चीन में क्या खंडित हो चुकी है शी जिनपिंग की 'लौह नेता' की इमेज? साबित करती हैं ये 10 बातें

चीन में क्या खंडित हो चुकी है शी जिनपिंग की 'लौह नेता' की इमेज? साबित करती हैं ये 10 बातें
चाइना क्रोनी कैपटलिज्म जैसी चर्चित किताब के लेखक और चीनी मामलों के विशेशज्ञ मिनजिन अमेरिका में रहते हैं. पिछले दिनों अमेरिकी थिंक टैंक मैगजीन द अमेरिकन इंटरेस्ट को उन्होंने लंबा इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने साफ कहा कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग कमजोर हो रहे हैं. चीन में अपनी खंडित हो रही इमेज को बचाने के लिए अब वो बाहरी दुनिया में आक्रामकता का प्रदर्शन कर रहे हैं

"चाइना क्रोनी कैपटलिज्म" जैसी चर्चित किताब के लेखक और चीनी मामलों के विशेशज्ञ मिनजिन अमेरिका में रहते हैं. पिछले दिनों अमेरिकी थिंक टैंक मैगजीन द अमेरिकन इंटरेस्ट को उन्होंने लंबा इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने साफ कहा कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग कमजोर हो रहे हैं. चीन में अपनी खंडित हो रही इमेज को बचाने के लिए अब वो बाहरी दुनिया में आक्रामकता का प्रदर्शन कर रहे हैं

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चीन इन दिनों दुनियाभर के तमाम देशों को धमका रहा है. भारत की सीमा पर उसकी फौजें और साजोसामान बढ़ रहा है. दक्षिणी चीन सागर में मौजूद देशों के साथ उसका तनाव फिर चरम पर है. हांग कांग में उसके नए कानून से गुस्से की लहर है. पूरी दुनिया कोरोना वायरस से हो रही तबाही में उसे कठघरे में खड़ा कर रही है. चीन इन सबके बीच अपने प्रेसिडेंट शी जिनपिंग को लौह पुरुष दिखाने का प्रयास कर रहा है. लेकिन चीन से जुड़ा अमेरिकी थिंकटैंक मानता है कि जिनपिंग के लिए चीन के हालात चुनौतीपूर्ण हो रहे हैं.

अमेरिकी थिंक टैंक मैगजीन "द अमेरिकन इंटरेस्ट" ने इस बारे में चीनी मामलों के विशेषज्ञ मिनजिन पेई से लंबी बातचीत की. ये बातचीत द अमेरिकन इंटरेस्ट मैगजीन के कांट्रिब्यूटिंग एडीटर गैरी जे श्मिट ने उनसे की. मिनजिन अमेरिका में जाने-माने चीनी स्कॉलर हैं और चीन पर लिखी उनकी किताब "चाइना क्रोनी कैपटलिज्म" काफी चर्चित भी रही है. इस इंटरव्यू के आधार जो बातें निकलकर आईं, वो ये कहती हैं कि चीन में प्रेसिडेंट शी जिनपिंग के लिए कठिन हालात बनते जा रहे हैं. इससे चीनी जनता का ध्यान हटाने के लिए चीनी फौजों को जगह जगह टकराव के लिए तैनात किया जा रहा है. इसलिए अचानक चीन ने अपने पड़ोसियों और अमेरिका को अपना एग्रेशन यानी आक्रामकता दिखानी शुरू कर दी है.

जानें क्या हैं वो 10 बातें



1. ज्यादा पॉवर का मतलब ज्यादा रिस्क भी



इसमें कोई शक नहीं कि चीन के राजनीतिक इतिहास में माओ के बाद शी जिनपिंग सबसे ताकतवर राष्ट्रपति हैं. उनके पास काफी पॉवर्स हैं. फैसला लेने के मामले में भी माओ को छोड़कर वही हैं जिनके पास सबसे ज्यादा ताकत है. लिहाजा ज्यादातर फैसलों के लिए चीन उन्हीं की ओर देखता है. ज्यादा पॉवर का होना भी बहुत जोखिम भरा है. शी जिनपिंग के साथ यही हो रहा है. उनके कुछ पिछले फैसले सही नहीं रहे हैं.

2. कोरोना में गफलत
चीन में सबसे ज्यादा नाराजगी कोरोना को दबाने को लेकर चीनी हुकूमत के रवैये पर रही. पहली बार चीन के सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस पर चीनी अधिकारियों के रवैये पर तीखी प्रतिक्रिया हुई. उन डॉक्टरों को लेकर भी चीन के लोगों ने सोशल मीडिया पर सहानुभूति का रवैया अपनाया, जिनका मुंह चीन की सत्ता ने बंद करा दिया था. खासकर उन डॉक्टरों के बारे में जिन्होंने कोरोना वायरस को लेकर सावधान करने की कोशिश की थी. हाल के बरसों में कभी चीन की जनता ने इतना खुलकर सोशल मीडिया पर नाराजगी भरी प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की.

3. वनमैन रूल से नुकसान
कोरोना जिस समय चीन में फैल रहा था, उस समय अपेक्षा की जा रही थी कि इस बारे में हर फैसला ऊपर से शी जिनपिंग लें. लेकिन वनमैन रूल का सबसे बड़ा नुकसान ये है कि जिस शख्स पर आप इतना विश्वास कर रहे हैं या जिसको आपने सारे फैसलों का अधिकार दे दिया है, वो खुद कितना जानता है और कैसे फैसले लेता है. वुहान में शुरुआती अफरातफरी के आलम में ये साफ नजर आया कि वहां स्थानीय अधिकारियों को मालूम ही नहीं होता था कि उन्हें करना क्या है.

4. बेल्ट एंड रोड नीति की नाकामी
चीन ने शी जिनपिंग की अगुआई में बड़े जोरशोर से बेल्ट एंड रोड की पॉलिसी शुरू की लेकिन ये औंधे मुंह गिरी. ज्यादातर देशों ने इस पर कोई उत्साह नहीं दिखाया. चीन ने इसमें काफी धन फंसा लिया. इससे चीन में जिनपिंग की इमेज को बहुत धक्का पहुंचा. खासकर उनकी अपनी कम्युनिस्ट पार्टी में लेकिन पार्टी में वो इतने ताकतवर हैं कि कोई उनके खिलाफ आवाज तक नहीं उठा सकता.

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शी जिनपिंग पर कोरोना मामले से लेकर पिछले कई फैसलों में नाकामी पर सवालिया निशान लगे हैं


5. मीटिंग के बीच लंबे अंतराल पर सवाल
चीन में कोरोना वायरस को लेकर पोलित ब्यूरो की पहली मीटिंग 07 जनवरी को हुई. फिर दूसरी मीटिंग 20 जनवरी को. इसके बीच जिनपिंग के विदेशी दौरे और देश में दौरे जारी रहे. चीन में बेशक ऊपरी तौर पर हलचल नहीं हुई हो लेकिन अंदर ही अंदर ये सवाल करने वाले बहुत हैं कि जब देश कोरोना के भयंकर प्रकोप में घिरा हुआ था तो पहली मीटिंग के बाद राष्ट्रपति ने दूसरी मीटिंग में इतना समय क्यों लगाया. वो इस दौरान भी कोरोना पर ध्यान एकाग्र करने की जगह दौरे क्यों करते रहे.

6. क्या पोलित ब्यूरो की मीटिंग में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी
कम से कम मिनजिन पेई तो ऐसा ही मानते हैं कि जब जिनपिंग ने 07 जनवरी के बाद 20 जनवरी को अगली मीटिंग बुलाई तो मीटिंग में उनके दिशानिर्देशों पर तीखी प्रतिक्रिया हुई, जिसके बाद 22 जनवरी को उन्होंने वुहान में लंबा लॉकडाउन लगा दिया. ये पहली बार हुआ जबकि मीटिंग में कोरोना पर तीखी प्रतिक्रिया हुई. ये जिनपिंग के लौह नेतृत्व पर एक सवाल था. सवाल में ये छिपा हुआ था कि वो क्यों कोरोना की गंभीरता नहीं समझ पाए और जल्दी इस बारे में मीटिंग बुलाने की बजाए दौरे करते रहे.

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कहा जाता है कि चीन में कोरोना पर पोलित ब्यूरो की पहली मीटिंग 07 जनवरी को हुई फिर अगली 20 जनवरी को-इस लंबे अंतराल पर अगर तीखी प्रतिक्रिया हुई तो कोरोना पर पार्टी में पहली बार कुछ नाराजगी दिखी


7. लुंजपुंज सिस्टम पर प्रतिक्रिया
चीनी जनता ने कोरोना के दौरान चीन की अफसरशाही की लंजपुंज स्थिति पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर जाहिर कीं. हालांकि बाद में जिनपिंग ने बहुत से अधिकारियों को हटाया लेकिन ये साफ था कि शुरू से अधिकारी तो वही कर रहे थे जैसा वो चाहते थे या निर्देश दे रहे थे. ये बात बेशक जिनपिंग जाहिर नहीं करें लेकिन उन्हें महसूस हो गया कि देश में उनके नेतृत्व पर गुपचुप सवालिया निशान उठ रहे हैं.

8. चीन मीडिया ने दबे छिपे जता दी नाराजगी
क्या आप सोच सकते हैं कि चीन के उस डॉक्टर ली वेनलियांग की मौत की खबर को चीन के मीडिया या अखबार ने पहले पेज पर प्रमुखता से छापा जबकि चीन की सरकार ने उसका मुंह बंद करा दिया था. आमतौर पर चीन का मीडिया ऐसा करता नहीं लेकिन चीन के अखबारों ने ऐसा किया.

9. पार्टी में चुप्पी के भी खतरे हैं
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जानते हैं कि फिलहाल चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में कोई उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि उसे तुरंत पार्टी से साफ कर दिया जाएगा. लेकिन माना जा रहा है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में बड़े पैमाने पर असंतोष है. लीडरशिप को लेकर सवाल हैं और हाल के फैसलों पर नाराजगी भी. लेकिन ये बात भी सही है कि चुप्पी का मतलब ये नहीं कि विरोध सामने नहीं आएगा. उचित समय जब वो आएगा कि इतना प्रबल होगा कि संभालना मुश्किल हो जाएगा.

10 चीन में खंडित हो चुकी है जिनपिंग की लौह छवि
मिनजिन मानते हैं कि पिछले दिनों के कई फैसलों और घटनाओं के बाद चीनी का जनता का विश्वास शी जिनपिंग से उठ चुका है. उनकी लौह छवि खंडित हो चुकी है. फिर उन्होंने पार्टी और देश में अपना शिकंजा कुछ ज्यादा ही कसकर असंतोष को भी बढ़ाया है. इससे पहले चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का पूरा सिस्टम कुछ ज्यादा उदारवादी था, लोगों को लगता है कि ऐसा अब नहीं है. अपनी खंडित इमेज की रक्षा करने के लिए ही अब चीन देश से बाहर तमाम मुद्दों, सीमा विवाद में ज्यादा आक्रमकता दिखा रहा है. देशों के खिलाफ कुछ ज्यादा ही धौंस दिखा रहा है.

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