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भारत में आज: 21 साल बाद लिया जा सका था जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला

जलियांवाला बाग नरसंहार (Jallianwala Bagh Massacre) का बदला लेने में ऊधम सिंह ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था. (फाइल फोटो)

13 मार्च 1940 को जलियांवाला बाग (Jallianwala Bagh) हत्याकांड के 21 साल बाद क्रांतिकारी ऊधम सिंह (Shaheed Udham Singh) ने पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल माइकल ओ डायर (Michael O Dyer) की हत्या कर बदला लिया था.

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    13 मार्च को भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास का बहुत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है.  1940 में भारतीय क्रांतिकारी ऊधम सिंह (Udam Singh) ने 21 साल पहले हुआ जलियांवाला बाग नरसंहार (Jallianwala Bagh Massacre) का बदला लेने में सफलता पाई थी. इस नरसंहार से देश भर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रोष भर गया था और ऊधम सिंह ने इसका बदला लेने की कसम खा ली थी.

    क्या हुआ था जलियांवाला बाग में
    13 अप्रैल 1919, बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में अग्रेजी हुकूमत के रौलेट एक्ट के विरोध में एक सभा हो रही थी. इस सभा को रोकने के लिए ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर ने अंधाधुंध  गोलियां चलावा दी जिसकी वजह से सभा में मौजूद सभी लोग या तो घायल हो गए या फिर उनकी मौत हो गई. इस घटना के दौरान बहुत सारे लोगों ने गोलियों से बचने के लिये बाग के कुएं में कूद कर अपनी जान दे दी थी.

    कितने लोग मारे गए थे
    जनरल डायर ने बिना चेतावनी गोली चलाई और महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बक्शा. 10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं. अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए. यह सबकुछ जनरल डायर नामक एक अंग्रेज ऑफिसर के कहने पर हुआ. उस वक्त पंजाब के गवर्नर माइकल ओ'डायर थे.

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    ऊधम सिंह (Udham Singh) को जलियांवाला बाग नरसंहार (Jallianwala Bagh Massacre) का बदला लेने के लिए बहुत ज्यादा समय तक भटकना पड़ा. (फाइल फोटो)


    ऊधम सिंह ने लिया संकल्प
    इस घटना से पंजाब के लोगों में आक्रोश तो था ही, पूरे देश में रोष फैल गया था. बचपन से ही अनाथालय में पले बढ़े ऊधम सिंह के दिल में भी गुस्से की ज्वाला भड़क उठी. जनरल डायर को मारना उनका मकसद बन गया.  उन्होंने अपने बाकी क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर जनरल डायर को मारने का पूरा प्लान बनाया. वह अलग-अलग नाम और भेश में अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका जैसे देश घूम घूमकर सही मौके का इंतजार करते रहे.

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    लंबा खिंचा इंतजार
    घूमते हुए वे 1934 में लंदन पहुंच गए और वहां 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड़ पर रहने लगे. वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार और अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी ख़रीद ली. लेकिन जनरल डायर की बीमारी से पहले ही मौत हो चुकी थी. ऐसे में सिंह ने तय किया कि वह गवर्नर ओ'डायर को मारेंगे.

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    जलियांवाला बाग नरसंहार इतिहास में भारत के लिए गहरा जख्म छोड़ गया था जिस पर ऊधम सिंह (Udham Singh) ने मलहम लगाने का काम किया था.


    आखिर मिल गया मौका
    रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की 13 मार्च, 1940 को लंदन के कॉक्सटन हॉल में बैठक थी जिसमें नरसंहार के समय के  पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल माइकल ओ डायर को भी शामिल होना था. कॉक्सटन हॉल में बैठक में ऊधम सिंह भी पहुंच गए थे. जैसे ही डायर भाषण के बाद अपनी कुर्सी की तरफ बढ़ा किताब में छुपी रिवॉल्वर निकालकर ऊधम सिंह ने उस पर गोलियां बरसा दीं. डायर की मौके पर ही मौत हो गई.

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    हत्या करने के बाद ऊधम सिंह वहां से भागे नहीं. उन्होंने अपनी गिरफ्तारी करवाई और उन पर मुकदमा चला. कोर्ट में जब ऊधम सिंह से जज ने ये सवाल किया कि वे डायर के साथियों को भी मार सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया. इस पर ऊधमसिंह ने जवाब दिया, 'वहाँ पर कई महिलाएँ भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है. ऊधम सिंह पर मुकदमा चला. इसके बाद 31 जुलाई, 1940 को उन्हें फांसी दे दी गई.

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