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123 साल पुराना कानून बनेगा सरकार का हथियार, इसके जरिए कोरोना से जंग जीतने की तैयारी

News18Hindi
Updated: March 23, 2020, 3:59 PM IST
123 साल पुराना कानून बनेगा सरकार का हथियार, इसके जरिए कोरोना से जंग जीतने की तैयारी
लोगों को आइसोलेट करने के लिए अब सरकारों ने 1897 में बने एक कानून का सहारा लिया है.

1896 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी में प्लेग महामारी का आतंक था. तब ब्रिटिश सरकार ने ये कानून लागू कर लोगों को आइसोलेट करने की कोशिश की थी.

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  • Last Updated: March 23, 2020, 3:59 PM IST
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वैश्विक महामारी कोरोना के खिलाफ दुनियाभर की सरकारें ऐतिहासिक लड़ाई लड़ रही हैं. इसी क्रम में भारत सरकार ने इस महामारी पर लगाम लगाने के लिए 123 साल पुराने एक कानून का सहारा लिया है.

Epedemic Diseases Act 1897 के तहत अब राज्य और केंद्र सरकारें विशेष अधिकारों के जरिए कोरोना की रोकथाम के प्रयास कर सकेंगी. इस कानून के तहत सरकार किसी भी उस व्यक्ति को जेल में डाल सकती हैं जो दिशानिर्देशों का पालन करता नहीं दिखेगा. इस कानून को पहली बार 1896 में तब लागू किया गया था जब बॉम्बे प्रेसीडेंसी में प्लेग महामारी फैल गई थी.

विशेष प्रावधान देते हैं अतिरिक्त अधिकार
गौरतलब है कि इस कानून में सिर्फ 4 प्रावधान हैं. इस कानून को तब ही लागू किया जाता है जब सरकारों को ये लगने लगता है कि मौजूदा नियमों के तहत रोकथाम नहीं हो पा रही है. इसके तहत केंद्र या राज्य सरकार को विशेष अधिकार मिलते हैं कि वो किसी इलाके को डेंजर जोन मान सकती हैं. इस इलाके में आने-जाने वाले किसी भी व्यक्ति या किसी अन्य चीज की जांच सरकार कर सकती है.



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इस कानून के सेक्शन 2A के मुताबिक केंद्र सरकार को ये अधिकार प्राप्त हो जाता है कि वो देश के बंदरगाहों पर आने वाले किसी भी जहाज की जांच कर सकती है. गौरतलब है कि जब ये कानून बना था तब विदेशों की यात्राएं पानी के द्वारा ही संभव थीं. अगर किसी विदेशी यात्री के जरिए महामारी का वायरस फैलने की आशंका होती थी सरकारें ये उपाय करती थीं. अगर आप कोरोना के संदर्भ में भी देखें तो चीन से ये वायरस दूसरे देशों में यात्रियों के जरिए ही पहुंचा. हालांकि अब यात्रा का माध्यम पानी के जहाज की बजाए हवाई जहाज में बदल चुका है.

मुकदमों में मिल सकती है सजा
इस कानून के उल्लंघन को लेकर बाद में देश में कई मुकदमे भी चले हैं. ऐसा ही एक मुकदमा ओडिशा में एक डॉक्टर के खिलाफ चला था. दरअसल 1959 में जब ओडिशा में हैजा की बीमारी फैली थी तब एक डॉक्टर ने इलाज करने से मना कर दिया था और उसके खिलाफ ओडिशा सरकार ने कार्रवाई की थी. ये मामला राज्य के पुरी जिले का था. इस कानून के मुताबिक अगर कोई सरकारी कर्मचारी या फिर अन्य जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्ति दायित्व निभाने से मना करें तो भी उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है.



तब ब्रिटिश सरकार पर लगे थे आरोप
जब इस कानून को ब्रिटिश सरकार ने लागू किया था तब इसकी काफी आलोचना भी की गई थी. सरकार इस कानून को लागू कर हर उस व्यक्ति को आइसोलेट कर रही थी जिस पर प्लेग से संक्रमित होने का शक होता था. तब ब्रिटिश अधिकारियों ने इसके लिए लोगों पर कठोर कार्रवाई की थी जिसका यह कहकर विरोध किया गया था कि ये आम जनता के ऊपर अत्याचार कर रहे हैं. तब भारतीय क्रांतिकारी बाल गंगाधर तिलक के अखबार केसरी में ब्रिटिश अधिकारी वाल्टर रैंड के खिलाफ कई लेख लिखे गए थे.

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First published: March 23, 2020, 2:41 PM IST
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