हरिवंश के बारे में 10 खास बातें, 500 रुपये की नौकरी से उपसभापति तक पहुंचने का सफर

हरिवंश के बारे में 10 खास बातें, 500 रुपये की नौकरी से उपसभापति तक पहुंचने का सफर
पत्रकार से नेता बने हरिवंश नारायण सिंह राज्यसभा में उप सभापति पद के लिए चुन लिए गए.

हरिवंश नाराय़ण सिंह (Harivansh Narayan Singh) फिर से राज्यसभा (Rajya Sabha) में उप सभापति (Deputy Chairman) चुन लिए गए हैं. सादगी और सहजता के लिए जाने जाने वाले हरिवंश का करियर एक पत्रकार के तौर पर तौर पर शुरू हुआ और अब वो सियासत में वो खास पहचान बना चुके हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 14, 2020, 6:13 PM IST
  • Share this:
जनता दल (यूनाइटेड) के हरिवंश नारायण सिंह फिर राज्यसभा के उपसभापति चुने गए हैं. ये दूसरा मौका है जबकि वो इस पद के लिए चुने गए हैं. उन्होंने आरजेडी के मनोज झा को हराया.

हरिवंश को जेडीयू जनता दल (यूनाइटेड) ने 2014 में राज्यसभा में भेजा था. उसके बाद वो वर्ष 2018 में उपसभापति बने थे. इसके बाद उनकी सदस्यता का कार्यकाल अप्रैल 2020 में खत्म हो गया, जिससे ये उप सभापति का पद खाली हो गया. जेडीयू से वो दूसरी बार भी चुनकर राज्यसभा में भेजे गए.

चुनाव में वो इस पद के सबसे मजबूत उम्मीदवार थे. माना जा रहा था एनडीए फिर उन्हें उम्मीदवार बनाएगा. ऐसा ही हुआ. राज्यसभा में दलीय स्थिति के मद्देनजर उनकी स्थिति यूपीए के साझा उम्मीदवार मनोज झा से मजबूत थी.



harivansh narayan singh
ये पहले से माना जा रहा था कि राज्यसभा में उप सभापति के चुनाव में एनडीए उम्मीवार हरिवंश नारायण सिंह आराम से जीत जाएंगे.

हरिवंश राजनीति में आने से पहले पत्रकारिता में एक दमदार संपादक और पत्रकार के तौर पर पहचान बना चुके थे. उन्होंने अपना करियर 500 रुपये की नौकरी से शुरू किया था. अब देश की राजनीति में निश्चित तौर पर उन्होंने खास पहचान बना ली है. उनके बारे में 10 खास बातें.
वह बलिया के सिताब दियारा गांव में 30 जून 1956 को पैदा हुए. मूल रूप से वो कृषि पृष्ठभूमि के मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं. गांव से उनका वास्ता लगातार बना रहा.
हरिवंश ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पढ़ाई की. फिर यहीं से पत्रकारिता में डिप्लोमा हासिल किया.
वर्ष 1974 में जब देशभर में जयप्रकाश नारायण समग्र आंदोलन के लिए अलख जगा रहे थे, तब वो भी इस आंदोलन में कूद पड़े. उन्होंने बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लिया.
1977 में उन्होंने अपनी पहली नौकरी टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ 500 रुपये में शुरू की. इसके बाद उन्हें इसी मीडिया हाउस की मैगजीन धर्मयुग में मुंबई भेजा गया. धर्मयुग उन दिनों देश की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका थी. हरिवंश ने वहां पर 1981 तक काम किया.
1981 में उन्होंने बैंक ऑफ इंडिया में सरकारी नौकरी शुरू की लेकिन ये उनको रास नहीं आई. चार साल ये नौकरी करने के बाद वो कोलकाता के अमृत बाजार पत्रिका अखबार का प्रकाशन करने वाले मीडिया हाउस से जुड़े, जो हिंदी में नई पत्रिका रविवार का प्रकाशन करने जा रहा था. यहां वो असिस्टेंट एडीटर के पद पर काम करने लगे.
1989 से उन्होंने रांची में प्रभात खबर अखबार के संपादक के तौर पर नई पारी शुरू की. इस अखबार को उन्होंने नया जीवन दिया. जब उन्होंने इस अखबार में अपना काम शुरू किया तो इसका सर्कुलेशन गिरकर महज 400 प्रतियों पर आ गया था लेकिन उसके बाद ये झारखंड का सबसे ज्यादा बिकने वाला समाचार पत्र बन गया.
हरिवंश का मीडिया करियर कुल मिलाकर 40 सालों का रहा. इस दौरान उन्होंने ग्रामीण पत्रकारिता को अगर पर्याप्त जगह दी तो चारा घोटाला को सबसे पहले उजागर करने वाले अखबार भी बने.
जेडीयू ने उन्हें 2014 में पहली बार राज्यसभा में भेजा, इसके बाद सियासत में उनकी नई पारी शुरू हुई. केवल 04 साल बाद जब राज्यसभा में पीजे कूरियन के बाद उपसभापति का पद खाली हुआ तो एनडीए ने उन्हें इसके लिए अपना उम्मीदवार बनाया. उन्होंने हरिप्रसाद को 125-105 से हराया. इस तरह वो राज्यसभा में 1952 के बाद तीसरे गैर कांग्रेसी उपसभापति बने.
हरिवंश ने कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ अतिरिक्त मीडिया सलाहकार के तौर पर काम किया. चंद्रशेखर की सरकार केवल 08 महीने ही चल पाई और उसके साथ ही उनकी ये पारी भी खत्म हो गई.
हरिवंश के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी हैं. दोनों विवाहित हैं.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज