07 अगस्त 1947 : जिन्ना ने हमेशा के लिए भारत छोड़ दिया, माउंटबेटन से मिला आलीशान गिफ्ट

07 अगस्त 1947 : जिन्ना ने हमेशा के लिए भारत छोड़ दिया, माउंटबेटन से मिला आलीशान गिफ्ट
जब मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी बहन फातिमा के साथ 07 अगस्त 1947 को दिल्ली के हवाई अड्डे से लोगों से आखिरी विदाई ली

हम आपको लगातार बता रहे हैं कि 15 अगस्त 1947 यानि भारत की आजादी के दिन (Independence day of India) से करीब 10 दिन पहले किस तरह उल्टी गिनती जब चलनी शुरू हुई तो रोज-ब-रोज घटनाक्रम में कोई ना कोई बदलाव आने लगा. आज पेश है 07 अगस्त 1947 का हाल, जब जिन्ना (Mohammad Ali Jinnah) ने हमेशा के भारत छोड़कर पाकिस्तान का रुख किया

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 7, 2020, 11:56 AM IST
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म07 अगस्त 1947 को उमस से बेचैन होती दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर एक डकोटा विमान तैयार खड़ा था. मंजिल थी कराची. शाम का समय था. विमान उस शख्स का इंतजार कर रहा था, जो असल में इस देश के बंटवारे के लिए जिम्मेवार था. भारत की धरती पर ये उसका आखिरी दिन था. उसके बाद उसको कभी उस धरती पर नहीं वापस आना था, जहां उसका जन्म हुआ, जिसने उसे पहचान मिली.

शाम तीन से चार बजे के बीच 10, औरंगजेब रोड से एक कार निकली और पालम एयरपोर्ट के लिए सड़कों पर भागने लगी. इस कार में ड्राइवर के अलावा दो ही लोग थे. ये कार रामकृष्ण डालमिया ने खासतौर पर इस शख्स को एयरपोर्ट तक छोड़ने के लिए भेजी थी. कार में सवार ये शख्स मोहम्मद अली जिन्ना थे. उनके साथ थीं उनकी बहन फातिमा जिन्ना.

गिने-चुने लोग ही पालम पर थे जिन्ना को विदाई देने
जब वो पालम पहुंचे तो उन्हें उम्मीद थी कि काफी लोग वहां उन्हें विदा करने आएंगे. इसके उलट चंद लोग अलविदा कहने आए थे. एयरपोर्ट शांत था. जिन्ना ने वहां मौजूद लोगों से हाथ मिलाया. तेज कदमों से सुनहरे रंग के डकोटा की ओर बढ़ गए. ये रॉयल एयरफोर्स ब्रिटेन का विमान था, जो उन्हें 14 अगस्त से हकीकत बनने वाले पाकिस्तान में ले जाने वाला था.
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जिन्ना से तेजी से विमान की सीढ़ियां चढ़ीं. फिर दरवाजे से पलटकर वहां से नजर आती दिल्ली को देखा. वो अपनी सीट की ओर बढ़े. जब तक विमान हवा में रहा, उनकी निगाह दिल्ली का पीछा करती रही. इमारतें जब छोटी होती हुई ढेरों बिंदुओं में बदल गईं. तो वो बुदबुदाए- ये भी खत्म हो गया. फिर पूरी यात्रा वो कुछ नहीं बोले.

जिन्ना 07 अगस्त को जब दिल्ली से विदा हुए तो उनकी मंजिल थी कराची. जहां जब वो उतरे तो उनका जोरदार स्वागत हुआ


71 वर्षीय मोहम्मद अली जिन्ना देश के बंटवारे के बाद भारत से निकले नए देश पाकिस्तान की अगुवाई करने वाले थे. बंटवारे के बाद भारत- पाकिस्तान में मारकाट मची थी. लाखों शरणार्थी अपने जमीन को छोड़कर दूसरे वतन में जा रहे थे.

दिल्ली का मकान डालमिया को बेच दिया था
जिन्ना का ये दिन काफी व्यस्तताओं के बीच बीता. कराची रवाना होने से पहले जिन्ना दिल्ली का अपना मकान 10, औरंगजेब रोड (अब एपीजे कलाम रोड) को उद्योगपति राम कृष्ण डालमिया को तीन लाख रुपए में बेच चुके थे. हालांकि डालमिया ने भी बाद में ये मकान डच दूतावास को बेच दिया. इन दिनों में उसमें डच एंबेसडर रहते हैं.

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दिन में कई लोगों से मिले
दिन में वो कई लोगों से मिले. डालमिया भी उनसे मिलने आए. जिन्ना की बेटी दीना वाडिया उस दिन मुंबई में ही थी. लेकिन ना तो उनकी उससे बात ही हुई. ना ही वो उनसे मिलने आई. बेटी से वो नाराज थे. उसने उनकी मर्जी के खिलाफ नेविल वाडिया से शादी कर ली थी. बेटी ने उनके साथ पाकिस्तान जाने से साफ मना कर दिया था.

जिन्ना ने जाते समय अपना दिल्ली का ये मकान उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया को बेचा, जिसे फिर कुछ दिनों बाद बेच दिया गया


माउंटबेटन ने रॉल्स रॉयल्स गिफ्ट में दी
जिन्ना को भारत छोडऩे से पहले लार्ड माउंटबेटन से दो उपहार मिले. एक तो उन्होंने अपना एडीसी एहसान अली उन्हें सुपुर्द किया, जो पाकिस्तान जाकर जिन्ना के रोजाना के कामकाज का हिस्सा बनने वाला था. साथ ही अपनी रॉल्स रॉयल्स कार भी उन्हें उपहार में दी.

कराची में जिन्ना से मिलने के लिए भारी संख्या में भीड़ इकट्ठा थी


कराची में अलग था माहौल
विमान सीधे मौरीपुर (मसरूर) में उतरा, जो कराची की हवाई पट्टी थी. जहां जिन्ना दिल्ली से चुपचाप और बगैर गहमागहमी के विदा हुए थे, वहीं कराची की इस हवाई पट्टी पर उनके स्वागत के लिए 50 हजार से ज्यादा लोग इकट्ठा थे.

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कभी नहीं लौट सके
हवाई अड्डा "कायदे आजम जिंदाबाद", "पाकिस्तान जिंदाबाद" के नारों से गूंज रहा था. हवाई अड्डे से उनका काफिला कराची की सडक़ों पर निकला. सडक़ों के दोनों ओर लोग उनके स्वागत के लिए इकट्ठा थे. जिन्ना ये सोचकर मुंबई का मकान छोड़ गए थे कि वो कभी वहां फिर वापस लौट सकेंगे. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ.
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