क्या हत्या और दरिंदगी के शौकीन वीरप्पन ने देश को कुछ फायदे भी पहुंचाए?

क्या हत्या और दरिंदगी के शौकीन वीरप्पन ने देश को कुछ फायदे भी पहुंचाए?
18 अक्टूबर, 2004 चंदन तस्कर वीरप्पन को एक एनकाउंटर में मार दिया गया था

जिस रात वीरप्पन मारा गया उसके अगले दिन पोस्टमार्टम हाउस के बाहर उसकी लाश को देखने को 20 हजार से ज्यादा लोग लाइन लगाए हुए थे. 18 जनवरी, 1952 को वीरप्पन पैदा हुआ था.

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  • Last Updated: January 18, 2019, 11:06 AM IST
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'वीरप्पन मार दिया गया', उत्तर प्रदेश के एक पंसारी की दुकान पर जुटे लोग इसकी चर्चा कर रहे थे. तारीख थी 18 अक्टूबर, 2004. एक छोटा सा लड़का जो उस पंसारी की दुकान पर कुछ खरीदने पहुंचा था. उसने पंसारी के काउंटर पर रखे एक हिंदी दैनिक में पहले पन्ने पर छपी तस्वीर देखी, घनी मूंछों में बंदूक थामे एक आदमी खड़ा था. यही था 'वीरप्पन'. लोग वीरप्पन से जुड़े किस्सों का जिक्र कर रहे थे.

कोई कह रहा था, कुल 2 हजार हाथी मारे वीरप्पन ने. किसी का कहना था, सैकड़ों तो पुलिस वालों को ही मारा है. कोई कहता चंदन के  सारे पेड़ काट-काट के तस्करी कर दी. कोई बता रहा था, वीरप्पन रबड़ के जूते में पैसे भर के जमीन में गाड़कर रखता था.

बच्चा कुछ खास समझ नहीं रहा था, उसने दुकान से सामान लिया और घर चला आया पर उसे ये नाम पसंद आ गया था 'वीरप्पन'. अगली सुबह उसने घर पर आने वाले अखबार में वीरप्पन की दूसरी तस्वीरें देखीं. तस्वीरें भयावह थीं. एक में उसका चेहरा खुरचा हुआ लग रहा था तो दूसरी तस्वीर में उसके सिर पर एक गड्ढा था और एक आंख भी गायब थी.



इस घटना के 14 साल हो चुके हैं. वीरप्पन के बारे में तबसे कई तरह के पक्ष-विपक्ष में आने वाले बयानों के अलावा किताबें, यहां तक की फिल्में भी आ चुकी हैं पर वीरप्पन की मौत के साथ दफन हुए कई राज आज भी राज बने हुए हैं. आज के ही दिन वीरप्पन 1952 में पैदा हुआ था. पढ़ें, 'वीरैय्या' कैसे बना था 'वीरप्पन' -
गरीबी के साथ अपराध ने मिलकर बना दिया था वीरप्पन
1962 में वीरप्पन ने 10 साल की उम्र में एक तस्कर का कत्ल कर दिया. ये उसका पहला अपराध था. उसी वक्त उसने फॉरेस्ट विभाग के भी तीन अफसरों को मारा. तब उसका नाम 'वीरैय्या' हुआ करता था और वो बहुत गरीब था. बल्कि उसके गांव वाले तो कहते हैं कि फॉरेस्ट विभाग के लोगों ने उसे स्मगलिंग के लिए उकसाया था. फिर इसका पैसा और पावर बढ़ता देख वो इसे मारने की फिराक में लग गए तो वीरप्पन जंगल में भाग गया.

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वीरप्पन की शादी भी हुई थी. उसने अपनी पत्नी का हाथ अपने ससुर से बिल्कुल फिल्मी अंदाज में मांगा था. पर उसके जंगल में भागने के बाद उसने अपनी पत्नी को एक शहरी इलाके में रहने भेज दिया था. अब गरीब वीरप्पन पुलिस, राजनीति और भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसकर तस्कर वीरप्पन बन चुका था. लोगों को उसकी गरीबी और परेशानी में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वो बस उसके किस्से सुनना चाहते थे. मौत के वक्त एक पत्रकार ने दावा किया था कि वीरप्पन जयललिता और करुणानिधि के झगड़े की पैदाइश था.

हाथी दांत की तस्करी से वीरप्पन को कोई फायदा नहीं हुआ था?
वीरप्पन ने जीवन में कई लोगों को किडनैप किया पर 1997 में सरकारी अफसर समझकर जिन दो लोगों को किडनैप किया वो फोटोग्राफर निकले. इन्होंने वीरप्पन के साथ 14 दिन जंगलों में गुजारे. इन लोगों ने बाद में इस घटना पर किताब भी लिखी थी, 'बर्ड्स, बीस्ट्स एंड बैंडिट्स'. इसमें इन्होंने वीरप्पन की जो कहानियां बताईं, वो वीरप्पन के आतंक की कहानियों से हटकर थी. उन्होंने बताया कि वीरप्पन हाथियों को लेकर बहुत इमोशनल था. उसने इन फोटोग्राफरों को बताया था कि जंगल में जो भी होता है, उसे वीरप्पन के नाम पर मढ़ दिया जाता है.

उसने इन्हें बताया था कि हाथियों का धंधा वो बहुत पहले ही छोड़ चुका है. वीरप्पन की इस बात में काफी हद तक सच्चाई थी. अगर 'फ्रंटलाइन' पत्रिका की एक रिपोर्ट के आंकड़ों को मानें तो वीरप्पन ने कुल मिलाकर 500 से ज्यादा हाथियों की हत्या नहीं की थी. हालांकि ये भी बेहद घृणित है पर जो 2 हजार का आंकड़ा बताया जाता है वो करीब 25 साल में दक्षिण भारत में मारे गए कुल हाथियों का आंकड़ा है.

यहां तक की उस रिपोर्ट में इस पर भी चर्चा की गई है कि इससे उसे कुल 2.5 करोड़ से ज्यादा की आमदनी नहीं हुई थी. और इस आमदनी का भी बड़ा हिस्सा उसे बिचौलियों और अपने राजनीतिक संरक्षण पर खर्च करना पड़ा था.

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राजकुमार को किडनैप कर दिखाई अपनी हैसियत
1987 में वीरप्पन ने देश को तब हिलाकर रख दिया जब उसने चिदंबरम नाम के एक फॉरेस्ट ऑफिसर को किडनैप किया. कुछ वक्त बाद उसने नृशंसता की हद दिखाई और एक पुलिस टीम को उड़ा दिया. जिसमें 22 लोग मारे गए. फिर 2000 में वीरप्पन ने हीरो राजकुमार को किडनैप कर लिया और रिहाई के लिए उन पर फिरौती रखी 50 करोड़ की.

पर खास बात ये थी कि वीरप्पन ने साथ ही बॉर्डर के इलाकों के लिए वेलफेयर स्कीम की भी मांग की. ये उसका रॉबिनहु़ड बनने का स्टाइल था. बल्कि मानें तो जंगलों में रहने वाले उसे रॉबिनहु़ड से कम मानते भी नहीं थे. जो भी उससे एक बार मिला था, उससे प्रभावित हुए बिना रहता था, यही वजह थी कि जिस रात वीरप्पन मारा गया उसके अगले दिन पोस्टमार्टम हाउस के बाहर उसकी लाश को देखने को 20 हजार से ज्यादा लोग लाइन लगाए हुए थे.

बहरहाल, राजकुमार बच गए. कोई कहता है सरकार के दबाव बनाने से छूट गए, किसी का कहना है सरकार ने पैसे दिए. वैसे एक बार तत्कालीन डीजीपी सी. दिनाकरन ने ये भी आरोप लगाया था कि इस केस में राजकुमार को छुड़ाने के लिए मुख्यमंत्री एस.एम. कृष्णा के ऑफिस से 20 करोड़ रुपए वीरप्पन को फिरौती भी दी गई थी. वीरप्पन को कुल 184 लोगों का हत्यारा बताया जाता है, जिनमें से 97 पुलिसवाले थे.

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वीरप्पन के होने से देश को कुछ फायदे भी हुए
चंदन की तस्करी में वीरप्पन को फायदा होता था और निस्संदेह उसने इससे बहुत पैसा कमाया. पर जैसा कहा जाता है वीरप्पन ने 10 हजार टन चंदन की लकड़ी काट कर बेची जिससे उसे दो अरब की कमाई हुई. ये बात भी बढ़ाई-चढ़ाई गई है. इसमें भी उस दौर में हुई पूरी कटाई को वीरप्पन के खाते में जोड़ दिया जाता है.

इन जंगलों में जिनका घर है वो लोग बताते हैं कि चंदन के कटे पेड़ जिस ट्रक पर लदे रहते थे, वीरप्पन उसकी छत पर बंदूक लिए बैठा रहता था. और आगे का रास्ता बताया करता था. इस काम में हमेशा वो साथियों के साथ रहता था.

लेकिन फ्रंटलाइन की जिस रिपोर्ट का जिक्र ऊपर किया गया है, वो बताती है कि वीरप्पन के कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों में रहने से बस पर्यावरण को नुकसान तो हुआ लेकिन कई फायदे भी हुए.



ये सच है कि वीरप्पन ने चंदन के जंगलों को लगभग खत्म कर दिया है. पर उसके चलते कर्नाटक सरकार ने वहां के दो मुख्य जंगलों में खदानों पर रोक लगा दी थी क्योंकि कुछ ही दिन पहले वीरप्पन ने 22 पुलिस वालों को बम से उड़ा दिया था. इस बैन का मकसद खानों में इस्तेमाल होने के लिए आए बमों को वीरप्पन के हाथ लगने से बचाना था.

लेकिन इस बैन के चलते वहां हो रहा अवैध खनन और वैध खनन से हो रहा पर्यावरण को नुकसान दोनों को ही नियंत्रित हो गया. साथ ही वीरप्पन के उन जंगलों में रहने से छोटे शिकारी वहां नहीं गए और नुकसान और कम हुआ. इमारती लकड़ी के तस्कर भी जंगलों से दूर ही रहे. इसके अलावा भारी मात्रा में मौजूद जड़ी-बूटियों के पौधे भी वैसे ही सुरक्षित रहे.

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10 महीने का ऑपरेशन 20 मिनट में निपट गया
जाहिर है राजकुमार प्रकरण के बाद वीरप्पन सरकारों के लिए बड़ी मुसीबत था. वो उसके सामने और घुटने नहीं टेके रहना चाहते थे. तमिलनाडु और कर्नाटक सरकारों ने मिलाकर उस पर 5.5 करोड़ का इनाम रखा था. ऐसे में 2003 में जयललिता ने वीरप्पन को मारने के लिए विजय कुमार नाम के एक अफसर को एसटीएफ चीफ बनाया. विजय कुमार 1993 में भी वीरप्पन को पकड़ने के एक अभियान में शामिल थे, हालांकि सफल नहीं रहे थे.

विजय कुमार ने 'कोकून' नाम से एक ऑपरेशन चलाया और अपने कई एसटीएफ के साथियों को वीरप्पन के गैंग में भर्ती करा दिया. वीरप्पन की उम्र अब 52 साल हो गई थी. साथ ही गैंग भी आपसी झगड़ों में कमजोर हो रहा था. इसके अलावा वीरप्पन को डायबिटीज थी और उसका स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा था. और जब वीरप्पन मारा गया तो वो अपनी आंख का इलाज ही कराने जा रहा था. जिसके लिए वीरप्पन के गैंग में शामिल एसटीएफ के लोगों ने उसे एंबुलेंस से सलेम के हॉस्पिटल जाने के लिए तैयार किया था. इस एंबुलेंस में वीरप्पन बैठ गया. एसटीएफ का ही एक आदमी एंबुलेंस चला रहा था.

'वीरप्पन: चेसिंग द ब्रिगेड' किताब का कवर


एसटीएफ चीफ विजय कुमार ने ऑपरेशन कोकून के सफल होने के बाद 'वीरप्पन: चेसिंग द ब्रिगेड' नाम की एक किताब लिखी. जिसमें खुलासा किया है कि जल्दीबाजी में पुलिस वालों ने एंबुलेंस पर 'सलेम' को 'सीलाम' लिख दिया था पर उनका वक्त अच्छा था जो वीरप्पन का उस पर ध्यान नहीं गया. और इस तरह रास्ते में खड़ी पुलिस की गाड़ियों के पास पहुंचते ही गाड़ी चला रहा एसटीएफ का आदमी गाड़ी रोककर भाग निकला.

विजय कुमार कहते हैं वहां उन्होंने वीरप्पन को समर्पण करने को कहा पर उसने गोलियां चलानी शुरू कर दीं. जिसके बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई में अगले 20 मिनट में रात के 11 बजकर 10 मिनट तक वीरप्पन के चैप्टर का अंत हो चुका था. वीरप्पन जब मारा गया तो उसकी मूंंछें 'कट्टाबोमन' (कट्टाबोमन 1857 के एक क्रांतिकारी थे, जिनकी तरह वीरप्पन की मूंछें थीं) मूंछें नहीं थीं. इससे लोग मानते हैं कि वीरप्पन तब तक बहुत कमजोर हो चुका था.

मौत की तमाम थ्योरी लेकिन वीरप्पन अब बस रहस्य है
बाद में एक पत्रकार ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने वीरप्पन को पकड़कर तीन दिन तक टॉर्चर करके मारा पर इसके सबूत नहीं मिले. जान पर खेलकर वीरप्पन के गैंग में शामिल हुए ये पुलिस वाले बहुत दिलेर थे. इस बहादुरी के सम्मान में जयललिता ने इस ऑपरेशन में शामिल हर जवान को तीन-तीन लाख रुपए दिए और सभी को प्रमोशन भी मिला. इसके साथ ही सभी को उनके गृहनगर में सरकार की तरफ से एक-एक घर भी मिला.

तब से अब तक वीरप्पन के ऊपर किताबें, टीवी सीरियल, फिल्में सब आ चुके हैं पर न ही उसकी उस अकूत संपत्ति का कोई पता चलता है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने छिपाकर रखी हुई थी. न ही उसकी मौत से जुड़ी किसी और थ्योरी की पुष्टि होती है. वीरप्पन के नाम के पीछे कई लोगों ने अपने पाप छिपा लिए हैं. वीरप्पन सिर्फ आतंक का एक नाम बनकर रह गया है.

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