02 अप्रैल, यही वो तारीख है जब पहली गैर कांग्रेसी सरकार के गिरने की शुरुआत हो गई थी

जनता पार्टी के शीर्ष नेता राजनारायण जिन्हें उनकी पार्टी ने 02 अप्रैल 1979 को पार्टी से निकाल दिया.

जनता पार्टी के शीर्ष नेता राजनारायण जिन्हें उनकी पार्टी ने 02 अप्रैल 1979 को पार्टी से निकाल दिया.

02 अप्रैल वो तारीख है जब 41 साल पहले केंद्र में बनी पहली गैर कांग्रेसी सरकार के गिरने की शुरुआत हुई. हालांकि इसकी लंबी कहानी है लेकिन उस दिन जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता राजनारायण सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया था. इसके तीन महीने बाद ही ये सरकार गिर गई.

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41 साल पहले ये आज ही का दिन था, जब केंद्र में सत्तारुढ़ हुई पहली गैर कांग्रेसी सरकार के पतन की शुरुआत हो गई थी. जनता पार्टी के 150 से अधिक सांसदों के एक मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर करने  के बाद 02 अप्रैल को राजनारायण को जनता पार्टी से निकाल दिया गया. इसके बाद चंद दिनों में ये सरकार गिर गई.

जब 1977 में चुनाव हुए तो रायबरेली में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चुनाव लड़ रही थीं. जनता पार्टी के प्रत्याशी राजनारायण ने उनको हरा दिया. इस जीत के बाद वो देशभर में हीरो बन गए. यूं भी वो जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में थे लेकिन दो साल में कुछ ऐसा हो गया कि उन्हीं की पार्टी के ज्यादातर लोग उनके खिलाफ हो गए. नतीजा ये हुआ कि उन्हें उनकी पार्टी ने निकालकर बाहर कर दिया.

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29 मार्च, 1979 को जनता पार्टी के 150 से अधिक सांसदों ने अपने हस्ताक्षर के साथ एक मेमोरेंडम तैयार किया, जिसमें पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण पूर्व स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण को पार्टी से निकालने की मांग की गई. 02 अप्रैल यानि आज ही के दिन राजनारायण को पार्टी से निकाल दिया गया. ये वही राजनारायण थे, जिनकी याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के 1971 में रायबरेली से लड़े गए चुनाव को अवैध घोषित कर दिया था.
बाद में राजनारायण के समर्थकों ने कहा कि उन्होंने खुद जनता पार्टी छोड़ दी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर दबाव पड़ा कि राजनारायण को वापस ले लिया जाए, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया. उनकी जगह रवि राय को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया.

03 महीने बाद गिर गई जनता सरकार

राजनारायण को पार्टी से निकालना जनता पार्टी के लिए एक बड़ी भूल साबित हुई. पार्टी में बड़ी टूट हुई. 19 जुलाई 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने केवल पद से ही इस्तीफा नहीं दिया बल्कि राजनीति से भी संन्यास ले लिया. इसके साथ ही जनता पार्टी भी गिर गई. ये माना गया कि केंद्र में बनी ये पहली गैर कांग्रेसी सरकार अपने ही अंतर्विरोधों और कलह के चलते गिर गई.



बाद में मोरारजी ने इसे गलती माना

राजनारायण के करीबी और विश्वासपात्र रहे क्रांति प्रसाद कहते हैं कि ये बात सही है कि राजनारायण को पार्टी से निकाला गया, लेकिन बाद में जब मोरारजी की सरकार गिर गई तो उन्होंने कहा कि शायद राजनारायण को निकालना मेरी गलती थी.

80 बार जेल गए थे राजनारायण

राजनारायण फक्कड़ नेता थे. वो 69 साल की उम्र तक जिये. जिंदगी में 80 बार जेल गए. जेल में कुल 17 साल बिताए. तीन साल आजादी से पहले और 14 साल आजादी के बाद. ये कहा जाता है कि लौह महिला इंदिरा गांधी को किसी ने अगर डराया था तो वो राजनारायण थे. इमरजेंसी लगाने की भी बड़ी वजह वही थे.

बंगले में आने वाले हर किसी के लिए मुफ्त खाना

जिन दिनों वो दिल्ली में अपने बंगले में रहते थे. उन दिनों उनके यहां कोई भी खाना खाने आ सकता था. ये एकदम फ्री होता था. काम करवाने के लिए उनकी सरकारी कोठी पर पहुंचने वालों का इसी कोठी में मुफ्त रहने का भी इंतजाम हो जाता था.

वह राममनोहर लोहिया के साथ सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में थे. हर किसी के लिए उपलब्ध. हर किसी के लिए मददगार. हालांकि बाद के बरसों में उन्हीं के सियासी साथियों ने उनसे दूरी बना ली. उन्हें भारतीय राजनीति का विदूषक भी कहा गया.

एक जमाने में राजनारायण खुद को हनुमान और चौधरी चरण सिंह को राम कहते थे. फिर उन्हीं के खिलाफ बागपत में चुनाव लड़ने के लिए खड़े हुए


सारी जमीन गरीबों को दे दीं

राजनारायण का जन्म बनारस के उस जमींदार परिवार में हुआ था, जो वहां के राजघराने से जुड़ा माना जाता था. बहुतायत में जमीनें थीं. लंबी चौड़ी खेती, रसूख और रुतबा. वह अलग मिट्टी के बने थे. समाजवाद में तपे और ढले हुए. उनके खास सहयोगी क्रांति प्रकाश कहते हैं कि उन्होंने अपने हिस्से की सारी जमीन गरीबों को दे दी. परिवार में बहुत विरोध हुआ. भाइयों ने बुरा माना. वह टस से मस नहीं हुए. यहां तक कि अपने बेटों के लिए कोई संपत्ति नहीं छोड़ी.

इंदिरा के खिलाफ हर जगह ताल ठोंकी

बहुत पहले डॉ. युगेश्वर कल्हण की किताब छपी थी, ‘आपातकाल का धूमकेतुः राजनारायण.’ किताब में कहा गया, राजनारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ हर जगह लड़ाई लड़ी. संसद में और सड़क पर भी. चुनाव के मैदान में और अदालत में. कोई मोर्चा छोड़ा नहीं. 1969 में जिन समाजवादियों को लगता था कि इंदिरा सही काम कर रही हैं, उनका मोहभंग हो चुका था.

1971 के चुनावों में रायबरेली से इंदिरा के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार खड़ा किया जाना था. कोई तैयार नहीं था, न चंद्रभानु गुप्ता तैयार हुए. न चंद्रशेखर की हिम्मत हुई, न किसी अन्य दिग्गज नेता की. ऐसे में राजनारायण सिंह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार बने.

इंदिरा को अदालत में आकर सफाई देनी पड़ी

राजनारायण 1971 का चुनाव हार गए. चुनाव जीतीं इंदिरा गांधी. राजनारायण ने इंदिरा के सारे गलत हथकंडों पर नजर रखी. वह उनके एक-एक गलत काम को गिनते रहे. चुनाव खत्म होते ही न्यायालय पहुंचे. उन्होंने सात आरोप लगाए. मुकदमा शुरू हुआ, लंबा चला. एक समय ऐसा आया जब इंदिरा गांधी को खुद अदालत में हाजिर होना पड़ा. सफाई देनी पड़ी, उनसे छह घंटे तक पूछताछ हुई.

पांच साल बाद इंदिरा के खिलाफ फैसला आया

आखिरकार पांच साल बाद फैसला आया. इंदिरा गांधी के दबाव के बाद भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने कोई परवाह नहीं की. खुफिया ब्यूरो (आइबी) के एक अफसर को इलाहाबाद में इस काम में लगाया गया था कि वह बता सके कि फैसला क्या आने वाला है. जज ने टाइपिस्ट को घर बुलाया, फैसला लिखवाया. उसे तभी जाने दिया, जब फैसला सुना दिया गया.

राजनारायण ने इंदिरा गांधी द्वारा रायबरेली के चुनावों में की गई अनियमितताओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनके खिलाफ मुकदमा किया. इंदिरा तब प्रधानमंत्री थीं लेकिन उन्हें खुद अदालत में हाजिर होना पड़ा और सफाई देनी पड़ी.


उन्होंने इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव को अवैध घोषित कर दिया. उन पर छह सालों तक चुनाव लड़ने पर रोक लग गई. पुपुल जयकर ने इंदिरा की जीवनी में लिखा, " इंदिरा को आशंका थी कि फैसला उनके खिलाफ आ सकता है. 12 जून 1975 को फैसला आया. इसके 14वें दिन इंदिरा ने देशभर में आपातकाल लगा दिया."

सबसे पहले राजनारायण गिरफ्तार किए गए

आपातकाल लगने के कुछ ही घंटों के अंदर सबसे पहले राजनारायण गिरफ्तार किये गए. उसी दिन जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और अटलबिहारी वाजपेयी की गिरफ्तारी हुई. देशभर में हजारों लोग जेलों में डाले गए. राजनारायण वो शख्स थे, जिन्होंने इंदिरा को आतंकित कर दिया था कि उन्हें ये कदम उठाना पड़ा. इसने विपक्ष को साथ आने का मौका दिया.

पहली बार इंदिरा को मिली थी चुनावी शिकस्त 

वर्ष 1977 में पहली बार केंद्र में कांग्रेस के अलावा दूसरी पार्टी सत्तारुढ़ हुई. बेशक जनता पार्टी की सरकार अपने अंतरविरोधों की वजह से जल्दी ढह गई, लेकिन देश में गैरकांग्रेसी आंदोलन को नई ऑक्सीजन मिली. 1977 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटाकर चुनाव कराया तो रायबरेली पर उनके खिलाफ फिर राजनारायण सामने थे. इस बार उन्होंने इंदिरा को करारी शिकस्त दी. अपने पूरे राजनीतिक करियर में इंदिरा ने सही मायनों में एक ही शख्स से शिकस्त पाई. वो राजनारायण थे.

गरीबों को इलाज में आर्थिक मदद शुरू की

क्रांति प्रकाश बताते हैं कि जब जनता पार्टी के शासनकाल में राजनारायण स्वास्थ्य मंत्री बने तो उन्होंने तुरंत गरीबों को इलाज और ऑपरेशन के लिए आर्थिक मदद शुरू कराई. दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के नाम बदल दिए गए.

जब लोहिया हो गए उनसे नाराज

वह ताजिंदगी समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के करीबी रहे. उनके प्रिय पात्र. एक बार संबंधों में खटास आई. उसे राजनारायण ने खास अंदाज में दूर किया. राजनारायण 1962 में विधानसभा के चुनावों में हार गए. 1952 के बाद पहली बार वह विधानसभा से बाहर थे. पांच साल ये स्थिति बनी रहनी थी. ऐसे में लोहिया के नहीं चाहने के बाद भी वह 1962 में राज्यसभा चुनाव के लिए लड़े, जीत भी गए. लोहिया को ये अच्छा नहीं लगा, उन्होंने माना कि राजनारायण ने सिद्धांतों के खिलाफ गलत काम किया है. उनसे बातचीत बंद कर दी. घर आना बंद करा दिया. ये जगजाहिर था कि लोहिया अगर किसी से एक बार संबंध तोड़ लेते हैं तो फिर जोड़ते नहीं.

राजनारायण से राममनोहर लोहिया ने अपने संबंध तोड़ लिए थे. लोहिया के बारे में कहा जाता था कि अगर वो किसी से एक बार संबंध तोड़ लेते थे तो फिर जोड़ते थे लेकिन राजनारायण ने खास तरीके से उनके गुस्से का शांत कर ही दिया


वो लोहिया के घर के गेट पर धरना देकर बैठे रहते थे

राजनारायण ने भरसक कोशिश की, लेकिन लोहिया टस से मस नहीं हुए. उन्होंने खास तरीका निकाला. वह अगले कुछ महीनों तक राज्यसभा से निकलकर उस गेट पर धरना देकर बैठ जाते थे, जिससे लोहिया जी निकलते थे. जब वह लगातार ये करते रहे तो लोहिया जी को झुकना पड़ा, संबंध फिर बहाल हो गए. लोहिया पर रामकमल राय ने अपनी किताब ‘राम मनोहर लोहियाः आचरण की भाषा‘ में कहा है कि लोहिया जी अक्सर कहते थे जब तक राजनारायण जिंदा हैं, देश में लोकतंत्र मर नहीं सकता.

जीवन में कोई लग्जरी नहीं

राजनारायण के दरवाजे हमेशा जरूरतमंदों के लिए खुले होते थे. वह दिल्ली में जब रहते थे तो कोई खाली हाथ नहीं लौटता था. किसी के पास किराया नहीं होता था तो किसी के पास भोजन-हर किसी की वह मदद करते थे. क्रांति प्रकाश कहते हैं, "उनका जीवन हमेशा सादगी से भरा रहा. साधारण कपड़ा पहनते थे. जीवन में कोई लग्जरी नहीं थी. हां, बस वह खाने के शौकीन थे. उनके पास जो भी पैसा आता था, वो जरूरतमंदों में बंट जाता था. कभी अपने लिए एक पैसा नहीं जुटाया."

जब निधन हुआ तब बैंक खाते में इतनी रकम

बाद में उन्हीं के सियासी साथी उनसे परहेज करने लगे. उन्हीं साथियों ने उन्हें भारतीय राजनीति का विदूषक भी करार दिया. लेकिन ये बात सही है कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए उन्होंने कभी कोई समझौता किया ही नहीं. राजनारायण फकीर की भांति दुनिया से विदा हुए. 31 दिसंबर 1986 को उनका निधन हो गया. तब उनके बैंक खाते में मात्र 1450 रुपये थे.

जनता पार्टी की टूट में खलनायक

राजनारायण पर जनता पार्टी के सहयोगी नेता आरोप लगाते थे कि वो विध्वंसक प्रकृति के थे. उन्हीं के कारण ये पार्टी असमय टूटी. वैसे ये बात सही है कि अपने तकरीबन हर सहयोगी से उनका विवाद हुआ. वो उनके खिलाफ ताल ठोककर खड़े हो गए. वह जनता पार्टी के राज में चौधरी चरण सिंह को राम कहते थे और खुद को हनुमान बताते थे. लेकिन फिर उन्हीं चरण सिंह के खिलाफ बागपत में चुनाव लड़ने के लिए पहुंच गए. एक जमाने में उनकी चंद्रशेखर से अनबन हो गई, लेकिन उन्होंने चंद्रशेखर के नेतृत्व में कुछ सालों बाद फिर जनता पार्टी की सदस्यता ले ली.

तमाशबीन बाबा 

पत्रकार उदयन शर्मा की किताब "जनता पार्टी कैसे टूटी" मेंं उनके बारे में लिखा गया, " भारतीय राजनीति में राजनारायण की भूमिका कुछ-कुछ सड़क पर तमाशा दिखाने वाले उस बाबा जैसी है जो कीलों के बिस्तर पर लेट जाता है. उसका करतब देखने के लिए लोग उसके इर्द-गिर्द खड़े हो जाते हैं. यह राजनारायण ही हैं जो प्रसाद के रूप में प्राप्त गेंदे के फूलों की पूरी माला को ही चबा सकते हैं."

उन दिनों बच्चों की एक पत्रिका पराग को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "हनुमान उनके आदर्श हैं. उनके घर का माहौल पवित्र और धार्मिक था, इसीलिए उनका शरीर इतना मजबूत बना. हनुमान में उनकी आस्था इतनी ज़्यादा थी कि वह कभी-कभी स्कूल छोड़कर मंदिर चले जाया करते थे. बिना रामायण का पाठ किए पानी ग्रहण नहीं करते थे. घर में उन्हें सुबह चार बजे ही जगा दिया जाता था. कसरत के लिए अखाड़े में भेज दिया जाया करता था."

उन्होंने कहा कि हनुमान चालीसा उन्हें हमेशा से ही प्रिय रहा. उन्हें खेलकूद तो पसंद थे, लेकिन संगीत, फ़िल्म, साहित्य और सिगरेट के प्रति उनमें कोई रुचि नहीं रही.

मैं इसलिए स्वास्थ्य मंत्री बना

कई बार उनकी टिप्पणियां और कार्यकलाप विवाद खड़ा कर देते थे. मुंबई में जब वो जनता पार्टी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद दौरे पर गए तो उनसे पूछा गया कि उन्हें स्वास्थ्य मंत्री क्यों बनाया तो उनका जवाब था, “देश का स्वास्थ्य खराब है और मैं एक स्वस्थ व्यक्ति हूं, यही कारण है कि यह जिम्मेदारी मेरे ऊपर डाली गई है. ”
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