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97 पुलिसवालों के हत्यारे वीरप्पन की मौत रहस्य क्यों बनी

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: October 18, 2019, 3:04 PM IST
97 पुलिसवालों के हत्यारे वीरप्पन की मौत रहस्य क्यों बनी
18 अक्टूबर, 2004 चंदन तस्कर वीरप्पन को एक एनकाउंटर में मार दिया गया था

जिस रात वीरप्पन मारा गया उसके अगले दिन पोस्टमार्टम हाउस के बाहर उसकी लाश को देखने को 20 हजार से ज्यादा लोग लाइन में लगे हुए थे. बहुत से लोग उसे रॉबिनहुड भी मानते थे

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  • Last Updated: October 18, 2019, 3:04 PM IST
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 15 साल पहले चंदन के कुख्यात तस्कर कहे जाने वाले वीरप्पन को पुलिस की एक स्पेशल टीम ने आखिरकार मार गिराया. वो केवल अपने इलाके में ही नहीं बल्कि देशभर में एक किवंदती बन चुका था. ये माना जाने लगा था कि पुलिस उसे पकड़ ही नहीं सकती. उसके इलाके के लिए लोग अगर उसे रॉबिनहुड मानते थे तो कुछ निर्दयी हत्यारा.  18 अक्टूबर, 2004 को उसकी कहानी जब खत्म हुई तो लोगों ने विश्वास ही नहीं किया.

उसके बारे में बहुत ढेर सारी बातें कही जाती थीं. ये कहा जाता था उसने कुल दो हजार हाथी मारे ताकि उनके दांतों की तस्करी की जा सके. हजारों चंदन के पेड़ काट डाले. ना जाने कितने लोगों की हत्या कर दी. वीरप्पन रबड़ के जूते में पैसे भर के जमीन में गाड़कर रखता था.

पिछले 15 सालों में वीरप्पन पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं. कई फिल्में बन चुकी हैं. लेकिन 15 साल बाद भी वीरप्पन की मौत के साथ दफन हुए कई राज आज भी राज  हैं.

दस साल की उम्र में पहला कत्ल 

1962 में वीरप्पन ने 10 साल की उम्र में एक तस्कर का कत्ल कर दिया. ये उसका पहला अपराध था. उसी वक्त उसने फॉरेस्ट विभाग के भी तीन अफसरों को मारा. तब उसका नाम वीरैय्या हुआ करता था.  वो बहुत गरीब था. उसके गांव वाले कहते हैं कि फॉरेस्ट विभाग के लोगों ने ही उसे स्मगलिंग के लिए उकसाया.

वीरप्पन ने 10 साल की उम्र में पहला कत्ल किया. इसके बाद तीन और अफसर को मारा. फिर अपराध की दुनिया में दुर्दांत बनता चला गया


वीरप्पन की शादी भी हुई थी. उसने अपनी पत्नी का हाथ अपने ससुर से बिल्कुल फिल्मी अंदाज में मांगा था. पर जंगल में भागने के बाद उसने पत्नी को एक शहरी इलाके में रहने भेज दिया. अब गरीब वीरप्पन पुलिस, राजनीति और भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसकर तस्कर वीरप्पन बन चुका था.
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आमदनी का बड़ा हिस्सा बिचौलियों के पास जाता था
वीरप्पन ने जीवन में कई लोगों को किडनैप किया पर 1997 में सरकारी अफसर समझकर जिन दो लोगों को किडनैप किया वो फोटोग्राफर निकले. इन्होंने वीरप्पन के साथ 14 दिन जंगलों में गुजारे. इन लोगों ने बाद में इस घटना पर किताब भी लिखी थी, 'बर्ड्स, बीस्ट्स एंड बैंडिट्स'.

इसमें इन्होंने वीरप्पन की जो कहानियां बताईं, वो वीरप्पन के आतंक की कहानियों से हटकर थी. उन्होंने बताया कि वीरप्पन हाथियों को लेकर बहुत इमोशनल था. उसने इन फोटोग्राफरों को बताया था कि जंगल में जो भी होता है, उसे वीरप्पन के नाम पर मढ़ दिया जाता है.

उसने बताया था कि हाथियों का धंधा वो बहुत पहले छोड़ चुका है. 'फ्रंटलाइन' पत्रिका की एक रिपोर्ट को मानें तो वीरप्पन ने कुल मिलाकर 500 से ज्यादा हाथियों की हत्या नहीं की थी. हालांकि ये भी बेहद घृणित है पर जो दो हजार का आंकड़ा बताया जाता है वो करीब 25 साल में दक्षिण भारत में मारे गए कुल हाथियों का आंकड़ा है.

इससे उसे कुल 2.5 करोड़ से ज्यादा की आमदनी नहीं हुई थी. इस आमदनी का भी बड़ा हिस्सा उसे बिचौलियों और अपने राजनीतिक संरक्षण पर खर्च करना पड़ा था.

97 पुलिसवालों को मारा
1987 में वीरप्पन ने देश को तब हिलाकर रख दिया जब उसने चिदंबरम नाम के एक फॉरेस्ट अफसर को किडनैप किया. कुछ वक्त बाद उसने नृशंसता की हद दिखाई. एक पुलिस टीम को उड़ा दिया. जिसमें 22 लोग मारे गए. फिर 2000 में वीरप्पन ने कन्नड़ फिल्मों के हीरो राजकुमार को किडनैप कर लिया. रिहाई के लिए फिरौती रखी 50 करोड़ की.

खास बात ये थी कि वीरप्पन ने साथ ही बॉर्डर के इलाकों के लिए वेलफेयर स्कीम की भी मांग की. ये उसका रॉबिनहु़ड बनने का स्टाइल था. जंगलों में रहने वाले उसे रॉबिनहु़ड से कम मानते भी नहीं थे. जो उससे एक बार मिलता था, प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था, यही वजह थी कि जिस रात वीरप्पन मारा गया उसके अगले दिन पोस्टमार्टम हाउस के बाहर उसकी लाश को देखने को 20 हजार से ज्यादा लोग लाइन लगे हुए थे. वीरप्पन को कुल 184 लोगों का हत्यारा बताया जाता है, जिनमें से 97 पुलिसवाले थे.

जो भी पुलिस अफसर वीरप्पन को पकड़ने जाता था, वो निर्दयता से उसकी हत्या कर देता था. उसने 22 लोगों की एक पूरी पुलिस टीम उड़ा दी थी


वीरप्पन के होने से देश को कुछ फायदे भी हुए
चंदन की तस्करी में वीरप्पन को फायदा होता था. इससे बहुत पैसा कमाया. पर जैसा कहा जाता है वीरप्पन ने 10 हजार टन चंदन की लकड़ी काटकर बेची जिससे उसे दो अरब की कमाई हुई. ये बात बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई है.

इन जंगलों में जिनका घर है वो लोग बताते हैं कि चंदन के कटे पेड़ जिस ट्रक पर लदे रहते थे, वीरप्पन उसकी छत पर बंदूक लिए बैठा रहता था. और आगे का रास्ता बताया करता था. इस काम में हमेशा वो साथियों के साथ रहता था.

फ्रंटलाइन की जिस रिपोर्ट का जिक्र ऊपर किया गया है, वो बताती है कि वीरप्पन के कारण कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों में पर्यावरण का नुकसान तो हुआ लेकिन कई फायदे भी हुए.



ये सच है कि वीरप्पन ने चंदन के जंगलों को लगभग खत्म कर दिया है. पर उसके चलते कर्नाटक सरकार ने वहां के दो मुख्य जंगलों में खदानों पर रोक लगा दी थी. इस बैन से वहां हो रहा अवैध खनन और वैध खनन दोनों नियंत्रित हो गए. उसके कारण इमारती लकड़ी के तस्कर भी जंगलों से दूर रहे. इसके अलावा भारी मात्रा में मौजूद जड़ी-बूटियों के पौधे भी सुरक्षित रहे.

..और इस तरह ट्रैप किया गया
तमिलनाडु और कर्नाटक सरकारों ने मिलाकर उस पर 5.5 करोड़ का इनाम रखा था. ऐसे में 2003 में जयललिता ने वीरप्पन को मारने के लिए विजय कुमार नाम के एक अफसर को एसटीएफ चीफ बनाया. विजय कुमार 1993 में भी वीरप्पन को पकड़ने के एक अभियान में शामिल थे, हालांकि सफल नहीं रहे थे.

विजय कुमार ने 'कोकून' नाम से एक ऑपरेशन चलाया. अपने कई एसटीएफ के साथियों को वीरप्पन के गैंग में भर्ती करा दिया. वीरप्पन की उम्र अब 52 साल हो गई थी. साथ ही गैंग आपसी झगड़ों में कमजोर हो रहा था. वीरप्पन को डायबिटीज थी. उसका स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा था.

जब वीरप्पन मारा गया तो वो अपनी आंख का इलाज कराने जा रहा था. वीरप्पन के गैंग में शामिल एसटीएफ के लोगों ने उसे एंबुलेंस से सलेम के हॉस्पिटल जाने के लिए तैयार किया था. इस एंबुलेंस में वीरप्पन बैठ गया. एसटीएफ का ही एक आदमी एंबुलेंस चला रहा था. रास्ते में खड़ी पुलिस की गाड़ियों के पास पहुंचते ही गाड़ी चला रहा एसटीएफ का आदमी गाड़ी रोककर भाग निकला.

इस तरह हुआ उसका अंत 
एसटीएफ चीफ विजय कुमार ने ऑपरेशन कोकून के सफल होने के बाद 'वीरप्पन: चेसिंग द ब्रिगेड' नाम की एक किताब लिखी. विजय कुमार कहते हैं वहां उन्होंने वीरप्पन को समर्पण करने को कहा पर उसने गोलियां चलानी शुरू कर दीं. जिसके बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई में अगले 20 मिनट में रात के 11 बजकर 10 मिनट तक वीरप्पन के चैप्टर का अंत हो चुका था.

वीरप्पन जब मारा गया तो उसकी मूंंछें 'कट्टाबोमन' (कट्टाबोमन 1857 के एक क्रांतिकारी थे, जिनकी तरह वीरप्पन की मूंछें थीं) मूंछें नहीं थीं. इससे लोग मानते हैं कि वीरप्पन तब तक बहुत कमजोर हो चुका था.

ये है वीरप्पन की पत्नी मुत्तुलक्ष्मी. उसने तमिलनाडु विधानसभा का चुनाव लड़ा. हार गई. अब सामाजिक संगठन चलाती है


कितनी थी उसके पास अकूत संपत्ति 
बाद में एक पत्रकार ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने वीरप्पन को पकड़कर तीन दिन तक टॉर्चर करके मारा पर इसके सबूत नहीं मिले. जान पर खेलकर वीरप्पन के गैंग में शामिल हुए ये पुलिस वाले बहुत दिलेर थे. इस बहादुरी के सम्मान में जयललिता ने इस ऑपरेशन में शामिल हर जवान को तीन-तीन लाख रुपए दिए. सभी को प्रमोशन भी मिला. सभी को उनके गृहनगर में सरकार की तरफ से एक-एक घर भी मिला.

लेकिन ये अब तक रहस्य है कि वीरप्पन के पास कितनी संपत्ति थी. लोग बताते हैं कि उसके पास अकूत संपत्ति थी, जो उसने छिपाकर रखी थी.

बीबी ने लड़ा चुनाव 
वीरप्पन की मौत के बाद उसकी विधवा मुत्तुलक्ष्मी पर अपहरण से लेकर हत्या और तस्करी के मामलों में मददगार होने के मुकदमे चले लेकिन वो बरी हो गई. अब वो सलेम में सामाजिक कल्याण से कामों से जुड़ी हुई है. उसने 2006 में तमिलनाडु का विधानसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन हार गई. 2018 में उसने ग्रामीणों का एक संगठन बनाने की घोषणा की. उसकी दोनों बेटियां विद्यारानी और प्रभा तमिलनाडु के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रही हैं

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First published: October 18, 2019, 3:03 PM IST
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