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10 महीने का वक्त प्लान के लिए था, तो क्यों कई देशों में गड़बड़ा गया वैक्सीनेशन?

न्यूज़18 क्रिएटिव
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कई देशों में वैक्सीन उत्पादन (Vaccine Production) कंपनियों से सप्लाई मिलने से लेकर लोगों तक वैक्सीन धीमी गति से पहुंचने की शिकायतें बनी हुई हैं. भारत में फिलहाल कहा जा सकता है कि टीकाकरण अभियान (Vaccination Drive) भारत में बेहतर ढंग से चल रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 21, 2021, 11:21 AM IST
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दुनिया भर में 20 लाख से ज़्यादा जानें लेने वाले कोरोना वायरस (Corona Virus) ने पहले महामारी को लेकर तैयारियों की पोल खोली थी और अब टीकाकरण कार्यक्रम की तैयारी (Vaccination Preparations) की कमज़ोरियों को सामने लाकर रख दिया है. जिन देशों का दावा था कि वो महामारी से जूझने के लिए बेहतर तैयारी रखते हैं, वो भी Covid-19 के सामने लाचार ही दिखे. यहां तक कि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन (WHO) तक इस आपत स्थिति में लड़खड़ा गई. खरबों डॉलरों की अर्थव्यवस्था (World Economy) तो चौपट हुई ही, बड़े और विकसित कहे जाने वाले देश एक वायरस के सामने घुटनों पर ही नज़र आए. यह सिलसिला जारी है और कई देशों में वैक्सीनेशन भी पटरी से उतर चुका है.

आप जानते हैं कि पहले वैक्सीन डेवलपमेंट को लेकर कई तरह की गड़बड़ियों की खबरें सामने आई थीं, फिर ट्रायलों को लेकर और वैक्सीनों के अप्रूवल पर भी सवाल उठे थे. अब कई देशों में उतावली में शुरू किए गए टीकाकरण कार्यक्रम और अभियान बुरी तरह फेल हुए हैं. अमेरिका से बात शुरू करते हैं और भारत तक की बात करेंगे, जहां समस्याएं फिलहाल सबसे कम नज़र आ रही हैं.

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अमेरिका में बुरी तरह फेल हुआ वैक्सीनेशन
न्यूज़18 ने आपको पहले विस्तार से बताया कि अमेरिका में टीकाकरण को लेकर हालात कितने खराब हो गए. ट्रंप प्रशासन की कोताही और अव्यवस्था के चलते न तो वैक्सीन चिह्नित सेंटरों तक ठीक से पहुंची, न चुने गए समूहों को व्यवस्थित ढंग से दी जा सकी और आम लोग तो अब तक तरस ही रहे हैं. सप्लाई चेन से लेकर एक्शन फोर्स तक वैक्सीनेशन में नाकाम रही. राज्यों के बीच ठीक तरह से संवाद तक भी नहीं हो सका और अस्पष्ट गाइडलाइनों के चलते कई तरह के कन्फ्यूज़न खड़े हुए और लोग वैक्सीन के नाम पर सिर्फ गड़बड़ी ही देखते रहे.

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सप्लाई की समस्याएं कहां पेश आईं?
वैक्सीन की सप्लाई चेन को लेकर बड़ी समस्याएं कई देशों में पेश आईं. एक समाचार एजेंसी ने जो आंकड़े बताए, उनके मुताबिक प्रति 100 लोगों के हिसाब से वैक्सीन डोज़ सबसे ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने के मामले में इज़राइल सबसे आगे रहा, जहां 24.24 लोगों तक डोज़ पहुंच सके. इसके बाद, यूएई में 15.50, बहरीन में 8.28 लोगों तक वैक्सीन पहुंची.

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बड़े और विकसित कहे जाने वाले देश इस टेबल में बुरी तरह पिछड़े हुए नज़र आए. यूके में हर 100 लोगों में से सिर्फ 5.51, अमेरिका में 3.95, इटली में 1.66 और स्पेन में 1.65 लोगों तक ही वैक्सीन पहुंचाई जा सकी. आपको बताया जा चुका है कि अमेरिका के अलावा यूरोप के ये देश भी कोविड-19 की चपेट में बुरी तरह रहे.

डिलीवरी में देर होना बड़ी समस्या
वैक्सीन की सप्लाई प्रभावित होने से जो दूसरी सबसे बड़ी समस्या खड़ी हुई, वो है डिलीवरी की रफ्तार बहुत धीमी हो गई. पहले सप्लाई के हालात को समझें तो अमेरिका में इसे लेकर जहां प्रशासन की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हुए तो इज़राइल में पर्सनलाइज़्ड और डिजिटाइज़्ड हेल्थ सिस्टम ने बाज़ी मारी. अमेरिका में जहां 2020 की गर्मियों में फाइज़र की वैक्सीन बुक करने की कवायद शुरू हुई थी लेकिन ऐन समय पर सप्लाई का संकट खड़ा हुआ, वहीं, इज़राइल ने प्राथमिकता से इस विषय को लेते हुए अपनी हैसियत से ज़्यादा बजट भी इसे देकर सप्लाई सुनिश्चित की.

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अब डिलीवरी का मतलब है कि सेंटर तक वैक्सीन पहुंचे और उसे लोगों को लगाया जा सके. यहां भी इज़राइल ने बढ़त बनाई और करीब 20 लाख लोगों को वैक्सीन दे दी जबकि यहां की कुल आबादी ही 90 लाख के करीब है. इसी तरह, यूएई और ब्रिटेन में कुछ हद तक ऐसा ही सिलसिला दिखा, लेकिन ब्रिटेन में डिलीवरी में देर होना देखा गया. यह वास्तव में एक रेस में दौड़ने जैसा है. आप ऐसे समझें कि इज़राइल में करीब 6 फीसदी आबादी महामारी की चपेट में आई जबकि ब्रिटेन में बीते शुक्रवार को ही 56000 नए मरीज़ सामने आए.

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सवालों के तौर पर खड़ी हुई समस्याएं?
वैक्सीनेशन को लेकर जो समस्याएं पेश आ रही हैं, वो सरकारों और प्रशासन की प्राथमिकताओं और नज़रिये से जुड़ी हुई ज़्यादा हैं. हांगकांग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डोनाल्ड लो के हवाले से खबरों में कहा गया कि पहला सवाल तो यही रहा कि किस देश ने वैक्सीनेशन को लेकर सैद्धांतिक तौर पर चर्चा करने का माहौल किस तरह बनाया? यानी कहां किस तरह तैयारी की गई कि किस समूह को पहले वैक्सीन दी जाएगी और किसे बाद में. साथ ही, यह भी किस तरह तय किया गया कि उन समूहों तक सिलसिलेवार वैक्सीन पहुंचेगी कैसे. इस प्लानिंग में ही कई देश पिछड़े हुए दिखे.

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इसके बाद डोज़ को लेकर समझ बनाने की बात आई. इस बारे में विशेषज्ञों ने कहा कि आपको प्लानिंग के तौर पर ही तय करना था कि कब वैक्सीनेशन शुरू होगा और किस तरह चलेगा. यानी उत्पादन क्षमता और उसके वितरण की रफ्तार के बारे में पहले ही सुनिश्चित हो जाना चाहिए था.

आखिर में यह भी एक सवाल खड़ा हुआ कि किन देशों ने अपने लोगों को वैक्सीन लेने के बारे में किस तरह जागरूक किया? इस पहलू के साथ पारदर्शिता का मामला सीधे तौर पर जुड़ गया. इसका मतलब इस तरह समझना चाहिए कि इंडोनेशिया के प्रेसिडेंट टीवी पर आकर दिखाएं कि उन्होंने टीका लगावाया, यह ज़रूरी नहीं था. ज़रूरी यह था कि आप वैक्सीन की टेस्टिंग, ट्रायल, साइड इफेक्ट और प्रक्रिया को लेकर वैज्ञानिक आधार बताते और लोगों के मन में एक संतुष्टि पैदा करनी थी.


यह भी कहा गया कि हांगकांग में लोग सरकार पर विश्वास नहीं कर सके और वैक्सीन लेने में बिदक गए. अब रही बात भारत की, तो अब तक वैक्सीनेशन कार्यक्रम की चर्चा उन देशों के सिलसिले में की गई, जहां टीकाकरण शुरू हुए समय हो चुका है और विश्लेषण करने लायक आंकड़े और स्थितियां सामने आ चुकी हैं.

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भारत में टीकाकरण कितना सफल?
देश में वैक्सीनेशन शुरू हुए अभी एक हफ्ता भी नहीं हुआ है और लक्ष्य तय करके वैक्सीन दिए जाने की कवायद जारी है. इस बीच कुछ समस्याएं जो सामने आई हैं, उनमें से प्रमुख तौर पर प्रबंधन और तकनीक संबंधी हैं. जैसे टीकाकरण अभियान जिस कोविन एप पर टिका है, कुछ मामलों में उस पर रजिस्ट्रेशन और ठीक सूचना न मिल पाने की शिकायतें रहीं. दूसरे, कोवैक्सिन के मामले में पारदर्शी आंकड़ों के न होने से वैक्सीन लेने के प्रति एक नकारात्मक लहर भी देखी गई.

इनके अलावा, वैक्सीन दिए जाने के बाद कुछ मौतों के मामले में कहा जा चुका है कि मौत का कारण वैक्सीन नहीं रही. सप्लाई और डिलीवरी को लेकर फिलहाल टीकाकरण अभियान में बड़ी समस्याएं होने की रिपोर्ट्स नहीं हैं. कुछ खबरों में यह भी कहा गया है कि पूरे कार्यक्रम के दौरान छुटपुट शिकायतें ही आ रही हैं, बड़ी समस्याएं नहीं.
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