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Know Your Army Pride: लैंड माइन ब्‍लास्‍ट से दो टुकड़ों में बंटा 'शरीर', जीत तक दुश्‍मन से लड़ते रहे मेजर सिंह

मेजर सिंह की अद्भुत युद्ध कौशल, साहस और नेतृत्‍व क्षमता के लिए वीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था.

मेजर सिंह की अद्भुत युद्ध कौशल, साहस और नेतृत्‍व क्षमता के लिए वीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था.

Indo Pakistan War 1965: अपनी बहादुरी से मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह ने अपना नाम हमेशा के लिए इतिहास के पन्‍नों पर दर्ज कर दिया.

  • News18Hindi
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नई दिल्‍ली. Indo Pakistan War 1965: भारत-पाकिस्‍तान युद्ध 1965 को अंजाम तक पहुंचाने के लिए भारतीय सेना लगातार पाकिस्‍तानी इलाकों में अपनी विजय पताका फहरा रही थी. अमेरिकी सैन्‍य हथियारों, टैंकों और लड़ाकू विमानों से लैस पाकिस्‍तानी सेना की पकड़ लगातार अपने इलाको से छूटती जा रही थी. वहीं, भारतीय सेना के रणबांकुरे एक के बाद एक पाकिस्‍तानी गांवों में अपनी विजय पताका लहराते नजर आ रहे हैं.

भारतीय सेना के इन्‍हीं रणबांकुरों में शामिल थे कुमाऊं रेजिमेंट के मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह. अपनी बहादुरी से मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह ने युद्ध में 18 सितंबर 1965 की तारीख अपने नाम दर्ज करवा दी थी. मेजर सिंह की अद्भुत युद्ध कौशल, साहस और नेतृत्‍व क्षमता के लिए वीर चक्र से सम्‍मानित किया गया था. आइये, आपको रूबरू कराते हैं मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह से और बताते हैं बहादुरी की वह दस्‍तां, जिसने इतिहास के पन्‍नों पर हमेशा के लिए नाम दर्ज कर दिया.

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भारत-पाकिस्‍तान के युद्ध में यह तारीख 18 सितंबर 1965 की थी. कुमाऊं रेजिमेंट की एक कंपनी संभाल रहे मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह को केरी पर कब्‍जा करने की जिम्‍मेदारी सौंपी जाती है. केरी पर कब्‍जा करने के दृढ़ इरादे के साथ मेजर सिंह और उनकी कंपनी लक्ष्‍य की तरफ बढ़ना शुरू कर देते हैं.

वहीं, दूसरी तरफ, किसी भी कीमत में केरी पर अपना कब्‍जा कायम रखने के लिए दुश्‍मन सेना ने पूरे इलाके में लैंड माइंस बिछा दी थीं. भारतीय सेना की आहत मिलते ही दुश्‍मन ने आग उगल रही एलएमजी, एमएमजी और तोपखाने का मुंह भारतीय सेना की तरफ कर दिया.

हालात ऐसे कि जमीन से लैंड माइन के धमाके, ऊपर से तोप के गोले और सामने से एमएमजी-एलएमजी की फायरिंग भारतीय सेना के कदम रोकने की नाकाम कोशिश कर रहे थे. भारी क्षति के बावजूद , मेजर सिंह ने अपने जवानों का न ही साहस कम होने दिया और न ही जोश में कमी आने दी.

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जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए मेजर सिंह ने चार्ज का नेतृत्‍व अपने हाथ में लिया और दुश्‍मन की तरफ बढ़ चले. मेजर सिंह के नेतृत्‍व में भारतीय सेना ने लैंड माइन की परवाह छोड़ आगे बढ़ना शुरू कर दिया. देखते ही देखते, भारतीय सेना लैंड माइन फील्‍ड पार कर गई. हालांकि, इसी बीच एक लैंड माइन की चपेट में मेजर सिंह का एक पैर आ गया.

शरीर से एक पैर गंवाने के बाद भी मेजर‍ सिंह के साहस और जोश में कमी नहीं आई. उन्‍होंने देखा कि पास के बंंकर में मौजूद दुश्‍मन एमएमजी से उनके साथियों को निशाना बना रहा है. वे रेंगते हुए आगे बढ़े और अपने साथी की एलएमजी लेकर बंकर में मौजूद दुश्‍मनों पर गोलियों की बरसात शुरू कर दी.

कुछ ही मिनटों के बाद, बंकर में मौजूद बंकर खामोश हो गया. इसके बाद, शुरू हुई दुश्‍मन से हाथ से हाथ की लड़ाई. इस लड़ाई में भारतीय सेना ने पाकिस्‍तानी सैनिकों को पटखनी देकर केरी पर भारतीय तिरंगा फहरा दिया. इस कार्रवाई में मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह ने अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और उच्च कोटि के नेतृत्व के लिए वीर चक्र से सम्‍मानित किया गया.

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