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बेतला नेशनल पार्क की मृत बाघिन की कहानी का क्या है सच? 
Palamu News in Hindi

Rajesh Tomar | News18 Jharkhand
Updated: February 25, 2020, 11:44 AM IST
बेतला नेशनल पार्क की मृत बाघिन की कहानी का क्या है सच? 
बेतला नेशनल पार्क में मृत बाधिन के मिलने को लेकर कई सवाल उठाये जा रहे हैं.

पिछले हफ्ते बेतला नेशनल पार्क के रोड नंबर के नजदीक घासों के झुरमुटों के बीच एक मृत बाघिन का शव वन विभाग के लोगों के द्वारा बरामद किया गया. मौके पर पहुंचे वनकर्मियों ने दावा किया कि बाघिन की मौत इलाके में मौजूद जंगली भैंसों (BAISON) के झुंड से लड़ाई के दौरान हो गई.

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रांची. झारखंड स्थित देश का नामी पलामू टाइगर रिजर्व (Palamu Tiger Reserve) एकबार फिर सुर्खियों में है. दरअसल पिछले सप्ताह बेतला नेशनल पार्क (Betla National Park) के रोड नंबर-दो के नजदीक घासों के झुरमुटों के बीच एक मृत बाघिन (Dead Tigress) का शव वन विभाग के लोगों के द्वारा बरामद किया गया. साथ ही दावा किया गया कि बाघिन की मौत इलाके में मौजूद जंगली भैंसों (Baison) के झुंड से लड़ाई के दौरान हो गई होगी. इस सनसनीखेज समाचार के सार्वजनिक होते ही सूबे के लोग हैरान हैं, क्योंकि पिछले कई दशक से बेतला नेशनल पार्क में जीवित बाघों को न ही स्थानीय लोगों ने देखा और न ही बाघों को देखने की लालसा रखने वाले पर्यटकों ने. अलबत्ता वन विभाग ने कागज़ों पर इस इलाके में 3 से 5 बाघ होने का दावा जरूर करता आया है. लेकिन कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं कर पाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 29 जुलाई 2019 (अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस) पर जारी किए एआइटीई (AITE) रिपोर्ट-2018 के मुताबिक झारखंड में पांच बाघ होने का दावा किया गया था. लेकिन अनुमान अवधि के दौरान पीटीआर में कोई बाघ दर्ज नहीं किया जा सका था. अब इतने वर्षों के इंतजार के बाद पलामू टाइगर रिजर्व इलाके में वन विभाग के कागजी बाघों में से जब वाकये में कोई असली बाघ मिला भी, तो मृत मिला.जाहिर है जिसने भी खबर को सुना या देखा, कोई भी वन अधिकारियों के मृत बाघिन की कहानी को पचा नहीं पा रहा है. बल्कि इस नई कहानी का सच जनना चाहता है. इधर सूबे के पूर्व मंत्री और चर्चित नेता सरयू राय ने भी बाघिन की मौत वाली कहानी पर सवाल खड़ा करते हुए सरकार से पूरे मामले की जांच की मांग की है.

15 फरवरी को मृत अवस्था में मिली बाघिन, दूसरे दिन किया गया शव की अंत्येष्टि 

पिछले हफ्ते बेतला नेशनल पार्क के रोड नंबर के नजदीक घासों के झुरमुटों के बीच एक मृत बाघिन का शव वन विभाग के लोगों के द्वारा बरामद किया गया. मौके पर पहुंचे वनकर्मियों ने दावा किया कि बाघिन की मौत इलाके में मौजूद जंगली भैंसों (BAISON) के झुंड से लड़ाई के दौरान हो गई. वनकर्मियों ने ये भी दावा किया कि 14 साल की वृद्ध हो चुकी बाघिन ने बाइसन के बच्चों को शिकार करने की कोशिश की होगी और इसी क्रम में बाइसन के झुंड द्वारा जवाबी हमले में बाघिन की लड़ते हुए मौत हो गई होगी. स्थानीय स्तर पर पशु डाक्टरों की टीम और वन विभाग के अधिकारियों ने मृत बाघिन की जांच करते हुए मौत का करण बाघिन का बुरी तरह से जख्मी होना बताया, फिर पोस्टमार्टम और अन्य कार्रवाई के बाद दूसरे दिन बाघिन की अंत्येष्टि कर दी. लेकिन जंगली पशुओं पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ नाम न बताने की शर्त पर कुछ सवाल खड़ा किये हैं. जैसे, बाघिन की उम्र 14 साल से ज्यादा और शिकार करने में लाचार बताया गया, लेकिन विभाग द्वारा जारी तस्वीर में बाघिन के थूथने पर गुलाबी स्पोट बताता है कि बाघिन का उम्र 5-6 साल के आसपास रही होगी. ऐसे में जवान बाघिन की मौत आसानी से नहीं हो सकती. दूसरी बात अगर भैंसों (BAISON) और बाघिन (TIGERESS) में संघर्ष हुए थे, तो भैंसों (BAISON) के भी घायल होने से इंकार नहीं किया जा सकता. तो फिर घायल जंगली भैंसा की पहचान की दिशा में वन विभाग ने प्रयासों का उल्लेख क्यों नहीं किया गया? संघर्ष के दौरान घायल पशुओं के खून को इकट्ठा करना, फिर उसकी जांच को लेकर कोई उल्लेख क्यों नहीं ? ऐसे कई और सवालों को लेकर विधायक सरयू राय ने भी सरकार से इसकी उच्चस्तरीय जांच की मांग की है.

पूर्व मंत्री सरयू राय ने भी उठाए सवाल, सीएम से की जांच की मांग 



पूर्व मंत्री सरयू राय ने सवाल उठाया है कि वन विभाग के चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन ने अबतक घटनास्थल का दौरा कर स्वयं पर्यवेक्षण क्यों नहीं किया? जंगली भैंसों (BAISON) और बाघिन (TIGERESS) के संघर्ष के बाद उक्त स्थान पर खून का कोई कतरा नहीं मिलने को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाया है. वन विभाग ने दावा किया कि बाघिन बूढ़ी हो गई थी. उसके नाखून झड़ गए थे. लेकिन तस्वीर में बाघिन के पैरों में नख यथावत हैं. उन्होंने कहा कि बाघिन के थूथने का रंग गुलाबी था, यानी बाघिन जवान थी, न कि बूढ़ी. साथ ही वन विभाग ने बाघिन के मौत का कारण अंदरूनी चोट बताया था. जबकि चोट बाहरी भागों में साफ दिख रहा था. इसके अलवा गम्भीर आरोप लगाते हुए पूछा है कि जब किसी बाघ की मौत होती है, तो आमतौर पर एनटीसीए (NTCA) के प्रावधान के तहत सबसे पहले शिकारी द्वारा गोली से हुई मौत की जांच की जाती है. फिर अन्य कारणों की जांच की जाती है. लेकिन इस केस में ऐसा नहीं हुआ. वहीं एनटीसीए के प्रावधानों के मुताबिक अधिसूचित वन्य जीवों के मौत के मामलों में पोस्टमार्टम के समय एनटीसीए के एक प्रतिनिधि का उपस्थित होना अनिवार्य होता है. लेकिन पलामू में मौजूद होने के बाद भी प्रतिनिधि डाक्टर डीएस श्रीवास्तव को क्यों सूचित नहीं किया गया. बाघिन की अंत्येष्टि की इतनी जल्दबाजी क्यों, जबकि बाघिन के शव को डीप फ्रीज में रखना चाहिए था. ताकि एनटीसीए के अधिकारी इसकी जाँच कर सके. सरयू राय ने पूरे मामले में वन विभाग को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है. उनका मानना है कि पूरी कहानी में षड्यंत्र के संकेत मिल रहे हैं. इसलिए सरकार को इसकी जांच सघनता से करनी चाहिए.

पलामू टाइगर रिजर्व पर करोड़ों खर्च करती है सरकार

झारखंड के उत्तरी-पूर्वी छोर पर 1026 वर्ग किलोमीटर के जंगली परिक्षेत्र में फैला है पलामू टाइगर रिजर्व. पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों के संरक्षण के लिए रिजर्व एरिया को 7 जोन में बांटा गया है. इसमें महुआडांड़, कुटमु, बेतला, छिपादोहर पूर्वी, छिपादोहर पश्चिमी, गारू पूर्वी, गारू पश्चिमी रेंज शामिल हैं. इन सातों रेंजों की देखभाल का जिम्मा विशेष अधिकारियो और वनकर्मियों पर है. एक डायरेक्टर के अधीन दो डीएफओ (कोर और बफर एरिया के लिए ) सात अलग-अलग क्षेत्रों के लिए सात रेंजर्स की विशेष नियुक्ति के साथ-साथ 120 फॉरेस्टर्स की तैनाती, इसके अलवा चप्पे-चप्पे पर बाघों के ट्रैक करने के लिए 300 ट्रैकर को अनुबंध पर रखा गया है. ये दिन रात बाघों को ट्रैक करने का ड्यूटी करते हैं. 300 ट्रैकरों को महीने का मानदेय 2,88,000 रुपये है, जबकि 2 डीएफओ, 7 रेंजर और 120 फॉरेस्ट गार्ड का सरकारी वेतन जोड़े, तो महीनेभर का खर्च लाखों में होता है. वहीं बाघों के संरक्षण और आवो-हवा को दुरुस्त करने के नाम पर हर महीने करोड़ों खर्च होते हैं. लेकिन इतना खर्च के बावजूद बेतला नेशनल पार्क में बाघ बस नहीं पाये. यहां पर स्थानीय लोग और पर्यटक वर्षों से बाघ देखने की लालसा से आते हैं, लेकिन आज तक किसी को बाघ दिखा नहीं है.

सीसीटीवी व ट्रैप कैम में भी अबतक नहीं दिखा कोई बाघ 

इतना ही नहीं बेतला नेशनल पार्क व पूरे टाइगर रिजर्व में कई सीसीटीवी व ट्रैप कैम भी लगाए गए हैं. बावजूद आजतक बाघों का सही आंकड़ा टाइगर रिजर्व के अधिकारियों को नहीं पता है. 3 से 5 बाघों की बात तो करते हैं, लेकिन नर-मादा बाघों की सही संख्या विभाग को पता नहीं है. और ना ही इसके ठिकाने की पुख्ता जानकारी ही विभाग के पास है. कभी हजारीबाग तक फैले पीटीआर (PALAMU TIGER RESERVE) वनक्षेत्र में 3 बाघों के होने की बात कही जाती है, तो कभी सारंडा जंगली परिक्षेत्र में बाघों के होने का दावा किया जाता है, तो कभी बाघों के राज्य से सटे छत्तीसगढ़ के जंगली इलाकों में पलायन की बात कही जाती है. लेकिन आधिकारिक तौर पर कोई पुख्ता जानकारी विभाग के पास आजतक नहीं है. वनविभाग ने बाघों पर निगरानी रखने के लिए 300 से ज्यादा स्थानीय युवकों को ट्रैकर के तौर पर रखा है. लेकिन अबतक किसी ने बाघों को बेतला रेंज में घूमते नहीं देखा है. लेकिन साल में कभी-कभार बाघों के पद चिन्ह, मल या फिर धुंधली ट्रेप तस्वीर जरूर चर्चा में आती हैं. और एक बात, जो वनविभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है, वो ये कि जब जंगलों में नर और मादा बाघ हैं, तो फिर इतने दिनों बाद भी शावकों की चर्चा विभाग क्यों नहीं करता?

सभी को सच का इंतजार

इसमें कोई शक नहीं कि बेतला के जंगल में मृत बाघिन के शव मिले. इसको लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं. अब अगर वाकये में मृत बाघिन बेतला के जंगलो की थी और मौत के कारण कुछ और भी रही हो, तो वन विभाग के लिए यह चुनौती होगी कि सच साबित करें. क्योंकि विभाग बार-बार ये दावा करता रहा है कि बेतला के जंगल में बाघ है और दलील में अप्रत्यक्ष सबूतों, पद चिन्ह और मल ( PUG, SCAT) की चर्चा भी करता रहा है. पिछले साल बाघ की एक तस्वीर भी जारी किया था, जो ट्रैप कैम से लिया गया था. अब अगर तस्वीर में कैद बाघ और इस मृत बाघिन का मिलान हो जाता है या फिर कोई और पुख्ता सबूत पेश करता है, तो विभाग के पुराने दावों को बल मिलेगा. साथ ही सूबे के लोगों को राहत भी कि वन विभाग ने अबतक पालमू टाइगर रिजर्व के बंदोबस्त पर इतना पैसा क्यों खर्च करता आया है! वहीं दूसरी तरफ अगर जांच होती है और सच कुछ और निकलता है, तो जाहिर है कि जहां वन विभाग की साख को नुकसान पहुंचेगा, वहीं वन्यजीव प्रेमियों की भावना भी आहत होगी.

ये भी पढ़ें- बेतला नेशनल पार्क: 7 दिन से भूखी थी बाघिन, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा, शिकार के चक्कर में गई जान

 

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First published: February 25, 2020, 11:34 AM IST
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स्रोत: स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार
अपडेटेड: April 09 (08:00 AM)
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स्रोत: जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, U.S. (www.jhu.edu)
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