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Battle of Haji Pir Pass: भारतीय सेना की पहली सर्जिकल स्‍ट्राइक और POK के हाजीपीर दर्रे पर फहराया गया तिरंगा

Battle of Haji Pir Pass: भारतीय सेना की पहली सर्जिकल स्‍ट्राइक और POK के हाजीपीर दर्रे पर फहराया गया तिरंगा

28 अगस्‍त 1965 को भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्‍मीर क्षेत्र में आने वाले हाजी पीर दर्रे पर भारतीय तिरंगा फहरा दिया था. (फोटो साभार: भारतीय सेना)

28 अगस्‍त 1965 को भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्‍मीर क्षेत्र में आने वाले हाजी पीर दर्रे पर भारतीय तिरंगा फहरा दिया था. (फोटो साभार: भारतीय सेना)

Indo Pakistan War 1965 से ठीक पहले भारत सेना ने पहली बार सीजफायर लाइन को पार कर पाकिस्‍तान पर सैन्‍य कार्रवाई की थी. कार्रवाई के दौरान, घुसपैठ के लिए इस्‍तेमाल होने वाले हाजी पीर दर्रे के पूरे इलाके को भारतीय सेना ने अपने कब्‍जे में ले लिया था.

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नई दिल्‍ली. 1947 में भारत-पाक के बीच चल रहे युद्ध पर 1 जनवरी 1949 को आधिकारिक विराम लग गया था. इस युद्ध विराम के साथ जम्‍मू और कश्‍मीर भी दो हिस्‍सों में बंट गया. एक हिस्‍सा भारत के पास रह गया, जबकि दूसरे हिस्‍से पर पाकिस्‍तान अवैध कब्‍जा जमा कर बैठ गया. इतने के बावजूद, पाकिस्‍तान की नापाक निगाहें जम्‍मू और कश्‍मीर से नहीं हटी. पाकिस्‍तानी सेना और वहां की सरकार में बैठे हुक्‍मरान लगातार जम्‍मू और कश्‍मीर को हथियाने के लिए नए-नए मंसूबे बुनते रहे. वहीं, अमेरिका और ब्रिटेन की तरफ से सैन्‍य मदद मिलने के बाद पाकिस्‍तान के इन नापाक मंसूबों को पंख लग गए.

1954 में अमेरिका ने करीब 1.5 अरब डॉलर की सैन्‍य मदद के साथ-साथ पाकिस्‍तान को FI04 फाइटर एयरक्राफ्ट, पैटन टैंक, सेबर जेट, यूनीवर्सल मशीनगन, एमआई राइफल, मोर्टार, रिकॉइललेस राइफल सहित अन्‍य अत्‍याधुनिक हथियार मुहैया कराए. अमेरिका और ब्रिटेन ने पाकिस्‍तान की सेना को न केवल प्रशिक्षित किया, बल्कि कई संयुक्‍त सैन्‍य अभ्‍यास भी किए. इस बीच, 1958 में पाकिस्‍तान में सैन्‍य में सैन्‍य तख्‍तापलट हुआ और जनरल अयूब खान ने खुद को राष्‍ट्रपति घोषित कर सत्‍ता अपने हाथों में ले ली. सैन्‍य तख्‍तापलट के बावजूद अमेरिका ने पाकिस्‍तान की मदद जारी रखी और 11 साल के अंतराल में पाकिस्‍तान की सेना को पूरी तरह से अत्‍याधुनिक कर दिया.

कच्‍छ के रास्‍ते पाकिस्‍तान ने रची कश्‍मीर को हड़पने की साजिश
इस बीच, भारत और चीन के बीच 1962 का युद्ध भी हो चुका था. अमेरिका से मिली सैन्‍य मदद और चीन से हुए सैन्‍य समझौते के बाद पाकिस्‍तान बेहद उत्‍साह में था. जनरल अयूब खान को लगा कि यही अच्‍छा मौका है, जब वह आसानी से कश्‍मीर को भारत से अलग कर सकता है. साजिश थी कि दो तरफ से भारत पर हमला करेगा. पहला हमला गुजरात के कच्‍छ से होगा, जबकि दूसरा हमला गोरिल्‍लाओं के जरिए कश्‍मीर में कराया जाएगा. पाकिस्‍तान की साजिश थी कि वह कच्‍छ के इलाके में कब्‍जा करेगा और उस इलाके को खाली करने के एवज में कश्‍मीर की मांग करेगा. 9 अप्रैल 1965 को पाकिस्‍तान ने अपनी नापाक साजिश को अंजाम देना शुरू किया.

एक तरफ, पाकिस्‍तान की 51 इन्फैंट्री ब्रिगेड ने कच्‍छ अंतर्राष्‍ट्रीय सीमा पार की और कंजरकोट के समीप स्थि‍त सरदार पोस्‍ट पर कब्‍जा कर लिया और दूसरी तरफ गोरिल्‍लाओ ने कश्‍मीर की संघर्ष विराम रेखा को पार कर अपने मंसूबों को अंजाम देना शुरू कर दिया. 24 अप्रैल को पाकिस्‍तान ने एक बार फिर कंजरकोट पर हमला किया. इस बार हमला टैंको के साथ किया गया था. इस हमले के बाद पाकिस्‍तान चार अन्‍य चौकियों सहित पूरे कंजरकोट में कब्‍जा कर लिया. साजिश के तहत, कंजरकोट क्षेत्र में कब्‍जे के बाद पाकिस्‍तान ने भारत के समक्ष बातचीत की पेशकश रखी, लेकिन भारत ने इस पेशकश को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि जब तक पाकिस्‍तान कंजरकोट से अपना कब्‍जा नहीं छोड़ता, तब तक बात नहीं होगी.

हालांकि, तत्‍कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्‍तान के बीच समझौता हुआ. 30 जून को भारत के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री और पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अयूब खान ने समझौते पर हस्‍ताक्षर किया. समझौते के तहत, पाकिस्‍तान कंजरकोट से कब्‍जा छोड़ने को राजी हो गया और भारत ने पाकिस्‍तान को एक सड़क के इस्‍तेमाल की इजाजत दी. भारतीय क्षेत्र में आने वाली इस सड़क का निर्माण पाकिस्‍तान ने किया था. इस समझौते के बाद, पाकिस्‍तान काफी हैरान था. उसे आशा नहीं थी कि भारत इतनी आसानी से समझौते के लिए राजी हो जाएगा. लिहाजा, उसने कश्‍मीर को हड़पने के मंसूबे से बड़ी साजिश पर काम करना शुरू कर दिया, जिसे ऑपरेशन जिब्राल्‍टर का नाम दिया गया.

कश्‍मीर में अशांति और संचार व्‍यवस्‍था पर कब्‍जे की साजिश
ऑपरेशन जिब्राल्‍टर के तहत, पाकिस्‍तान ने बड़ी संख्‍या में गुरिल्‍लाओं की घुसपैठ कश्‍मीर में कराई. साजिश थी कश्‍मीरी नागरिकों को भड़का कर हिंसा करवाना और संचार व्‍यवस्‍था पर कब्‍जा करना. साजिश के तहत 8 अगस्त को पीर दस्तगीर साहिब का त्योहार मनाने के लिए एकट्ठी होने वाली भीड़ के साथ मिलना था और अगले दिन, शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए एकत्रित भीड़ के साथ शामिल होकर लोगों को हिंसा के लिए उकसाना था. 5 अगस्‍त को इस साजिश का खुलासा हो गया. दरअसल, एक युवक ने तानमर्ग पुलिस स्‍टेशन को सूचना दी कि कुछ संदिग्‍ध युवक उसको रुपए का लालच देकर जानकारी हासिल करना चाह रहे थे.

इसी तरह का मामला मेंढर क्षेत्र से भी सामने आया. मेंढर क्षेत्र में एक कश्‍मीरी युवक ने गुरिल्‍लाओं के मंसूबों की जानकारी ब्रिगेड मुख्‍यालय को दी. 8 अगस्‍त को भारतीय सेना ने पाकिस्‍तान से आए दो गुरिल्‍लों को नारायण के पास से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में पूरी साजिश के खुलासे के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्‍तानी गुरिल्‍लों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया. इस बीच, पाकिस्‍तानी घुसपैठियों के मंसूबे इसलिए भी फेल हो गए, क्‍यों कि कश्‍मीर के लोगों ने उनका साथ देने से इंकार दिया. कश्‍मीरियों का साथ मिलकर भारतीय सेना ने ऑपरेशन जिब्राल्‍टर को ध्‍वस्‍त कर दिया.

हाजी पीर पास को जीत भारतीय सेना ने POK में फहराया तिरंगा
पाकिस्‍तान की तरह से लगातार हो रहे हमलों को देखते हुए तत्‍कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री ने कहा था कि यदि आवश्यक हुआ तो भारत हमलावरों के ठिकानों पर भी हमला कर सकता है. यह लड़ाई लंबे समय तक चल सकती है. अगर घुसपैठ जारी रही तो हमें लड़ाई को दूसरी तरफ ले जाना होगा. वहीं, ऑपरेशन जिब्राल्‍टर के विफल हो जाने के बाद पाकिस्‍तान इस कदर बौखलाया, कि उसने श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर भारी गोलीबारी शुरू कर दी. इस गोलीबारी का मकसद श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर हो रही सैन्‍य आवाजाही को रोकना था. भारतीय सेना ने पाकिस्‍तान की इस हरकत का मुंहतोड़ जवाब देने का फैसला किया. भारतीय सेना ने सबसे पहले सीज फायर लाइन को पार कर उन तीन चोटियों पर कब्‍जा किया जहां से राजमार्ग पर गोलीबारी की जा रही थी.

भारतीय सेना का लक्ष्‍य उस चोटी पर कब्‍जा करना था, जहां से पाकिस्‍तान लगातार घुसपैठ करा था. इस लक्ष्‍य को ऑपरेशन बक्‍सी का नाम दिया गया और ब्रिगेडियर जेड ए बक्‍शी के नेतृत्‍व में ऑपरेशन की शुरूआत 26 अगस्‍त को हुई. ऑपरेशन की जिम्‍मेदारी 1 पैरा, 19 पंजाब, 4 राजपूत, जेक राइफल्स और 4 सिख लाइट इन्फैंट्री को दी गई. भारतीय सेना ने 26 अगस्‍त को सीजफायर लाइन पार की. उनका पहला लक्ष्‍य सैंक था. भारी बारिश, सीधी चढ़ाई सहित तमाम दुस्‍वारियों के बीच भारतीय सेना ने अपना ऑपरेशन शुरू किया. 27 अगस्‍त की सुबह करीब 4:15 बजे भारतीय सेना दुश्‍मन के कब्‍जे वाली चोटी तक पहुंचने में कामयाब रही. पाकिस्‍तान सेना उस समय भारतीय सेना को देखकर इस तरह घबराई कि वह मौके पर दो मशीनगन और तीन हल्‍की मशीन सहित तमाम हथियारों को छोड़कर भाग खड़ी हुई और सैंक पर भारतीय सेना का कब्‍जा हो गया.

भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्‍मीर में अपनी कार्रवाई जारी रखी और 27 अगस्‍त की शाम 6 बजे तक लेदी वाली गली तक भारतीय परचम लहराने लगा. इस बड़ी सफलता के बाद ऑपरेशन की अगुवाई कर रहे मेजर रणजीत सिंह दयाल ने ब्रिगेड कमांड से हाजी पीर दर्रे पर चढ़ाई की इजाजत मांगी. कुछ समय बाद, इजाजत मिल भी गई. 27 अगस्‍त की दोपहर 2 बजे मेजर दयाल ने एक आर्टिलरी अधिकारी को अपने साथ लिया और हाजी पीर दर्रे की तरफ बढ़ चले. हाजी पीर दर्रे की तरफ चढ़ाई करने के कुछ समय बाद ही सैंक से भागे दुश्‍मन ने मेजर दयाल की टुकड़ी पर हमला कर दिया. भारतीय सेना ने जल्‍द ही इन दुश्‍मनों को अंजाम तक पहुंचा दिया. इसी दौरान, शुरू हुई बूंदाबांदी से पूरी घाटी कोहरे के अंधेरे में डूब गई. दो दिनों से लगातार युद्ध कर रही भारतीय सेना के जवान अब थोड़ा धक चुके थे, बावजूद इसके उन्‍होंने तमाम दुस्‍वारियों का सामना करते हुए हाजीपीर दर्रे की तरफ अपनी चढ़ाई जारी रखी.

हाजी पीर पास को जीत भारतीय सेना ने POK में फहराया तिरंगा
हाजी पर दर्रे के करीब पहुंचने के बाद मेजर दयाल ने फैसला लिया कि वे सीधा रास्‍ता छोड़कर दर्रे पर करीब 60 डिग्री की सीधी चढ़ाई करेंगे. भारी बारिश के बावजूद भारतीय सेना सुबह करीब साढ़े चार बजे ऊरी-पुंछ मार्ग के करीब तक पहुंच गई. यहां थोड़ी देर रुकने के बाद भारतीय सेना ने फिर चढ़ाई शुरू की. भारतीय सेना सुबह करीब 6 बजे दर्रे की तलहटी तक पहुंचने में कामयाब हो गई. इसी दौरान, भारतीय सेना की यह टुकड़ी दुश्‍मन की निगाहों पर आ गई. दुश्‍मन सेना ने मेजर दयाल की टीम पर गोली बरसाना शुरू कर दिया, जिसका भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब देना शुरू किया. इस युद्ध के बीच, मेजर दयाल ने एक बार फिर बड़ा फैसला लिया. उन्‍होंने लीडिंग प्‍लाटून और आर्टिलरी अधिकारी को दुश्‍मन को उलझा कर रखने के लिए कहा और खुद बाकी साथियों के साथ पश्चिमी छोर से दुश्‍मन तक पहुंचने के लिए चढ़ाई शुरू कर दी.

पश्चिमी छोर में चढ़ने के बाद, मेजर दयाल और साथी लगभग लुढ़कते हुए दुश्‍मन की तरफ बढ़ चले. मेजर दयाल के इस हमले ने दुश्‍मन सेना को चौंका दिया. भारतीय सेना की इस दो तरफा कार्रवाई से पाक सेना इस तरह घबराई कि वह मौके पर अपने सारे हथियार छोड़कर भाग खड़ी हुई. इस तरह, 28 अगस्‍त की सुबह करीब 10:30 बजे भारतीय सेना ने दर्रे पर कब्‍जा कर लिया और वहां भारतीय ध्‍वज तिरंगा फहरा दिया गया. हाजी पीर दर्रे की लड़ाई यहां पर खत्‍म नहीं हुई. भारतीय सेना की इस कार्रवाई से बौखलाई पाकिस्‍तान सेना ने एक बार फिर हमला लिया. जिसे भारतीय सेना ने बड़ी आसानी से विफल कर दिया. भारतीय सेना ने न केवल हाजी पीर के दर्रे पर अपना कब्‍जा कायम रखा, बल्कि दूसरी चोटियों पर भारतीय परचम लहराने का क्रम जारी रखा.

Battle of Haji Pir Pass पर विजय के लिए मेजर रणजीत सिंह दयाल को उनकी वीरता और नेतृत्व के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था.

Tags: Indian army, Indian Army Pride, Indian Army Pride Stories, Indo Pakistan War 1965, Jammu and kashmir

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