यूनिसेफ के अधिकारियों को इस बच्चे की चिंता क्यों नहीं ?

लगता है झारखंड में यूनिसेफ के काम करने का तरीका बदल गया है. यह संस्था भी राज्य सरकार की एजेंसियों में घुलमिल गयी है. शायद इसीलिए पिछले एक साल से एक मासूम यूनिसेफ कार्यालय के सामने गाड़ियों के टायर का पंचर बना रहा है. पर यूनिसेफ के अधिकारी इस बच्चे की तरफ नजर तक नहीं डाल रहे हैं.

Amit Kumar | ETV Bihar/Jharkhand
Updated: December 7, 2017, 3:13 PM IST
यूनिसेफ के अधिकारियों को इस बच्चे की चिंता क्यों नहीं ?
यूनिसेफ ऑफिस के सामने बाल मजदूरी
Amit Kumar
Amit Kumar | ETV Bihar/Jharkhand
Updated: December 7, 2017, 3:13 PM IST
लगता है झारखंड में यूनिसेफ के काम करने का तरीका बदल गया है. यह संस्था भी राज्य सरकार की एजेंसियों में घुलमिल गयी है. शायद इसीलिए पिछले एक साल से एक मासूम यूनिसेफ कार्यालय के सामने गाड़ियों के टायर का पंचर बना रहा है. पर यूनिसेफ के अधिकारी इस बच्चे की तरफ नजर तक नहीं डाल रहे हैं.

विश्व में बच्चों के अधिकार की सुरक्षा के लिए काम करनेवाली यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रेन्स इमरजेंसी फंड यानी यूनिसेफ की नजर क्या  कभी इस बच्चे पर पड़ेगी. ये बड़ा सवाल है. वैसे बच्चों की मासूमियत की रक्षा करने को लेकर सेमिनार से लेकर सर्वे तक का काम कागजों में होता है और उसके लिए यूनिसेफ के दावे बड़े-बड़े होते हैं.

 

झारखंड,बिहार,बंगाल के बच्चे अक्सर कम  उम्र में ही कमाने के लिए आए दिन प्रदेश से बाहर जाते रहते हैं. सरकारी एजेंसियां इन बच्चों को बार-बार बाल श्रम से मुक्त कराती है. पर ये बालक एक साल से यूनिसेफ के कार्यालय के मुख्यद्वार के बगल में पंचर बना रहा है. किसी अधिकारी की ओर से कोई पहल तो दूर, नजर तक भी उस पर नहीं घुमाया गया.

रिजवान एक सिंगल उदाहरण नहीं, ऐसे कई बच्चें हैं,  जो सरकारी दफ्तरों में चाय-नाश्ता पहुंचाते हैं. फर्क ये है कि ये तो यूनिसेफ कार्यालय है. बहरहाल रिजवान घर की माली हालत को देखते हुए पढ़ाई छोड़ बंगाल से झारखंड पहुंचा है. काम सीख लिया तो फिर बंगाल में गैरेज खोलेगा. यूनिसेफ को उसके भविष्य से क्या मतलब.

 
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