हजार से 25 हजार तक की मासिक आमदनी इसके जरिए हो रही है.



झारखंडी गुड़िया को बनाने वाली आदिवासी महिलाएं इससे भावनात्मक रूप से जुड़ी हैं. उनकी मानें तो जो लाल पाड़ की साड़ी खुद उनकी पहचान के साथ-साथ उनकी बनायी गुड़िया की भी है. सबसे ज्यादा मेहनत गुड़िया के चेहरे पर करनी पड़ती है. जिसमें आदिवासी, राजस्थानी और विदेशी लुक का खास ख्याल रखना पड़ता है. पीएम मोदी के वोकल फोर लोकल के नारे से झारखंडी गुड़िया आज पहचान मिलने से इतरा रही है. हालांकि इस गुड़िया को बनाने के सारे सामान स्थानीय बाजार से मिल जाते हैं. लेकिन गुड़िया के बाल कोलकाता से मंगाये जाते हैं. बिक्री के लिए यह गुड़िया फिलहाल मेले, डोर टू डोर, एक्जीबिशन या फिर ऑनलाइन ही उपलब्ध है.
सबसे बड़ी बात यह है कि स्थानीय बाजारों में आज भी झारखंडी गुड़िया को उसका हक नहीं मिल पाया है. शायद आदिवासी संस्कृति और झलक वाली झारखंडी गुड़िया सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल नहीं हो पायी है.
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