14 मजदूरों की मार्मिक कहानी: 400 किमी भूखे साइकिल चलायी, तो अब सरकारी मदद क्यूं लें
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14 मजदूरों की मार्मिक कहानी: 400 किमी भूखे साइकिल चलायी, तो अब सरकारी मदद क्यूं लें
ओडिशा के कलिंगानगर से 400 किलोमीटर साइकिल चलाते हुए 14 मजदूर सरायकेला पहुंचे.

सरकार और प्रशासन के प्रति इन मजदूरों (Laborers) के गुस्से को इस बात से समझा जा सकता है कि जब न्यूज-18 की टीम ने इन्हें प्रवासी सहायता केन्द्र में जाकर भोजन करने का सुझाव दिया, तो इन्होंने वहां जाने से साफ इंकार कर दिया.

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सरायकेला. कोरोनाबंदी (Lockdown) में बाहर फंसे प्रवासी मजदूरों (Laborers) को वापस लाने के लिए सरकार अपने स्तर से प्रयास में जुटी है. लेकिन इस प्रयास से भी काफी संख्या में मजदूरों की जल्द घर वापसी नहीं हो पा रही है. ऐसे में बेबस और व्याकुल मजदूर खुद अपनी व्यवस्था से घर लौट रहे हैं. कोई पैदल चल रहा है, तो कोई साइकिल (Cycle) से घर लौट रहा है. घर लौटने की बेकरारी व मजबूरी ऐसी कि लोग चार से पांच सौ किलोमीटर तक का सफर खाली पेट तय कर रहे हैं. इन मजदूरों की बेबसी की कहानी ऐसी है कि सुनकर कलेजा मुंह को आ जाए.

घर वापसी के लिए सरकार से मिन्नतें कीं, पर नहीं मिली मदद

ऐसी ही एक कहानी ओडिशा के कलिंगानगर में टाटा स्टील में ठेका मजदूर के रूप में सिविल का काम कर रहे कुछ मजदूरों की है. बंगाल के वीरभूम और पुरुलिया तथा झारखंड के धनबाद और बोकारो के रहने वाले 14 मजदूरों को सरकार की घर वापसी अभियान से घर लौटने की आस बंधी. मगर ठेकेदार और सरकार से घर लौटने में मदद करने की इनकी सारी मिन्नतें बेकार गयीं. डेढ़ महीने से कोरोनाबंदी में इन्होंने जैसे-तैसे अपना जीवन काटा और जब सामने भुखमरी जैसा हालात हो गया, तो इन सभी ने अपनी कमाई से 4500 रुपये में एक-एक नई साइकिल खरीदी. और घर की ओर निकल पड़े. रास्ते में भूख मिटाने के लिए मूढ़ी, सत्तु और चूड़ा खाया. बिना भोजन के फाकाकसी कर दो दिन तक साइकिल चलाकर ये लोग सरायकेला पहुंचे.



ठेकेदार ने भी मदद करने से मुंह फेर लिया
न्यूज 18 से अपनी मार्मिक वेदना बताते हुए बंगाल के पुरुलिया के मजदूर जीतेन्द्र रजक ने कहा कि उसने घर लौटने हेतु बंगाल सरकार से काफी गुहार लगायी. मगर सरकार ने उसकी कोई मदद नहीं की. ठेकेदार ने अलग मदद करने से मुंह फेर लिया. मजबूरी में नयी साइकिल खरीद कर जैसे तैसे घर जा रहे हैं. बंगाल के वीरभूम जिले के नीतेन्द्र चंद्र ने बताया कि डेढ़ महीने की कोरोनाबंदी के दौरान उनलोगों के सामने भुखमरी की स्थिति बन गयी थी. किसी ने मदद नहीं की. जब घर वापसी का अभियान चला, तो उन्हें आशा थी कि सरकार घर वापसी में उनकी मदद करेगी. मगर बंगाल सरकार की ओर से गुहार के बावजूद उनकी सुध नहीं ली गई.

भूखे पेट जाना मंजूर, पर सरकारी खाना नहीं खाया

सरकार और प्रशासन के प्रति इनके गुस्से को इस बात से समझा जा सकता है कि जब न्यूज-18 की टीम ने इन्हें सरायकेला के प्रवासी श्रमिक सहायता केन्द्र में जाकर भोजन करने तथा सरकारी सुविधा से घर जाने का सुझाव दिया, तो इन्होंने सरकारी मदद लेने से साफ इंकार कर दिया. धनबाद के मजदूर कालीदास मुखर्जी ने कहा कि जब वह घर लौटना चाह रहे थे, तब सरकार ने मदद नहीं की. अब तो उनकी साइकिल उनके पास है. वह भूखे प्यासे जा रहे हैं. तीन सौ किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं. केवल एक सौ किलोमीटर का सफर बचा है. ऐसे में अब सरकार की मदद की उन्हें जरूरत नहीं है. नाराज व गैरतमंद मजदूरों ने सरकारी मदद को ठूकरा दिया, पर स्थानीय लोगों ने खाने के लिए पावरोटी व पानी दिये, तो इन्होंने स्वीकार किया. फिर सभी अपने सफर पर निकल पड़े.

रिपोर्ट- विकास कुमार

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