आजादी से 5 दिन पहले भारत में थे दंगे और पाकिस्तान में एक हिंदू को मिला था ये बड़ा काम

कलकत्ता दंगों की आग में जल रहा था. जब गांधीजी पटना से वहां पहुंचे तो वो वहां की हालत देखकर दंग रह गए.

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: August 13, 2018, 9:44 AM IST
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: August 13, 2018, 9:44 AM IST
15 अगस्त 1947 से ठीक पांच दिन पहले यानि 10 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान में क्या हो रहा था. कोलकाता (पहले कलकत्ता) दंगों की आग में बुरी तरह झुलस रहा था. गांधीजी वहां इसे शांत करने में लगे थे तो पाकिस्तान में एक हिंदू नेता योगेंद्रनाथ मंडल को संविधान सभा का अस्थायी चेयरमैन चुना गया. वो जिन्ना के साथ भारत से पाकिस्तान चले गए थे.

कलकत्ता में दंगों की आग में बुरी तरह झुलसा हुआ था. इस महानगर की स्थिति देशभर में सबसे खराब थी. हिंदू और मुसलमान उन्माद में भरे हुए थे. कलकत्ता में 28 फीसदी मुस्लिम रहते थे. उनके घर और संपत्तियां को तहस-नहस किया जा रहा था. बदले में मुस्लिम भी कार्रवाई कर रहे थे. हालांकि मुस्लिमों का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ था.

गांधीजी 09 अगस्त को पटना से कोलकाता पहुंचे. वो कोलकाता से आठ किलोमीटर दूर सोदीपुर के गांधी आश्रम में ठहरे. अगले ही दिन वो कलकत्ता को शांत करने के अपने प्रयासों में जुट गए. आते ही वो बंगाल के मुख्यमंत्री पीसी घोष और गर्वनर सर फ्रेड्रिक बरो से मिलकर हालात के बारे में जान चुके थे.

ये भी पढ़ें- जब गांधी जी ने कहा...'ऐसा हुआ तो मैं तिरंगे को सलामी नहीं दूंगा'

गांधीजी के पास पहुंच रही थी वेदना में डूबी भीड़
गांधीजी को विश्वास नहीं हो पा रहा था कि आजादी से ठीक पांच दिन भारत के किसी शहर की हालत ऐसी हो सकती है. सरकार, प्रशासन और पुलिस सभी लुंजपुंज लग रहे थे. प्रशासन में जो मुस्लिम अधिकारी और कर्मचारी थे, उनमें से ज्यादातर पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की ओर कूच कर चुके थे.

गांधीजी अगस्त 1947 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में


10 अगस्त की सुबह से आश्रम में गांधीजी के बाद गुस्सा और वेदना में डूबे लोगों के झुंड के झुंड आ रहे थे. इसमें ज्यादातर मुस्लिम ग्रुप थे, जो खुद की मुसीबतों और नुकसान की बातें बता रहे थे. ज्यादातर लोग डरे हुए थे.

कांग्रेसियों को झिड़की-आप लोग क्या कर रहे हैं
गांधीजी जितना उनकी बातें सुनते जाते, उनकी चिंता बढती जाती कि अब क्या किया जाए. जब उन्हें मालूम हुआ कलकत्ता का एक पूर्व मेयर मोहम्मद उस्मान शहर में ही है, तो उन्होंने कुछ हद तक राहत की सांस ली. उस्मान कलकत्ता मुस्लिम लीग का सचिव भी था. उस्मान उनसे 10 अगस्त को दो बार मिलने आया.

ये भी पढ़ें - उस दिन मोहम्मद अली जिन्ना ने चुपचाप भारत छोड़ दिया...

उन्होंने उस्मान से इतना ही कहा कि वो मुस्लिमों के डर को दूर भगाने की कोशिश में जुट जाए. उसे कांग्रेसियों से जिस भी तरह के सहयोग की जरूरत होगी, वो मिलेगी. इसके बाद गांधीजी ने शहर के कांग्रेसियों को झिड़का, "वो क्या कर रहे हैं. तुरंत मेलमिलाप और सदभावना के काम पर लगें."

कोलकाता के सोदीपुर गांधी आश्रम में अगस्त 1947 में दंगों की स्थिति पर लोगों के साथ विचार-विमर्श करते हुए गांधीजी


गांधीजी मुस्लिमों के सामने रखी एक शर्त
शाम को उस्मान जब उसने फिर मिलने आया तो उसके साथ बड़े पैमाने पर मुस्लिम भी आए. उन्होंने गांधीजी से यही गुहार की कि वो किसी भी हाल में अगले दिन नोआखली नहीं जाएं. वहां जाना आगे बढा दें.

गांधीजी ने कुछ देर सोचा और फिर कहा, "एक शर्त पर मैं ऐसा करूंगा, आप मुझे गारंटी दें कि नोआखली में शांति बनी रहेगी, हिंदुओं का नुकसान नहीं होगा, आप लोगों के जो भी संपर्क वहां हैं, उससे सुनिश्चित करें, तभी मैं वहां अपना जाना दो दिन के लिए टाल दूंगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो उपवास पर बैठ जाऊंगा और ये मेरी मृत्यु के साथ ही ये खत्म होगा." इसका असर हुआ.

ये भी पढ़ें - गांधी जी की एक आवाज़ पर जब छिड़ी आजादी की आखिरी जंग

चला दिया अपना सबसे बड़ा हथियार 
शाम को प्रार्थनासभा में उन्होंने कलकत्ता में गुंडाराज को लताड़ा. गवर्नर और राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए. मुख्यमंत्री और मंत्रियों से पूछा, "आप लोग कर क्या रहे हैं." हालांकि गवर्नर और सरकार खुद गांधीजी के सामने नतमस्तक थे कि अब आप ही कुछ करिए. हम तो अपनी ओर जो कर सकेंगे, उसमें पूरी तरह जुट जाएंगे लेकिन आपकी भूमिका ही अब सबसे अहम है.

गांधीजी अपना सबसे बड़ा हथियार चला दिया. वो शाम से ही उपवास पर बैठ गए. आश्चर्यजनक तरीके से कलकत्ता में दूसरे दिन से हालात सामान्य होने लगे. झड़प की खबरें कम होनी शुरू हो गईं. वहीं नोआखली से भी शांति की खबरें आने लगीं.

ये भी पढ़ें - एक हिंदू ने लिखा था पाकिस्तान का पहला राष्ट्रगान 

पाकिस्तान में क्या था हाल 
अब पाकिस्तान की ओर रुख करते हैं. अगस्त की शुरुआत से ही वहां खास स्टाल्स और दुकानें खुल गईं, जिनपर पाकिस्तान का झंडा, बैनर्स, पोस्टर्स और बिल्ले बिक रहे थे. पाकिस्तान में मस्जिदों और अन्य धार्मिक जगहों पर दिन की शुरुआत खास नमाज और पूजा के साथ होती थी. हालांकि हिंसा की खबरें पाकिस्तान में भी हर जगह से आ रहीं थीं.

जोगेंद्रनाथ मंडल बंगाल के पाकिस्तान गए थे. वहां वो पाकिस्तान की संविधान सभा के अस्थायी चेयरमैन बने


हिंदू बना पाकिस्तान संविधान सभा का अस्थायी चेयरमैन
पाकिस्तान की पहली संविधान सभा की पहली मीटिंग 10 अगस्त को कराची की सिंध असेंबली बिल्डिंग में हुई. पहले दिन एक हिंदू नेता योगेंद्रनाथ मंडल को उसका अस्थायी चेयरमेन बनाया गया. मंडल मुस्लिम लीग के कट्टर नेताओं में थे. उन्होंने जिन्ना के साथ जोर-शोर से पाकिस्तान की मांग की थी.

बंटवारे से पहले वह पाकिस्तान चले गए थे. वहां उन्हें पाकिस्तान का पहला कानून और श्रम मंत्री बनाया गया. जब तक जिन्ना जिंदा रहे.तब तक तो उनकी स्थिति ठीक रही. लेकिन जिन्ना मौत के बाद मंडल और लियाकत अली के बीच ऐसे गहरे मतभेद पैदा हुए कि मंडल को वापस भारत लौटना पड़ा.

पाकिस्तान संविधान सभा की इसी बैठक में मोहम्मद अली जिन्ना को सर्वसम्मति से कायदे आजम की खिताब दिया गया.

ये भी पढ़ें -
नया कानून बनने के बाद तीन तलाक दिया तो क्या होगा!
पेड़ की जड़ों से पुल बना देते हैं भारत के आदिवासी, इन्हें जानकर सीना हो जायेगा चौड़ा
इस खाने के बिना दुनिया से खत्म हो जाएंगे सूमो रेस्लर
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर