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झारखंड सरकार की वेजफ्रेश योजना का हश्र: ना किसान ना ही जनता को मिला लाभ, NGO मालामाल

एनजीओ ने वेजफ्रेश के स्टॉल को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद की दुकान में तब्दील कर दिया.

एनजीओ ने वेजफ्रेश के स्टॉल को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद की दुकान में तब्दील कर दिया.

Ranchi News: कृषि मंत्री बादल से वेजफ्रेश के इस खेल के बारे में जब पूछ गया तो उन्होंने पूरे मामले की जांच का भरोसा दिलाते हुए दोषियों पर कार्रवाई की बात कही. बतौर मंत्री एनजीओ को वेजफ्रेश का स्टाल मुनाफे के लिए नहीं दिया गया था.

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रांची. राजधानी रांची (Ranchi) के आस-पास सब्जी उगाने वाले किसानों (Farmer) को बिचौलियों से बचाने के लिए वेज फेड ने एक एनजीओ को 5 वेज फ्रेश स्टॉल दिया था. लेकिन ये एनजीओ खुद मुनाफाखोरी में लग गयी. वेज फ्रेश की दुकानों में सब्जियां (Vegetables) कम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद ज्यादा बिक रहे हैं. न्यूज-18 की टीम जब रांची के हिनू चौक स्थित वेजफ्रेश के आउटलेट पर पहुचीं, तो वहां मौजूद केयरटेकर स्टाफ ने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया. लेकिन जब हमने पूछा कि यह तो सब्जी की दुकान है. और दुकान में सब्जी किधर है, तो वहां मौजूद एक स्टाफ मिल्क रैक में रखा एक किलो आलू और अदरख दिखाने लगा.

हिनू से हमारी टीम पड़ताल के लिए राजेन्द्र चौक गयी, जहां शायद पहले ही जानकारी मिल चुकी थी. लिहाजा दुकान बंद मिला, पर वेजफ्रेश के साथ चिकेन मटन दुकान का बैनर यह बताने को काफी है कि यहां सब्जियों की दुकानें कैसे चल रही होगा. इसके बाद न्यूज-18 की टीम पहुचीं अशोक नगर रोड नम्बर 4. यहां वेज फ्रेश के आउटलेट पर दुकान का शटर डाउन इसलिए मिला कि एनजीओ संचालक ने उसे किराये पर किराना दुकानदार को दे दिया है. हालांकि एक व्यक्ति को दुकान के बाहर सब्जी बेचने को जरूर रख दिया है. लेकिन यह शख्स सब्जी सीधे किसान से नहीं खरीदता, इसलिए सब्जियां सस्ती की जगह महंगे दर में बेच रहा था.

न्यूज-18 की टीम ने जब इस शख्स से सवाल किया तो जवाब था कि वह सब्जियां सीधे किसानों से नहीं खरीद कर बिचौलिए से ही खरीदता है. ऐसे में बाजार भाव से कम पर वह कैसे बेच सकता है.



क्या थी सरकार की योजना?
दरअसल झारखंड सरकार ने आम जनता को महंगी सब्जी खरीदने से बचाने के साथ-साथ किसानों को बिचौलिए से दूर रखने के लिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में राजधानी रांची के पांच बड़े चौक पर वेज फ्रेश नाम से मॉड्यूलर वातानुकूलित स्टाल खोला था. इसे बेहद मामूली दर पर लोहरदगा के एक एनजीओ को दिया गया था. लक्ष्य था कि एनजीओ किसानों के बीच जाकर सब्जियों की खरीद करेगा और ऑपरेशनल लागत जोड़कर बाजार से कम कीमत पर लोगों को ताजी सब्जियां उपलब्ध कराएगा. सरकार की बेहद अच्छी योजना धरातल पर इसलिए नहीं उतर पाई, क्योंकि वेज फ्रेश की दुकानों से पहले सब्जी बाहर हुई. फिर कई जगह तो गायब ही हो गयी. अंदर ग्रोसरी की दुकान खोल दी गयी.

किसान आज भी औने-पौने दामों में सब्जियां बेचने को मजबूर हैं. वहीं शहरीवासी को महंगी दर सब्जियां खरीदनी पड़ रही है. कृषि मंत्री बादल से वेजफ्रेश के इस खेल के बारे में जब पूछ गया तो उन्होंने पूरे मामले की जांच का भरोसा दिलाते हुए दोषियों पर कार्रवाई की बात कही. बतौर मंत्री एनजीओ को वेजफ्रेश का स्टाल मुनाफे के लिए नहीं दिया गया था.
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