1962: आजादी के बाद इतने खतरों से पहली बार घिरा था देश और हुए थे लोकसभा चुनाव

पूर्व लोकसभा स्पीकर हुकुम सिंह

पूर्व लोकसभा स्पीकर हुकुम सिंह

तीसरी लोकसभा के स्पीकर भी अकाली दल के ही सरदार हुकुम सिंह बने.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 25, 2019, 12:28 PM IST
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1962 के आम चुनावों में 6 राष्ट्रीय पार्टियां थीं. और देश भर में कुल 27 पार्टियों ने इन चुनावों में हिस्सा लिया था. 1962 के चुनाव 18 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों पर लड़े गए थे. तीसरे लोकसभा चुनाव लोकसभा की 494 सीटों पर लड़े गए थे. इन चुनावों में कुल प्रत्याशियों की संख्या 1985 थी. यानि की हर सीट पर औसतन 4 प्रत्याशी थे. देश भर में इस वक्त कुल वोटरों की संख्या 12 करोड़ 77 लाख थी. इनमें से 6 करोड़ 73 लाख महिलाएं और 6 करोड़ 3 लाख पुरुष थे.

1962 के आम चुनावों में सबसे ज्यादा वोट प्रतिशत केरल (70.55%) में और सबसे कम वोट प्रतिशत उड़ीसा (23.56%) रिकॉर्ड किया गया था. 1962 के आम चुनावों में पूरे देश का औसत वोटर टर्नआउट 55.42% था. 1962 के आम चुनावों में सीटों के हिसाब से सबसे ज्यादा सीटें उत्तर प्रदेश (86) में और सबसे कम सीटें मणिपुर (2) और त्रिपुरा (2) में थीं.

कांग्रेसी ही हो रहे थे कांग्रेस के विरोधी
हालांकि इन चुनावों में कांग्रेस को आसान जीत मिली थी लेकिन जेबी कृपलानी और सी राजगोपालाचारी जैसे पुराने कांग्रेसी पार्टी के खिलाफ हो गए थे. जेबी कृपलानी उम्मीदवार बने थे उत्तरी बॉम्बे सीट से. जहां उनके खिलाफ उम्मीदवार थे रक्षा मंत्री रह चुके वीके कृष्ण मेनन. हालांकि अमेरिका विरोधी कृष्ण मेनन को अपने अहंकार के चलते न ही उनके साथी पसंद करते थे और न ही उन्हें देश के बाहर पसंद किया जाता था. लेकिन नेहरू के उनके पक्ष में होने के चलते और उनका प्रचार करने के कारण आसानी से वीके कृष्ण मेनन जीत गए.
भारत चौतरफा समस्याओं से घिरा था


इन चुनावों के जरिए पहली बार अकाली दल और द्रविण मुनेत्र कझगम (DMK) भी लोकसभा पहुंची. ये नई पार्टियां थीं, जिनके एजेंडे ने नए आजाद हुए देश के सामने संप्रभुता की समस्याएं खड़ीं कर दी थीं. अकाली एक सिख बहुत राज्य की मांग कर रहे थे तो DMK चाहती थी कि दक्षिण भारतीय राज्यों को जोड़कर एक द्रविणनाडु का निर्माण किया जाए. यह सब कुछ 1956 के भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के विद्रोहों के बाद हो रहा था. इससे पहले 1960 में गुजरात और महाराष्ट्र का विभाजन हो चुका था और नगालैंड में भी कई समस्याएं खड़ी हो गई थीं. इन सारी ही गतिविधियों को देखते हुए कांग्रेस ने 16वां संविधान संसोधन पास कराया था, जिसमें सभी सरकारी अफसरों का भारतीय गणतंत्र के प्रति निष्ठा रखना जरूरी था.

कम्युनिस्ट भी बंटे हुए थे
इन चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी और उसे 29 सीटें मिली थीं. इससे वह प्रमुख विपक्षी दल बन गई थी. लेकिन इसी वक्त उसके अंदर की कलह भी खुलकर सामने आ गई थी. विनम्र और राष्ट्रवादी SA डांगे के नेतृत्व में कई बार CPI नेहरू का समर्थन कर चुकी थी. लेकिन इस पॉलिसी को अब ज्योति बसु और हरिकिशन सिंह सुरजीत आदि से कड़ी चुनौती मिल रही थी. एक मजेदार बात यह है कि दोनों ही वकील थे और अपने बाद के दिनों में दोनों ही अपने वामपंथ में उतने कट्टर नहीं रह गये थे. इसके अलावा CIA की फाइलें जिसमें भारतीय वामपंथियों के बारे में कई सीक्रेट बातें थीं और चीन और भारत की लड़ाई में वामपंथियों का चीन को समर्थन ऐसे मुद्दे थे जो उनके अंदर भी असहमति का कारण बनकर उभरे थे.

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