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‘स्‍कूली बच्‍चों’ के साथ मिलकर ले. कर्नल मदन ने पाकिस्‍तानी दुश्‍मनों को दी शिकस्‍त

‘स्‍कूली बच्‍चों’ के साथ मिलकर ले. कर्नल मदन ने पाकिस्‍तानी दुश्‍मनों को दी शिकस्‍त

Indo Pakistan War 1965: श्रीनगर-लेह मार्ग से गुजर रहे सेना के वाहनों पर पाकिस्‍तानी सेना के लड़ाके गोलियों की बरसात कर रही थी. दुश्‍मन देश के इन लड़ाकों को लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा ने स्‍कूली बच्‍चों की मदद से धूल चटा दी थी. पढ़िए, 1965 के भारत-पाक युद्ध से चंद दिनों पहले की यह कहानी...   

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नई दिल्‍ली: भारत और पाकिस्‍तान के बीच अभी तक 1965 के युद्ध की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई थी. जम्‍मू और कश्‍मीर को हड़पने की नापाक साजिश के साथ पाकिस्‍तानी सेना ने हजारों की संख्‍या में अपने लड़ाकों की घुसपैठ भारतीय इलाके में कराई थी. यह घुसपैठ पीओके (पाकिस्‍तान के नाजायज कब्‍जे वाला कश्‍मीर) के अंतर्गत आने वाले हाजी पीर दर्रे से कराई थी. हाजी पीर दर्रे से घुसपैठ के बाद, ये पाकिस्‍तानी लड़ाके दो हिस्‍सों में बंट गए. आधे लड़ाके बारामुला के रास्‍ते श्रीनगर को चल पड़े. इन आतंकियों का मकसद कश्‍मीरी नौजवानों को भड़काकर हिंसा फैलाना और संचार व्‍यवस्‍था पर कब्‍जा करना था.

वहीं, बाकी के पाकिस्‍तानी लड़ाके ऊपर चोटियों पर ही रुक गए और श्रीनगर से लेह को जोड़ने वाले मुख्‍य मार्ग को अपनी मशीनगनों के निशाने पर ले लिया. यहीं से ये दुश्‍मन लड़ाके श्रीनगर से लेह की तरफ जा रहे सैन्‍य वाहनों को अपनी गोलियों का निशाना बना रहे थे. पाकिस्‍तान ने अपने इस षडयंत्र को ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ का नाम दिया था. हालांकि यह बात दीगर है कि कश्‍मीरियों का समर्थन न मिलने और भारतीय सेना की तरफ से मुंह तोड़ जवाब मिलने की वजह से पाकिस्‍तानी सेना का ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ पूरी तरह से विफल हो गया था. भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा ने ‘स्‍कूली बच्‍चों’ के साथ मिलकर पाकिस्‍तानी सेना के लड़ाकों को धूल चटा दी थी.

लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा उन दिनों जम्‍मू और कश्‍मीर स्थित हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्‍कूल में बतौर कमांडेंट तैनात थे. इसी दौरान, लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा को सूचना मिली कि चोटियों तक पहुंच चुके पाकिस्‍तानी लड़ाके श्रीनगर-लेह मार्ग से गुजर रहे सैन्‍य वाहनों पर गोलियों की बरसात कर रहे हैं. घाटी में युद्ध जैसे माहौल के बीच, पाकिस्‍तानी लड़ाकों की यह गुस्‍ताखी भारतीय सेना की कार्रवाई नुकसान पहुंचा सकती थी. लिहाजा, लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा ने स्‍कूल में मौजूद संसाधनों की मदद से दो टुकडियों का गठन किया. पहली टुकड़ी सोनमर्ग में तैनात की गई, जिसको पाकिस्‍तानी लड़ाकों से सीधा मोर्चा लेने की जिम्‍मेदारी दी गई. जिससे, सैनय वाहन बिना किसी रुकावट के श्रीनगर-लेह मार्ग पर गुजर सकें. वहीं दूसरी टुकड़ी को दुश्‍मनों की गतिविधियों का पता लगाने के लिए पेट्रोलिंग की जिम्‍मेदारी दी गई.

लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा यहीं नहीं रुके, उन्‍होंने स्‍कूल के NCO छात्रों और प्रशिक्षकों की एक एडॉक टीम बनाई. जिसे सोनमर्ग से करीब 30 मील दूर 12000 फीट की ऊंचाई पर भेजा गया. यह टीम अपने निर्धारित लक्ष्‍य की तरफ थी, तभी दुश्‍मनों ने इन पर गोलियों की बरसात शुरू कर दी. सूचना के बाद, मौके पर पहुंचे लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा ने अपने छात्रों के साथ मिलकर दुश्‍मनों के दांत खट्टे कर दिए. दोनों तरफ से गोलीबार शांत होने के बाद, लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा एडॉक टीम को डिप्‍लॉय कर रही रहे थे, तभी दुश्‍मन की तरफ से आई एक गोली लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा को भेदते हुए चली गई. लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा ने युद्ध भूमि में अनुकरणीय साहस, पहल और कुशलता का परिचय देते हुए 31 अगस्‍त 1965 को देश के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्‍च बलिदान दे दिया.

लेफ्टिनेंट कर्नल मदन लाल चड्ढा को उनके अनुकरणीय साहस, पहल और कुशलता का परिचय देने के लिए मरणोपरांत वीरचक्र से सम्‍मानित किया गया था.

Tags: Heroes of the Indian Army, Indian army, Indian Army Heroes, Indo Pakistan War 1965, Jammu and kashmir

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