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  • RANCHI WHY THESE TWO SCHEMES OF HEMANT GOVERNMENT GIVING EMPLOYMENT TO POOR ARE IN TROUBLE JHNJ

गरीबों को रोजगार देने वाली हेमंत सरकार की इन दो बड़ी योजनाओं पर क्यों लगा ग्रहण?

झारखंड सरकार ने कोरोना काल में गरीबों को रोजगार देने के लिए मुख्यमंत्री बिरसा हरित ग्राम योजना और जल समृद्धि योजना की शुरुआत की.

कोरोना लॉकडाउन (Corona Lockdown) के दौरान हेमंत सरकार (Hemant Government) ने ग्रामीणों को गांव में रोजगार देने की शुरुआत की. लेकिन उद्देश्य पूरा होने से पहले ही जल समृद्धि योजना और मुख्यमंत्री बिरसा हरित ग्राम योजना दम तोड़ती नजर आ रही हैं.

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    रिपोर्ट- अविनाश कुमार

    रांची. झारखंड में कोरोना काल (Corona Period) के वक्त लोगों को रोजगार (Employment) देने के उद्देश्य से शुरू की गई योजना की सफलता पर ग्रहण लगता दिख रहा है. मनरेगा (MNREGA) के तहत संचालित मुख्यमंत्री बिरसा हरित ग्राम योजना और जल समृद्धि योजना को लेकर लाभुक ना सिर्फ चिंतित हैं, बल्कि उनपर रोजगार का भी संकट मंडराने लगा है. दिसंबर माह से मनरेगा मजदूरी का भुगतान नहीं होने से ये योजनाएं अपने लक्ष्य से दूर होती हुई नजर आ रही हैं.

    'पानी रोको, पौधा रोपो', ये महज सरकारी शिलापट पर लिखा गया स्लोगन नहीं बल्कि इस स्लोगन में जल संरक्षण से लेकर रोजगार का राज छुपा है. लॉकडाउन के दौरान झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने गांव के लोगों को गांव में ही रोजगार देने की शुरुआत की. ग्रामीण विकास विभाग ने इसके लिये जल समृद्धि योजना और मुख्यमंत्री बिरसा हरित ग्राम योजना के जरिये गांव के लोगों को जोड़ा. मनरेगा के तहत संचालित इस योजना से जहां खेत का पानी खेत में रोकने की शुरुआत हुई, वहीं हरित ग्राम योजना के जरिये फलदार पौधे लगाए गए. इन दोनों योजना के मूल जड़ में गांव के लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना था. योजना का उद्देश्य और सरकार की सोच के अनुरूप शुरुआत तो हुई, पर अब इस योजना की सफलता पर ग्रहण लगता दिख रहा है.



    योजनाओं पर ग्रहण का ये है कारण

    ग्रामीण इलाकों में मुख्यमंत्री बिरसा हरित ग्राम योजना के तहत लगाये गए पौधे तेजी से दम तोड़ रहे हैं. ऐसा पौधों को समय पर पानी और खाद नहीं मिलने और सरकारी तंत्र की उदासीनता के चलते हो रहा है. ये हाल सिर्फ मनरेगा के तहत संचालित बिरसा हरित ग्राम योजना का ही नहीं है, बल्कि दूसरी योजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं. 9 दिसंबर के बाद से मनरेगा मजदूरी का भुगतान पूरी तरह से ठप है. मनरेगा के तहत काम कर रहे मजदूरों के समक्ष अपने और अपने परिवार का पेट भरने की चुनौती है. ऐसे में फलदार पौधों को बचाने के लिये पटवन का खर्च कैसे संभव है. लिहाजा खेतों में फलदार पौधों को सूखता देखने के सिवाय उनके पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है.

    ग्रामीण विकास विभाग ने मनरेगा के तहत लोगों को रोजगार मुहैया कराने में बेहतर कार्य किया है. अब तक राज्य ने 8 करोड़ मानव दिवस लक्ष्य से एक कदम आगे 9 करोड़ मानव दिवस का सृजन करने में सफलता हासिल की है. बावजूद इसके दिसंबर माह से मनरेगा मजदूरी के लंबित भुगतान ने योजनाओं की रफ्तार पर ब्रेक लगा दी है.