प्रदेश18 विशेष: हां मैं एड्स पीड़ित हूं, पति से मिला मुझे यह रोग

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एक अनुमान के अनुसार, झारखंड से हर साल लगभग पांच लाख लोग रोजगार की तलाश में उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, गुजरात, मुंबई आदि जाते हैं. वहां से ज्यादातर रोग लेकर ही लौटते हैं जो जल्द ही पत्नियों को भी सौंप देते हैं.

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तब नई-नई ही शादी हुई थी मोना (बदला नाम) की. कुछ दिनों से पति बीमार रहने लगा था. कई डॉक्टरों से इलाज भी करवाया. जाने क्या जांच रिपोर्ट में आया कि ससुराल वाले का व्यवहार बदला सा लगा.

अब रसोई और दूसरे काम छोड़ कर उसे पति की सेवा में लगा दिया गया. इसी बीच मोना ने एक बेटी को जन्म दिया. पर पति की सेहत दिनों-दिन बिगड़ती चली गई. अंत में उसने दम तोड़ दिया.

पति की मौत के बाद उसे और बेटी को ससुराल वालों ने निकाल दिया. पर तब भी यह नहीं बताया कि आखिर उसके पति को हुआ क्या था? मायके पहुंचने के बाद मोना भी बीमार रहने लगी. टेस्ट हुआ तो पता चला कि एड्स है. यह भी कि पति की मौत भी एड्स की वजह से ही हुई है.

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सपने को दी ऐसे उड़ान
'बीमारी' की यह पुष्टि किसी के हौसले को तोड़ने के लिए काफी थी. पर मोना इस जिंदगी का एक कठिन पड़ाव मान कर आगे जाना चाहती थी. अपनी एड्स निगेटिव बेटी की राहों में खुशी देखना चाहती थी. अधूरी छूटी पढ़ाई को पूरा किया. हॉलीक्रॉस एड्स कंट्रोल हॉस्पिटल में नियमित इलाज कराया. इस बीच भाई की शादी हुई. अब मायके में भी मोना का रहना बहुत आसान नहीं था.

पढ़ाई पूरी कर मोना ने सबसे पहले नौकरी खोजी. आत्मनिर्भर होने के बाद बेटी को हॉस्टल में पढ़ने भेज दिया. मां-बेटी दोनों की जिंदगी संवरने लगी. नौकरीपेशा बहू को बुलाने वही ससुराल वाले आए, जिन्होंने घर से निकाल दिया था. पर मोना को अब अपना आसमान भाने लगा था. मायके-ससुराल जाती जरूर पर सम्मान के कुछ पल गुजारने.

लाखों लोगों का पलायन
झारखंड के हजारीबाग जिला के विष्णु प्रखंड की मोना की कहानी कोई इकलौता उदाहरण नहीं है. यह आइना है झारखंड की ऐसी महिलाओं के हौसले का, जिसके पति चंद रुपए कमाने दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में जाते हैं और एड्स रोग उपहार में लाते हैं.

एक अनुमान के अनुसार, झारखंड से हर साल लगभग पांच लाख लोग रोजगार की तलाश में उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली, गुजरात, मुंबई आदि जाते हैं. वहां से ज्यादातर रोग लेकर ही लौटते हैं जो जल्द ही पत्नियों को भी सौंप देते हैं.

पहले जहां रोग की पुष्टि के बाद महिलाएं जिंदगी के अंतिम पल का इंतजार करती दिखती थीं, अब हौसले के दम पर अपने लिए खुशियां बटोर लाती हैं.

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चार एड्स पीड़ित जीती चुनाव
हॉलीक्रॉस एड्स कंट्रोल हॉस्पिटल की सिस्टर ब्रिटो कहती हैं कि वर्ष 2015 के पंचायत चुनाव में चार एड्स पॉजिटिव महिलाओं ने जीत हासिल की. यह जीत डंके की चोट पर इस एलान के साथ हासिल हुई कि हां, मैं एड्स पीड़ित हूं.

इसमें तीन मुखिया हैं जबकि एक पंचायत समिति की सदस्य. गिरिडीह के बबोडर प्रखंड की मुखिया सलमा खातून (बदला नाम), चतरा जिला निवासी पंचायत समिति मेंबर आशा (बदला नाम), हजारीबाग के विष्णगढ़ प्रखंड की मुखिया सीमा (बदला नाम) का नाम शामिल है.

इनमें से तीन विधवा हैं जबकि एक के पति एचआईवी ग्रसित हैं. ये चारों अपने इलाके में जागरुकता फैला कर एड्स के खिलाफ जंग छेड़ रही हैं.

बदल रही सोच
एड्स कंट्रोल सोसाटी और हॉस्पिटल में जो केस आ रहे हैं, वह लोगों की बदलती सोच को जाहिर कर रहे हैं. सिस्टर ब्रिटो बताती हैं कि एड्स से पीड़ित होने के बाद भी इनकी कामयाबी हमें नई प्रेरणा देती है. इनमें से एक कपल की ही कहानी को लीजिए.

बीवी को एड्स था, लेकिन किस्मत से पति इसकी जद से दूर रहा. इसके बाद भी दोनों के रिश्ते में कोई गांठ नहीं पड़ी और प्यार बढ़ता ही गया. आज दोनों मिलकर काउंसलिंग कराने के लिए आती हैं. भला इस प्यार को आप क्या नाम देंगे.

आंकड़ों में एड्स

सूबे के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स के एचआरटी सेंटर में अगस्त 2006 से लेकर अक्टूबर 2016 तक 3759 एड्स के मरीज पंजीकृत हुए. इनमें 817 मरीज की मौत हुई. जबकि 264 मरीज ऐसे से जिनकी मौत दवा शुरू होने से पहले हो गई. रिम्स के एचआरटी सेंटर में संक्रमित बच्चों की संख्या अभी 583 है.

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