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मुंबई में आज वर्ल्ड चैंपियन बना था भारत, सारी रात नाचते रहे लोग

वर्ल्ड कप 2011 की चैंपियन टीम इंडिया

वर्ल्ड कप 2011 की चैंपियन टीम इंडिया

02 अप्रैल 2011..ये वो दिन था जब भारत दूसरी बार वर्ल्ड कप चैंपियन बना था और धौनी एंड कंपनी ने कमाल कर दिया था

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दो अप्रैल 2011 को मुंबई के मरीन ड्राइव की रात दूसरी रातों की तरह नहीं थी. रात ग्यारह बजे के बाद मुंबई में समुद्र किनारे की इस खूबसूरत सड़क पर खुशियों का सैलाब था. बेशक यहां सारी रात जाम लगा रहा, लेकिन रातभर उत्सव की बारात भी निकलती रही. खुशी को जाहिर करने के जितने तरीके और अदाएं हो सकती थीं, वो सब यहां मौजूद थीं. यहां से कुछ दूरी पर इंडिया गेट के पास होटल ताज में टीम इंडिया के क्रिकेटर वानखेडे से आकर जश्न में डूबे थे. ये लम्हे थे वर्ल्ड कप क्रिकेट में धौनी एंड कंपनी के चैंपियन बनने के बाद खुशी के.

मुंबई का ताज होटल आनंद की लय पर थिरक रहा था. धौनी और उनकी टीम यहीं ठहरी हुई थी. उस रात होटल ने टीम के लिए शानदार इंतजाम किए थे. होटल में ठहरे लोग उनसे मिलने को उतावले थे. वैसे उस रात देशभर में भी किसकी आंखों में कहां नींद थी.

28 साल बाद (1983 में कपिल के देवों के चैंपियन बनने के बाद) भारत ने वो विजय हासिल की थी, जिसका अहसास खुशी के किसी भी पर्व और लम्हों से कहीं ज्यादा बड़ा था. वानखेडे में उस रात महेंद्र सिंह धौनी एंड कपंनी विजय के चरम शिखर को छुआ था.

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किसी सुखद सपने की तरह
वह सब कुछ मेरे लिए अब भी सुखद स्वप्न की तरह लग रहा है. आंखों के सामने बार-बार वो पल खुशगवार बयार की तरह आकर टंग जाता है. वर्ल्ड कप का फाइनल मैच यूं तो दोपहर ढाई बजे शुरू होना था, लेकिन दर्शकों की आवाजाही सुबह दस बजे से शुरू हो चुकी थीं.

नीली टोपियां, नीली जर्सियां और हजारों तिरंगे
एक बजे तक पूरा स्टेडियम नीले रंग में नहाया हुआ था, बल्कि यों कहिए कि ब्लू-ब्लू हो रहा था. नीली टोपियां, नीली जर्सियां और लहराते हुए हजारों तिरंगे. मैच से एक दिन पहले प्रेस कांफ्रेंस में भारत और श्रीलंका के कप्तानों की बॉडी लैंग्वेज भी कुछ अलग कहानी कह रही थी. अगर महेंद्र सिंह धौनी आत्मविश्वास से भरपूर थे तो श्रीलंकाई कप्तान कुमार संगकारा कुछ ठंडे से.

नीली टोपियां, नीली जर्सी और लहराते हुए तिरंगे


जब फाइनल मुकाबला शुरू हुआ तो सब कुछ टीम इंडिया के माफिक ही लग था. जहीर खान के लगातार तीन मेडन ओवर के बाद चौथे ओवर में ओपनर उपुल थरंगा की छुट्टी हो गई. ये स्टेडियम में मौजूद दर्शकों और टीवी के सामने बैठे करोड़ों भारतीयों के लिए राहत की बात थी, क्योंकि थरंगा और दिलशान तिलकरत्ने की ओपनिंग जोड़ी पूरे टूर्नामेंट में गजब छाई हुई थी.

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टारगेट मिला 275 रन
श्रीलंका की पारी को झटके लगते रहे लेकिन वो आगे भी बढ़ती रही. जयवर्धने ने उस दिन अगर शतक लगाया तो युवराज सिंह ने हर बार तब विकेट दिलाए जब हालात काबू से बाहर होने लगे. दिक्कत ये थी कि आखिर के पांच ओवरों में श्रीलंकाई बैटिंग जहां बेलगाम साबित हुई तो हमारी गेंदबाजी उतनी ही फुसफुसी. पांच ओवरों में 63 रनों का बनना आखिर यही बताता है. टारगेट मिला 275 रन.

पूरे स्टेडियम में पिन ड्रॉप साइलेंस
क्या आप यकीन करेंगे कि पहली ही गेंद पर टीम इंडिया के ओपनर वीरेंद्र सहवाग का विकेट गिरते ही वानखेडे में सन्नाटा छा गया, पिन ड्राप साइलेंस. सचिन तेंदुलकर अपने ही मैदान पर दस साल की उम्र में देखे सपने को पूरा करने उतरे. लेकिन फीके रहे. कुछ लोगों का मानना था कि समुद्र की ओर से आतीं हवाएं और रात की नमी भारतीय बल्लेबाजों के लिए और मुश्किलें पैदा करेंगी. जब सचिन भी सस्ते में आउट होकर लौटे तो 275 रनों का स्कोर वाकई बड़ा लगने लगा. हर ओर निराशा फैल गई. चालीस हजार दर्शकों के हुजुम का दिल भी कुछ बैठा लग रहा था.

अगर ठान लें तो कुछ नामुमकिन नहीं
लेकिन क्या वाकई असंभव कुछ होता है? इतिहास ने कई बार साबित किया है कि अगर ठान लो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं. दुनियाभर के विजेताओं की कहानियां तो कम से कम यही कहती हैं. उस दिन समुद्र से आती हवाएं भी शायद टीम इंडिया के बल्लेबाजों के कानों में यही कहानियां बुदबुदा रही थीं. फिर वो चले जो पूरे टूर्नामेंट में नहीं चले थे यानि कप्तान महेंद्र सिंह धौनी और गौतम गंभीर.

वर्ल्ड कप 2011 फाइनल का सुखद लम्हा


हां, इससे पहले हमारे आज के हीरो विराट कोहली आत्मविश्वास की डगर को मजबूत कर गए थे. गंभीर ने 96 रनों के सहारे पारी को गढ़ा तो धौनी ने लगता है कि अपनी सबसे शानदार बैटिंग को फाइनल के लिए बचाकर छोड़ा था. अविजित 91 रन. ..और वो छक्का तो अब तक जेहन में ताजा है जिसे लगाने के बाद उन्होंने पूरे देश का समां ही बदल दिया.

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रास्ता बनता चला गया
फाइनल में मलिंगा की खतरनाक यार्कर का सामना ना तो आसान था और न ही दिलशान की दनदनाती गेंदें चैन लेने देने वाली थीं. इन सबसे बचे तो मुरलीधरन की घातक फिरकी पैर उखाड़ने के लिए तैयार थी...लेकिन 02 अप्रैल 2011 को इनके बीच रास्ता बनता चला गया. 37वें ओवर तक जीत की सुगंध फैलने लगी थी. जब धौनी विजय का तिलक लगाने जा रहे थे तब सचिन ड्रेसिंग रूम में आंखें बंदकर भगवान से जीत की दुआ के लिए बुदबुदा रहे थे. जीत के तुरंत बाद जब टीम इंडिया के क्रिकेटर फटाफट मैदान की ओर भागे तो आंख मूंदे सचिन को साथ लेने के लिए उन्हें तुरंत पलटकर ड्रेसिंग रूम का रुख करना पड़ा.

जीत के बाद फिर निकली टीम इंडिया की विजय यात्रा, जिसमें टीम सचिन तेंदुलकर को कंधों पर उठाए हुए थी


जीत के बाद निकली विजय यात्रा
मास्टर ब्लास्टर ने तो जीत का संकल्प करके दाढ़ी बढ़ाई हुई थी. फिर वानखेडे स्टेडियम में टीम इंडिया के रणबांकुरों की विजय यात्रा निकली. पहले सचिन को कंधे पर बिठाया. फिर कोच ग्रेग क्रिस्टेन को भी कंधों पर उठाया गया.
1983 में कपिल देव के देवों ने पहली बार हमें पहली बार जिस विश्व विजय के शिखर पर चढ़ाया था, वो शिखर फिर हमारा था. जीत भी ऐसी कि आप सिर उठाकर गर्व से कह सकें हां जीत तो ऐसी ही होती है.

वंदेमातरम..वंदेमातरम..इंडिया..इंडिया..
अब भी याद आ रहा है कि किस कदर घंटों पूरे स्टेडियम में लगातार वंदेमातरम... वंदेमातरम... इंडिया... इंडिया की आवाजें गूंजती रहीं. स्टेडियम में एक साथ जब हजारों कंठों से ये आवाजें ध्वनिनाद कर रही थीं तो इसने हर किसी को अलौकिकता की तान से बांध दिया था. दूधिया रोशनी, हरा-भरा मैदान...हजारों तिरंगों के साथ हिलोरे लेता जनसमुद्र...अब लगता है कि क्या गजब का जादुई माहौल था उस दिन.

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