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1971: आम चुनाव से पहले ही हो गए कांग्रेस में दो फाड़, ये थी मुसीबत की वजह

चुनावी सभा में इंदिरा गांधी
चुनावी सभा में इंदिरा गांधी

1971 के आम चुनाव पूरी तरह से इंदिरा गांधी के इर्द-गिर्द ही घूमते रहे.

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1971 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को भारी बहुमत से जीत दिलाई. 'गरीबी हटाओ' (गरीबी को खत्म करो) के चुनावी नारे के साथ प्रचार करते हुए वे 518 में से 352 सीटों के साथ संसद में वापस आईं. पिछले चुनावों की 283 सीटों के मुकाबले यह बेहतरीन सुधार था. वह भी तब जब वे पार्टी के अंदर से ही कई कद्दावर नेताओं का विरोध के बाद. सिंडिकेट उनके खिलाफ गठबंधन बनाकर लड़ी लेकिन इंदिरा गांधी को नुकसान पहुंचाने में नाकाम रही.

राष्ट्रपति चुनाव इंदिरा और सिंडिकेट की लड़ाई में लाया निर्णायक मोड़
कामराज और सिंडिकेट के दूसरे नेताओं ने इस पद के लिए नीलम संजीव रेड्डी को उम्मीदवार बनाने का फ़ैसला किया. रेड्डी उस वक्त लोकसभाध्यक्ष थे. वे 1960 और 1962 के बीच कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके थे. वे इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल के सदस्य भी थे, लेकिन उन्होंने 1967 के चुनाव के बाद उन्हें अपने कैबिनेट में नहीं लिया था. रेड्डी के नाम का ऐलान इंदिरा गांधी को बिल्कुल भी हज़म नहीं हुआ.

वो इससे परेशान हो गईं कि उन्होंने उप राष्ट्रपति वी वी गिरि के पास जाकर उन्हें इस पद के लिए लड़ने के लिए तैयार कर लिया. 75 वर्षीय गिरि ने तब सार्वजनिक रूप से ऐलान कर दिया कि अगर कांग्रेस उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं भी बनाती तब भी वो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ेंगे. इसके बाद इंदिरा ने रेड्डी का सीधा विरोध तो नहीं किया लेकिन ऐलान कर दिया कि उनके दल के लोग इस चुनाव में अपनी 'अंतरात्मा की आवाज़' पर वोट करें.
चुनावी लड़ाई उस समय दिलचस्प हो गई जब सिंडिकेट के नेताओं ने रेड्डी को जितवाने के लिए दक्षिणपंथी जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी से संपर्क किया. इंदिरा गांधी ने भी सभी मुख्यमंत्रियों से संपर्क कर गिरि को जिताने की अपील की. इनमें उन राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल थे, जहां उनकी पार्टी सत्ता में नहीं थी.



वीवी गिरि की जीत ने तय किया इंदिरा का प्रभुत्व
16 अगस्त को चुनाव होने के बाद 20 अगस्त, 1969 को वोटों की गिनती शुरू हुई. जब मतों की गिनती शुरू हुई तो कभी गिरी आगे होते तो कभी रेड्डी. पहले राउंड की समाप्ति पर किसी को बहुमत नहीं मिला, फिर दूसरी पसंद के वोटों की गिनती की गई. अंत में इंदिरा के उम्मीदवार वी वी गिरि ने कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को सिर्फ़ 14650 मतों के मामूली अंतर से हरा दिया. गिरि को इंदिरा के अलावा कम्युनिस्ट पार्टी, अकाली दल, निर्दलीय सदस्यों और डीएमके का समर्थन भी मिला था.

इंदिरा के इस रुख को वरिष्ठ कांग्रेसियों ने पार्टी से विद्रोह के तौर पर देखा. और 1969 में इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया गया. लेकिन इंदिरा वरिष्ठ कांग्रेसियों से ज्यादा लोकप्रिय और ताकतवर हो चुकी थीं. इससे कांग्रेस का विभाजन हो गया क्योंकि सिंडिकेट सदस्यों को छोड़कर सभी इंदिरा गांधी के साथ चले गए थे. ऐसे में सिंडिकेट के धड़े को कांग्रेस (ओ) और इंदिरा गांधी के धड़े को कांग्रेस (आर) कहा गया. इंदिरा को उनकी नीतियों के चलते कम्युनिस्ट सांसदों से सपोर्ट मिल चुक था, जिसके चलते वे प्रधानमंत्री बनी रहीं.

1971 में इंदिरा ने वक्त से पहले ही चुनाव करा दिए. ये लोकसभा चुनाव पूरी तरह से इंदिरा गांधी के इर्द-गिर्द घूमते रहे. लेकिन इंदिरा ने इसका फायदा उठाते हुए नारा गढ़ा, "वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ." जिसके बाद 5वीं लोकसभा में एनडीएफ मात्र 49 सीटों पर सिमट गया.

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