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तू अफसर बनेगा कहते-कहते पिता ने तोड़ दिया दम...अकेले मां-बहनों को पाल कर किसान का बेटा ऐसे बना IAS

इस साल यूपीएससी का एग्जाम देकर अफसर बनने का ख्वाब देखने वाले बच्चे परेशान हैं.

इस साल यूपीएससी का एग्जाम देकर अफसर बनने का ख्वाब देखने वाले बच्चे परेशान हैं.

आज हम आपको लिए ऐसे ही एक योद्धा की कहानी लेकर आए हैं जो कोरोना संकट के दौरान राहत कार्यों में देश को बचाने में जुटे हैं. इस किसान के बेटे की सफलता की कहानी आपको हर मुश्किल पार कर लक्ष्य को हासिल करने का जज्बा देगी.

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    नई दिल्ली. इस साल यूपीएससी की तैयारी करने वाले लाखों बच्चों का भविष्य अंधेरे में चला गया है. लॉकडाउन के कारण बहुत सी परीक्षाएं स्थगित कर दी गई हैं. इस साल यूपीएससी का एग्जाम देकर अफसर बनने का ख्वाब देखने वाले बच्चे परेशान हैं, पर हार नहीं मानी है. अपने लिए एक्सट्रा तैयारी का समय सोचकर पढ़ाई कर रहे हैं.

    इसलिए आज हम आपको लिए ऐसे ही एक योद्धा की कहानी लेकर आए हैं जो कोरोना संकट के दौरान राहत कार्यों में देश को बचाने में जुटे हैं. इस किसान के बेटे की सफलता की कहानी आपको हर मुश्किल पार कर लक्ष्य को हासिल करने का जज्बा देगी. IAS सक्सेज स्टोरी (IAS Success Story) में आज हम आपको गौरव सिंह सोगरवाल के बारे में बताने जा रहे हैं.

    गौरव ने बताया कि मैं एक निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण परिवार से हूं, मेरा बचपन कृषि और अन्य गतिविधियों से जुड़ा रहा है. गौरव ने बताया कि पिताजी अध्यापक थे और माताजी गृहिणी. हम तीन भाई-बहन हैं. बड़ी बहन ने जीव-विज्ञान में पी.जी. किया है और छोटा भाई एम.बी.ए. के बाद बेंगलुरु में एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत है. सिविल सेवा में जाने का सपना मेरे साथ मेरे पिताजी का भी था.

    बचपन से ही पिताजी ने सिविल सेवा के प्रति आकर्षण पैदा किया. ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण सिविल सेवा के प्रति मेरा आकर्षण निरंतर बढ़ता रहा. आमजन की समस्याओं के समाधान एवं राष्ट्र-निर्माण के रूप में सिविल सेवा मेरे लिए एक मिशन बन गया था. लेकिन एक सड़क दुर्घटना में पिताजी के मौत के बाद दुनिया काफी बदल गई.

    पिता मेरे सपनों को साकार होते न देख सके
    गौरव ने बताया कि उन्होंने परिवार एवं आर्थिक संघर्ष के रूप में जीवन के कई सारे उतार-चढ़ावों को देखा. परंतु सिविल सेवा में जाने का सपना अब और भी ज्यादा दृढ़ हो गया था. पुणे से इंजीनियरिंग करने के बाद घर की आर्थिक स्थितियों को सुधारने के लिए लगभग तीन साल तक प्राइवेट नौकरी की. इसके बाद साल 2013 दिल्ली आ गया.
    एक-एक अंक से चूके तो बढ़ा हौसला
    संघर्ष के दिनों में अपनी पढ़ाई और परिवार की जरूरतों को पूरा करना मुश्किल होता था. पहले प्रयास में मेरा प्रारंभिक परीक्षा में 1 अंक से चयन रुक गया, तो वहीं दूसरे प्रयास में 1 अंक से मुख्य परीक्षा में चयनित नहीं हो पाया. इन असफलताओं ने मुझे काफी विचलित किया. परंतु अपने संघर्ष के दिनों की याद करके और आध्यात्मिकता का सहारा लेकर मैंने दृढ़ संकल्पित हो फिर से तैयारी की.

    इस दौरान मेरा चयन असिस्टेंट कमांडेंट के रूप में BSF में हो चुका था, इसलिए रोजगार की चिंता अब ज्यादा नहीं रही. अपने तीसरे प्रयास में मैंने मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन-शैली पर ध्यान दिया और अपनी कमजोरियों को दूर करने का प्रयास किया.

    समाचार-पत्रों रहे सूचना के महत्वपूर्ण साधन
    मेरी रणनीति में समाचार-पत्र एक महत्त्वपूर्ण स्थान निभाते हैं. मैंने आसपास घटने वाली घटनाओं पर बारीकी से अपनी समझ विकसित करने की कोशिश की तथा अपनी पृष्ठभूमि और अपने अनुभवों को भी अपने उत्तर में सम्मिलित किया, जिसके परिणामस्वरूप मुझे सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा में बेहतर अंक मिले. निबंध के लिए समय प्रबंधन और लेखन-शैली में भी सुधार किया.

    बहुत से गरीब बच्चे सिविल सर्विस में जाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं. पर अगर मेहनत और सही लगन से तैयारी की जाए तो मंजिल जरूर मिलती है. इसमें आपकी गरीबी और आर्थिक हालात आड़े नहीं आते. इसिलए लॉकडाउन के समय में भी निराश न हो और अपनी तैयारी लगातार जारी रखें एक दिन आपको सफलता जरूर मिलेगी.

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