रांची के इस गांव की महिलाएं बनी मिसाल, हर ओर हो रही कैशलेस लेन-देन की चर्चा

दुबलिया गांव में महिलाएं बनी मिसाल.

दुबलिया गांव में महिलाएं बनी मिसाल.

झारखंड (Jharkhand) की राजधानी रांची (Ranchi) में कांके प्रखंड के दुबलिया गांव की तारीफ और चर्चा चारों ओर है. दरअसल इस गांव की तस्वीर और तकदीर बदलने में यहां की ग्रामीण महिलाओं ने बड़ी भूमिका निभाई है.

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रांची. झारखंड (Jharkhand) की राजधानी रांची (Ranchi) में कांके प्रखंड के दुबलिया गांव की तारीफ और चर्चा चारों ओर है. दरअसल इस गांव की तस्वीर और तकदीर बदलने में यहां की ग्रामीण महिलाओं ने बड़ी भूमिका निभाई है. महिलाओं ने बदलते दौर में कैशलेस सिस्टम और ऑनलाइन कामकाज को अपनाया है. करीब 300 घरों में रहने वाली 2 हजार की आबादी आज अपने हर काम के लिए कैशलेस प्रक्रिया को अपना रही है. गांव में काम करने वाले स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने इस प्रक्रिया को हर घर के लिए आसान बना दिया है. बात खाते में पैसे ट्रांसफर करने की हो या फिर बैंकिंग समेत तमाम जरूरी कामों की. गांव की महिलाएं अब बैंकों का रुख नहीं करती.

दुबलिया गांव की ग्राम प्रधान अध्यक्ष सीमा कुजूर बताती हैं कि लंबे समय से यह पूरा गांव काफी पिछड़ा था. गांव में स्वयं सहायता समूह तो 2004 से ही काम कर रहा था, लेकिन सरकार की उदासीनता और नीतियों की वजह से कोई विशेष लाभ नहीं मिल पा रहा था.  2016 में जेएसएलपीएस की मदद से महिला समूह काफी सक्रिय हो गया और महिलाएं भी इसमें अपनी भागीदारी निभाने लगीं.

लगातार दी गई ट्रेनिंग

पूरे गांव का बैंकिंग कामकाज और कैशलेस में अहम भूमिका निभाने वाली लालमणि देवी बताती हैं कि यह सब लगातार प्रशिक्षण की बदौलत संभव हुआ है. क्योंकि गांव की महिलाएं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं. बावजूद इसके जेएसएलपीएस की ओर से लगातार दी गई ट्रेनिंग में उन्हें ऑनलाइन दुनिया का साक्षर बना दिया. वहीं 28 वर्ष की मुन्नी देवी की मानें तो वह 5 साल पहले शादी होकर इस गांव की बहू बनी थीं. उन्हें गांव में सबकुछ ऑनलाइन देखकर पहले आश्चर्य लगा. क्योंकि उनके गांव में लोग छोटे से छोटे काम के लिए बैंक और प्रज्ञा केंद्र का चक्कर लगाते थे, लेकिन ससुराल का गांव मायके से बिल्कुल अलग है.
इस गांव के ज्यादातर पुरुष खेती कार्यों से जुड़े हैं. लिहाजा महिलाएं ही घर-बार के साथ-साथ गांव के विकास में अपनी भागीदारी निभाती हैं. महिलाओं की मानें तो जेएसएलपीएस से जुड़ने के बाद स्वयं सहायता समूह के कामकाज में 2016 के बाद काफी तेजी आई है.

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