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उस रेल हादसे में बिहार के हर जिले के लोग मारे गए थे, गई थी 500 से ज्यादा लोगों की जान

News18Hindi
Updated: June 7, 2019, 2:40 PM IST
उस रेल हादसे में बिहार के हर जिले के लोग मारे गए थे, गई थी 500 से ज्यादा लोगों की जान
38 साल पहले बिहार में हुआ रेल हादसा, जिससे सहम गया था पूरा देश

एक पैंसेंजर ट्रेन के सात डिब्बों के नदी में गिरने से 500 से ज्यादा लोग मारे गए थे, ये देश का सबसे बड़ा रेल हादसा था.

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38 साल पहले 06 जून 1981 को बिहार में ऐसा हादसा हुआ था, जिसे सुनकर हर कोई कांप गया. इसमें बिहार के करीब हर जिले के लोगों की मौत हुई थी. हर जिले में चिताएं जलीं थीं. ये देश का अब तक का सबसे बड़ा रेल हादसा था. जिसमें 500 से ज्यादा लोगों की जान गई थी. ट्रेन खचाखच भरी हुई थी. बताते हैं कि गाय या भैंस को बचाने के चलते ड्राइवर ने तेज ब्रेक लगाया. नतीजे में आधी से ज्यादा ट्रेन नदी में समा गई.

ये पैसेंजर ट्रेन बिहार में मानसी से चली थी. उसे सहरसा तक जाना था. आम दिनों की तुलना में उस दिन ट्रेन में कुछ ज्यादा ही भीड़ थी. क्योंकि उस दिन बड़े पैमाने पर शादियां थीं. ट्रेन का हर डिब्बा खचाखच भरा हुआ था. अचानक ट्रेन में तेज झटका लगता है और जब तक लोग कुछ समझ पाते तब तक ट्रेन पटरी को छोड़कर भागमती नदी में जा गिरती है.

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नदी में जा गिरे सात डिब्बे

ये हादसा देर शाम होता है. भागमती नदी में उस दिन कुछ ज्यादा पानी भी था. लेकिन लोग इनकार करते हैं कि हादसे की वजह नदी की बाढ़ थी. लोगों का कहना है कि नदी में बाढ़ नहीं आई थी. ये कहा जाता है कि हादसे से कुछ देर पहले बारिश हुई थी, जिससे रेल की पटरियां पानी से भीगी हुईं थी. तभी जब गाय या भैंस सामने आई तो ड्राइवर के तेज ब्रेक की वजह से ट्रेन पटरियों से फिसल गई. देखते ही देखते सात डिब्बे नदी में जा गिरे.

हर जिले में थी मातम की स्थिति 
जिसने भी इस हादसे से बारे में सुना, वो स्तब्ध रह गया. माना जाता है कि हादसे के बाद बिहार के तकरीबन हर जिले में मातम की स्थिति थी. हर जिले से किसी ना किसी के इस ट्रेन में होने और मारे जाने की खबरें आ रही थीं.
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बिहार के उस रेल हादसे में 500 से ज्यादा लोग मारे गए थे


राहत के काम में आती रही दिक्कत
ट्रेन के डब्बों के पानी में जा गिरने और शाम का समय होने के कारण राहत के कामों में बहुत दिक्कत हुई. राहत का काम कई दिनों तक चलता रहा. नदी में पानी का बहाव तेज होने से भी खासी दिक्कतें हुईं. घटना के बाद लगभग एक महीने तक हर रोज दिन और रात चिताएं जलती रहीं.

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माना जाता है कि ट्रेन में 900 लोग सवार थे. हादसे के बाद 286 लोगों के शव निकाले जा सके जबकि 300 से ज्यादा लोगों के शव कभी नहीं मिले. जब जांच बैठी तो वो इसका कोई सही सही निष्कर्ष नहीं निकाल सकी.

क्या आंधी के चलते हुआ था हादसा
एक्सीडेंट से जुड़ी दूसरी थ्योरी यह है कि पुल नंबर 51 पर पहुंचने से पहले जोरदार आंधी और बारिश शुरू हो गई थी. बारिश की बूंदे खिड़की के अंदर आने लगीं तो अंदर बैठे यात्रियों ने ट्रेन की खिड़की को बंद कर दिया. जिसके बाद हवा के एक ओर से दूसरी ओर जाने के सारे रास्ते बंद हो गए. तूफान के भारी दबाव के कारण ट्रेन की बोगियां पलट कर नदी में जा गिरीं.

काफी हद तक इस थ्योरी को सही माना जा रहा है, क्योंकि जहां ये हादसा हुआ, वहां गांववालों ने भी दूसरी थ्योरी को जायज बताया. उनका कहना था कि तेज आंधी में यात्रियों द्वारा खिड़की बंद करना घातक साबित हुआ.

बचाने की बजाय लूटपाट
बताया जाता है कि घटना स्थल की ओर तैरकर बाहर आने वालों से कुछ स्थानीय लोगों ने लूटपाट शुरू कर दी. यहां तक कि प्रतिरोध करने वालों को कुछ लोगों ने फिर से डुबोना शुरू कर दिया. कुछ यात्रियों का तो यहां तक आरोप है कि जान बचाकर किनारे तक पहुंची महिलाओं की आबरू तक पर हाथ डालने का प्रयास किया गया.
कुछ लोग बताते है कि बाद में जब पुलिस ने बंगलिया, हरदिया और बल्कुंडा गांवों में छापेमारी की तो कई घरों से टोकरियों में सूटकेस, गहने और लूट के अन्य सामान मिले थे.

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First published: June 7, 2019, 12:39 PM IST
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