ये हैं झारखंड की लेडी टार्जन, पेड़ों की रक्षा के लिए जंगल माफिया से लिया लोहा

प्रकृति से पद्मश्री तक के इस सफर की शुरुआत 1998 में हुई. तब जमुना ओडिशा के मयूरभंज जिले के जामदा प्रखंड से शादी के बाद चाकुलिया प्रखंड के मुटुरखाम गांव पहुंची थी.

News18 Jharkhand
Updated: September 10, 2019, 3:49 PM IST
ये हैं झारखंड की लेडी टार्जन, पेड़ों की रक्षा के लिए जंगल माफिया से लिया लोहा
जंगल माफिया से अकेले लड़ने के कारण जमुना टुडू को मिला लेडी टार्जन का नाम
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Updated: September 10, 2019, 3:49 PM IST
पूर्वी सिंहभूम. जिले के चाकुलिया प्रखंड की रहनेवाली जमुना टुडू को अब दुनिया लेडी टार्जन के नाम से जानती है. जमुना पद्मश्री जैसे बड़े सम्मान से सम्मानित हैं. यह पेड़- पौधों से बेपनाह प्रेम का ही नतीजा है कि जमुना की गोद में पद्मश्री का सम्मान किसी फल की तरह आकर गिरा. प्रकृति से पद्मश्री तक के इस सफर की शुरुआत 1998 में हुई. तब जमुना ओडिशा के मयूरभंज जिले के जामदा प्रखंड से शादी के बाद चाकुलिया प्रखंड के मुटुरखाम गांव पहुंची थी. उस समय जंगल माफिया मुटुरखाम गांव के पास जंगलों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई कर रहे थे. घर के दरवाजे से दिखने वाले जंगल की यह दशा देखकर जमुना ने पेड़ों को बचाने और जंगल माफिया से टकराने का फैसला लिया. जमुना को परिवारवालों ने यह सब करने से रोका, लेकिन वो गांव की महिलाओं को एकजुट कर जंगल बचाने की मुहिम पर निकल पड़ीं.

पेड़ों की रक्षा के लिए बनाई वन सुरक्षा समिति  

गांव की महिलाओं के साथ मिलकर जमुना साल के पेड़ों को बचाना शुरू किया. साथ ही नये पौधे भी लगाने शुरु किये. जमुना की इस लगन को देखकर आसपास के गांवों की महिलाएं जंगल बचाने की उसकी मुहिम में उनके साथ जुड़ती चली गईं. जमुना ने इन महिलाओं को लेकर वन सुरक्षा समिति का गठन किया. आज चाकुलिया प्रखंड में ऐसे तीन सौ से ज्यादा समितियां हैं. हर समिति में शामिल 30 महिलाएं अपने-अपने क्षेत्रों में वनों की रखवाली लाठी-डंडे और तीर-धनुष के साथ करती हैं. जमुना टुडू खुद पेड़ों पर चढ़ने के साथ-साथ तीर-धनुष चलाने में माहिर हैं.

सरकार से पहल करने की अपील

जमुना चाहती हैं कि सरकार उनकी इस पहल में शामिल होकर वनों को बचाने के लिए आगे आए. साथ ही वन सुरक्षा समिति में शामिल महिलाओं को सरकार की ओर से हर महीने आर्थिक मदद भी  मिले. ताकि इन महिलाओं का वनों के प्रति समर्पण बना रहे. जमुना की माने तो उनके लिए पेड़- पौधे बच्चों के समान हैं. वो पेड़ों का संरक्षण राखी बांधकर करती हैं. जमुना से यह पूछने पर कि उनके कितने बच्चे हैं, उनका जवाब होता है अनगिनत. जमुना को खुद की कोई औलाद नहीं है, लेकिन इसका उनको कोई दुख नहीं है.

jamuna tudu
जमुना टुडू राखी बांधकर पेड़ों को बचाती हैं


मिल चुके हैं कई सम्मान 
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वन के लिए अपना जीवन समर्पण करने वाली जमुना टुडू को प्रदेश के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर के कई पुरस्कार मिल चुके हैं. सबसे पहले वन विभाग से पुरस्कार मिला. फिर 2008 में झारखंड सरकार ने सम्मान दिया. 2013 में दिल्ली में क्लिप ब्रेवरी नेशनल अवार्ड मिला. मुंबई में स्त्री शक्ति अवार्ड प्राप्त हुआ. पुरस्कारों और सम्मानों को महज एक पड़ाव मानने वाली जमुना टुडू की बस एक ही जिद है कि आखिरी सांस तक पेड़ों के लिए जिएं.

जमुना टुडू के पति मान सिंह टुडू राज मिस्त्री का काम करते हैं. लिहाजा रोजगार और रोजी- रोटी के लिए जमुना को अपने पति के साथ गांव छोड़कर शहर में रहने को मजबूर होना पड़ा है. हालांकि हर दो दिन पर वो गांव जाकर अपनी मुहिम को आगे बढ़ाती हैं.

रिपोर्ट- संजय कुमार सिन्हा

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First published: September 10, 2019, 3:44 PM IST
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