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1971 आम चुनाव: भारत का सुपर इलेक्शन, जब दो हफ्ते में ही खत्म हो गया आम चुनाव

चुनाव प्रचार के दौरान इंदिरा गांधी
चुनाव प्रचार के दौरान इंदिरा गांधी

इन्ही चुनावों में प्रचार के दौरान इंदिरा गांधी कहती थीं, "वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ."

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1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद उसके लिए यह पहला चुनाव था. 1969 के आम चुनाव यानी पांचवें लोकसभा चुनाव 520 की बजाए 518 सीटों पर ही लड़े गए थे. इसका कारण था, पंजाब का बंट जाना. पंजाब रिऑर्गनाइजेशन एक्ट, 1966 के जरिए हिमाचल प्रदेश का गठन हो चुका था. इसके बाद इस इलाके में आने वाली लोकसभा सीटों की संख्या 6 से घटाकर 4 कर दी गई थी. यही कारण था कि इन चुनावों में सीटें 520 से घटकर 518 हो गईं.

पांचवें आम चुनावों के दौरान देश में कुल वोटरों की संख्या 2 करोड़ 74 लाख थी.

कांग्रेस में बंटवारा
इस दौर में देशभर में राजनीतिक गतिविधियों में बढ़ोत्तरी देखी गई थी और इससे होने वाले सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी सामने आ रहे थे. इसी बीच 1969 में कांग्रेस का बंटवारा हो गया. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस के पुराने नेताओं ने कांग्रेस से निकाल दिया. इंदिरा गांधी के खिलाफ खड़े इन नेताओं के वर्ग को सिंडिकेट के नाम से जाना जाता था. मोरारजी देसाई इन नेताओं का नेतृत्व कर रहे थे. लेकिन बहुत से नेता इंदिरा गांधी के साथ भी थे. ऐसे में कांग्रेस दो भागों में बंट गई. सिंडिकेट के धड़े को कांग्रेस (ओ) जबकि इंदिरा गांधी वाले धड़े को कांग्रेस (आर) कहा गया. कांग्रेस के बंटने के बाद भी इंदिरा गांधी का अपनी स्थिति पर विश्वास था. इसकी वजह थी उनका कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से गठबंधन.
यही वह वक्त था, जब इंदिरा गांधी ने अपना प्रसिद्ध गरीबी हटाओ का नारा दिया था. इस नारे ने उनकी लोकप्रिय छवि बनाई और आम जनता के बीच उनके विरोधियों को अप्रभावी कर दिया. उनके बैंकों के राष्ट्रीयकरण का कदम भी उन्होंने 1971 में उठाया, जिसे उनके वामपंथ की ओर झुकाव के एक कदम के तौर पर देखा गया.



इंदिरा की शक्तिशाली और लोकप्रिय छवि का इन चुनावों में उन्हें बहुत फायदा हुआ और वे 518 में से 352 सीटें जीतने में सफल रहीं. वहीं कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों धड़ों ने मिलाकर 48 सीटें जीतीं. इसमें CPM ने 25 और CPI ने 23 सीटें जीती थीं. जबकि इन चुनावों में भारतीय जनसंघ को मात्र 22 सीटें मिल सकी थीं. इन चुनावों में स्वतंत्र पार्टी भी कमजोर पड़ी थी और उसे मात्र 8 सीटें मिल सकी थीं.

इन चुनावों से जुड़ी कुछ और खास बातें ये रहीं-

# इस लोकसभा ने संविधान की प्रस्तावना में बड़ा बदलाव किया. संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को जोड़ा गया.

# यह चुनाव स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जनसंघ के लिए आखिरी चुनाव साबित हुए.

# इन चुनावों को मात्र 2 हफ्तों में करा लिया गया था, हालांकि इससे पहले चुनावों को कराने में बहुत वक्त लगता था. पहले चुनाव की सारी प्रक्रियाओं में तो 5 महीने का वक्त लग गया था.

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